भाग-३०(30) सुमन्त्र के समझाने और फटकारने पर भी कैकेयी का टस से मस न होना

 


तदनन्तर होश में आने पर सारथी सुमन्त्र सहसा उठकर खड़े हो गये। उनके मन में बड़ा संताप हुआ, जो अमङ्गलकारी था। वे क्रोधके मारे काँपने लगे। उनके शरीर और मुख की पहली स्वाभाविक कान्ति बदल गयी। वे क्रोध से आँखें लाल करके दोनों हाथों से सिर पीटने लगे और बारम्बार लम्बी साँस खींचकर, हाथ-से-हाथ मलकर, दाँत कटकटाकर राजा दशरथ के मन की वास्तविक अवस्था देखते हुए अपने वचनरूपी तीखे बाणों से कैकेयी के हृदय को कम्पित-सा करने लगे। 

अपने अशुभ एवं अनुपम वचनरूपी वज्र से कैकेयी के सारे मर्मस्थानों को विदीर्ण-से करते हुए सुमन्त्र ने उससे इस प्रकार कहना आरम्भ किया। 

'देवी! जब तुमने सम्पूर्ण चराचर जगत के स्वामी स्वयं अपने पति महाराज दशरथ का ही त्याग कर दिया, तब इस जगत में कोई ऐसा कुकर्म नहीं है, जिसे तुम न कर सको; मैं तो समझता हूँ कि तुम पति की हत्या करनेवाली तो हो ही; अन्तत: कुलघातिनी भी हो। ओह! जो देवराज इन्द्र के समान अजेय, पर्वत के समान अकम्पनीय और महासागर के समान क्षोभरहित हैं, उन महाराज दशरथ को भी तुम अपने कर्मों से संतप्त कर रही हो।' 

'राजा दशरथ तुम्हारे पति, पालक और वरदाता हैं। तुम इनका अपमान न करो। नारियों के लिये पति की इच्छा का महत्त्व करोड़ों पुत्रों से भी अधिक है। इस कुल में राजा का परलोकवास हो जाने पर उसके पुत्रों की अवस्था का विचार करके जो ज्येष्ठ पुत्र होते हैं, वे ही राज्य पाते हैं। राजकुल के इस परम्परागत आचार को तुम इन इक्ष्वाकुवंश के स्वामी महाराज दशरथ के जीते-जी ही मिटा देना चाहती हो।' 

'तुम्हारे पुत्र भरत राजा हो जाये और इस पृथ्वी का शासन करें; किंतु हम लोग तो वहीं चले जायेंगे जहाँ श्रीराम जायेंगे। तुम्हारे राज्य में कोई भी ब्राह्मण निवास नहीं करेगा; यदि तुम आज वैसा मर्यादाहीन कर्म करोगी तो निश्चय ही हम सब लोग उसी मार्ग पर चले जायेंगे, जिसका श्रीराम ने सेवन किया है।' 

‘सम्पूर्ण बन्धु-बान्धव और सदाचारी ब्राह्मण भी तुम्हारा त्याग कर देंगे। देवी ! फिर इस राज्य को पाकर तुम्हें क्या आनन्द मिलेगा। ओह! तुम ऐसा मर्यादाहीन कर्म करना चाहती हो। मुझे तो यह देखकर आश्चर्य-सा हो रहा है कि तुम्हारे इतने बड़े अत्याचार करने पर भी पृथ्वी तुरंत फट क्यों नहीं जाती ? अथवा बड़े-बड़े ब्रह्मर्षियों के धिक्कारपूर्ण वाग्दण्ड (शाप) जो देखने में भयंकर और जलाकर भस्म कर देनेवाले होते हैं, श्रीराम को घर से निकालने के लिये तैयार खड़ी हुई तुम जैसी पाषाण हृदया का सर्वनाश क्यों नहीं कर डालते हैं?' 

‘भला आम को कुल्हाड़ी से काटकर उसकी जगह नीम का सेवन कौन करेगा? जो आम की जगह नीम को ही दूध सींचता है, उसके लिये भी यह नीम मीठा फल देनेवाला नहीं हो सकता अत: वरदान के बहाने श्रीराम को वनवास देकर कैकेयी के चित्त को संतुष्ट करना राजा के लिये कभी सुखद परिणाम का जनक नहीं हो सकता।' 

'कैकेयी! मैं समझता हूँ कि तुम्हारी माता का अपने कुल के अनुरूप जैसा स्वभाव था, वैसा ही तुम्हारा भी है। लोक में कही जाने वाली यह कहावत सत्य ही है कि नीम से मधु नहीं टपकता। तुम्हारी माता के दुराग्रह की बात भी हम जानते हैं। इसके विषय में पहले जैसा सुना गया है, वह बताया जाता है । एक समय किसी वर देने वाले साधु ने तुम्हारे पिता को अत्यन्त उत्तम वर दिया था। उस वर के प्रभाव से केकयनरेश समस्त प्राणियों की बोली समझने लगे। तिर्यक् योनि में पड़े हुए प्राणियों की बातें भी उनकी समझ में आ जाती थीं। 

