भाग-२(2) श्रीराम आदि का अत्रिमुनि के आश्रम पर जाकर उनके द्वारा सत्कृत होना तथा अनसूया द्वारा सीता का सत्कार

 


उन सब ऋषियों के चले जाने पर श्रीरामचन्द्रजी ने जब बारंबार विचार किया, तब उन्हें बहुत से ऐसे कारण ज्ञात हुए, जिनसे उन्होंने स्वयं भी वहाँ रहना उचित न समझा। उन्होंने मन-ही-मन सोचा - इस आश्रम में मैं भरत से, माताओं से तथा पुरवासी मनुष्यों से मिल चुका हूँ। वह स्मृति मुझे बराबर बनी रहती है और मैं प्रतिदिन उन सब लोगों का चिन्तन करके शोकमग्न हो जाता हूँ। अत: हम लोग भी अन्यत्र चले जायँ।  

ऐसा सोचकर श्रीरघुनाथजी सीता और लक्ष्मण के साथ वहाँ से चल दिये॥ वहाँ से अत्रि आश्रम पर पहुँचकर महायशस्वी श्रीराम ने उन्हें प्रणाम किया तथा भगवान् अत्रि ने भी उन्हें अपने पुत्र की भाँति स्नेहपूर्वक अपनाया। उन्होंने स्वयं ही श्रीराम का सम्पूर्ण आतिथ्य-सत्कार करके महाभाग लक्ष्मण और सीता को भी सत्कारपूर्वक संतुष्ट किया। 

श्री रामजी की छवि देखकर मुनि के नेत्र शीतल हो गए। तब वे उनको आदरपूर्वक अपने आश्रम में ले आए। पूजन करके सुंदर वचन कहकर मुनि ने मूल और फल दिए, जो प्रभु के मन को बहुत रुचे। प्रभु आसन पर विराजमान हैं। नेत्र भरकर उनकी शोभा देखकर परम प्रवीण मुनि श्रेष्ठ हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे। 

स्तुति : (स्रोत श्रीरामचरितमानस)

नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं॥

भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं॥1॥

निकाम श्याम सुंदरं। भवांबुनाथ मंदरं॥

प्रफुल्ल कंज लोचनं। मदादि दोष मोचनं॥2॥

प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभोऽप्रमेय वैभवं॥

निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं॥3॥

दिनेश वंश मंडनं। महेश चाप खंडनं॥

मुनींद्र संत रंजनं। सुरारि वृंद भंजनं॥4॥

मनोज वैरि वंदितं। अजादि देव सेवितं॥

विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहं॥5॥

नमामि इंदिरा पतिं। सुखाकरं सतां गतिं॥

भजे सशक्ति सानुजं। शची पति प्रियानुजं॥6॥

त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजंति हीन मत्सराः॥

पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले॥7॥

विविक्त वासिनः सदा। भजंति मुक्तये मुदा॥

निरस्य इंद्रियादिकं। प्रयांतिते गतिं स्वकं॥8॥

तमेकमद्भुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं॥

जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं॥9॥

भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं॥

स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहं॥10॥

अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमुर्विजा पतिं॥

प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे॥11॥

पठंति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदं॥

व्रजंति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुताः॥12॥

दोहा :

बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि।

चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि॥

भावार्थ : 

स्तुति :

हे भक्त वत्सल! हे कृपालु! हे कोमल स्वभाव वाले! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निष्काम पुरुषों को अपना परमधाम देने वाले आपके चरण कमलों को मैं भजता हूँ॥1॥

आप नितान्त सुंदर श्याम, संसार (आवागमन) रूपी समुद्र को मथने के लिए मंदराचल रूप, फूले हुए कमल के समान नेत्रों वाले और मद आदि दोषों से छुड़ाने वाले हैं॥2॥

 हे प्रभो! आपकी लंबी भुजाओं का पराक्रम और आपका ऐश्वर्य अप्रमेय (बुद्धि के परे अथवा असीम) है। आप तरकस और धनुष-बाण धारण करने वाले तीनों लोकों के स्वामी,॥3॥

सूर्यवंश के भूषण, महादेवजी के धनुष को तोड़ने वाले, मुनिराजों और संतों को आनंद देने वाले तथा देवताओं के शत्रु असुरों के समूह का नाश करने वाले हैं॥4॥