'एक दिन तुम्हारे महातेजस्वी पिता शय्या पर लेटे हुए थे। उसी समय जृम्भ नामक पक्षी की आवाज उनके कानों में पड़ी। उसकी बोली का अभिप्राय उनकी समझ में आ गया। अतः वे वहाँ कई बार हँसे। उसी शय्या पर तुम्हारी माँ भी सोयी थी। वह यह समझकर कि राजा मेरी ही हँसी उड़ा रहे हैं, कुपित हो उठी और गले में मौत की फाँसी लगाने की इच्छा रखती हुई बोली - 'सौम्य ! नरेश्वर! तुम्हारे हँसने का क्या कारण है, यह मैं जानना चाहती हूँ।' 

‘तब राजा ने उस देवी से कहा - 'रानी ! यदि मैं अपने हँसने का कारण बता दूँ तो उसी क्षण मेरी मृत्यु हो जायेगी, इसमें संशय नहीं है। देवी! यह सुनकर तुम्हारी रानी माता ने तुम्हारे पिता केकयराज से फिर कहा—'तुम जीओ या मरो, मुझे कारण बता दो। भविष्य में तुम फिर मेरी हँसी नहीं उड़ा सकोगे। अपनी प्यारी रानी के ऐसा कहने पर केकयनरेश ने उस वर देने वाले साधु के पास जाकर सारा समाचार ठीक- ठीक कह सुनाया।' 

'तब उस वर देने वाले साधु ने राजाको उत्तर दिया - 'महाराज ! रानी मरे या घर से निकल जाये; तुम कदापि यह बात उसे न बताना। प्रसन्न चित्त वाले उस साधु का यह वचन सुनकर केकयनरेश ने तुम्हारी माता को तुरंत घर से निकाल दिया और स्वयं कुबेर के समान विहार करने लगे। तुम भी इसी प्रकार दुर्जनों के मार्ग पर स्थित हो पाप पर ही दृष्टि रखकर मोहवश राजा से यह अनुचित आग्रह कर रही हो। आज मुझे यह लोकोक्ति सोलह आने सच मालूम होती है कि पुत्र पिता के समान होते हैं और कन्याएँ माता के समान।' 

'तुम ऐसी न बनो – इस लोकोक्ति को अपने जीवन में चरितार्थ न करो। राजा ने जो कुछ कहा है, उसे स्वीकार करो श्रीराम का राज्याभिषेक होने दो। अपने पति की इच्छा का अनुसरण करके इस जन समुदाय को यहाँ शरण देने वाली बनो। पापपूर्ण विचार रखने वाले लोगों के बहकावे में आकर तुम देवराज इन्द्र के तुल्य तेजस्वी अपने लोक - प्रतिपालक स्वामी को अनुचित कर्म में न लगाओ।' 

‘देवी! कमलनयन श्रीमान् राजा दशरथ पाप से दूर रहते हैं। वे अपनी प्रतिज्ञा झूठी नहीं करेंगे। श्रीरामचन्द्रजी अपने भाइयों में ज्येष्ठ, उदार, कर्मठ, स्वधर्म के पालक, जीव जगत के रक्षक और बलवान् हैं। इनका इस राज्य पर अभिषेक होने दो। देवी ! यदि श्रीराम अपने पिता राजा दशरथ को छोड़कर वन को चले जायेंगे तो संसार में तुम्हारी बड़ी निन्दा होगी। अत: श्रीरामचन्द्रजी ही अपने राज्य का पालन करें और तुम निश्चिन्त होकर बैठो। श्रीराम के सिवा दूसरा कोई राजा इस श्रेष्ठ नगर में रहकर तुम्हारे अनुकूल आचरण नहीं कर सकता। श्रीराम के युवराजपद पर प्रतिष्ठित हो जाने के बाद महाधनुर्धर राजा दशरथ पूर्वजों के वृत्तान्त का स्मरण करके स्वयं वन में प्रवेश करेंगे।' 

इस प्रकार सुमन्त्र ने हाथ जोड़कर कैकेयी को उस राजभवन में सान्त्वनापूर्ण तथा तीखे वचनों से भी बारम्बार विचलित करने की चेष्टा की; किंतु वह टस से मस न हुई। देवी कैकेयी के मन में न तो क्षोभ हुआ और न दुःख ही। उस समय उसके चेहरे के रंग में भी कोई फर्क पड़ता नहीं दिखायी दिया। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-३०(30) समाप्त !

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