आप कामदेव के शत्रु महादेवजी के द्वारा वंदित, ब्रह्मा आदि देवताओं से सेवित, विशुद्ध ज्ञानमय विग्रह और समस्त दोषों को नष्ट करने वाले हैं॥5॥

हे लक्ष्मीपते! हे सुखों की खान और सत्पुरुषों की एकमात्र गति! मैं आपको नमस्कार करता हूँ! हे शचीपति (इन्द्र) के प्रिय छोटे भाई (वामनजी)! स्वरूपा-शक्ति श्री सीताजी और छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित आपको मैं भजता हूँ॥6॥

जो मनुष्य मत्सर (डाह) रहित होकर आपके चरण कमलों का सेवन करते हैं, वे तर्क-वितर्क (अनेक प्रकार के संदेह) रूपी तरंगों से पूर्ण संसार रूपी समुद्र में नहीं गिरते (आवागमन के चक्कर में नहीं पड़ते)॥7॥

जो एकान्तवासी पुरुष मुक्ति के लिए, इन्द्रियादि का निग्रह करके (उन्हें विषयों से हटाकर) प्रसन्नतापूर्वक आपको भजते हैं, वे स्वकीय गति को (अपने स्वरूप को) प्राप्त होते हैं॥8॥

उन (आप) को जो एक (अद्वितीय), अद्भुत (मायिक जगत से विलक्षण), प्रभु (सर्वसमर्थ), इच्छारहित, ईश्वर (सबके स्वामी), व्यापक, जगद्गुरु, सनातन (नित्य), तुरीय (तीनों गुणों से सर्वथा परे) और केवल (अपने स्वरूप में स्थित) हैं॥9॥

(तथा) जो भावप्रिय, कुयोगियों (विषयी पुरुषों) के लिए अत्यन्त दुर्लभ, अपने भक्तों के लिए कल्पवृक्ष (अर्थात्‌ उनकी समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले), सम (पक्षपातरहित) और सदा सुखपूर्वक सेवन करने योग्य हैं, मैं निरंतर भजता हूँ॥10॥

हे अनुपम सुंदर! हे पृथ्वीपति! हे जानकीनाथ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। मुझ पर प्रसन्न होइए, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। मुझे अपने चरण कमलों की भक्ति दीजिए॥11॥

जो मनुष्य इस स्तुति को आदरपूर्वक पढ़ते हैं, वे आपकी भक्ति से युक्त होकर आपके परम पद को प्राप्त होते हैं, इसमें संदेह नहीं॥12॥

दोहा : मुनि ने (इस प्रकार) विनती करके और फिर सिर नवाकर, हाथ जोड़कर कहा- हे नाथ! मेरी बुद्धि आपके चरण कमलों को कभी न छोड़े। 

सम्पूर्ण प्राणियों के हित में तत्पर रहने वाले धर्मज्ञ मुनिश्रेष्ठ अत्रि ने अपने समीप आयी हुई सबके द्वारा सम्मानित तापसी एवं धर्मपरायणा बूढ़ी पत्नी महाभागा अनसूया को सम्बोधित करके सान्त्वनापूर्ण वचनों द्वारा संतुष्ट किया और कहा - देवि! विदेहराजनन्दिनी सीता को सत्कारपूर्वक हृदय से लगाओ। 

तत्पश्चात् उन्होंने श्रीरामचन्द्रजी को धर्मपरायणा तपस्विनी अनसूया का परिचय देते हुए कहा - एक समय दस वर्षों तक वृष्टि नहीं हुई, उस समय जब सारा जगत् निरन्तर दग्ध होने लगा, तब जिन्होंने उग्र तपस्या से युक्त तथा कठोर नियमों से अलंकृत होकर अपने तप के प्रभाव से यहाँ फल- मूल उत्पन्न किये और मन्दाकिनी की पवित्र धारा बहायी तथा तात! जिन्होंने दस हजार वर्षों तक बड़ी भारी तपस्या करके अपने उत्तम व्रतों के प्रभाव से ऋषियों के समस्त विघ्नों का निवारण किया था, वे ही यह अनसूया देवी हैं। 

'निष्पाप श्रीराम ! इन्होंने देवताओं के कार्य के लिये अत्यन्त उतावली होकर दस रात के बराबर एक ही रात बनायी थी; वे ही ये अनसूया देवी तुम्हारे लिये माता की भाँति पूजनीया हैं। ये सम्पूर्ण प्राणियों के लिये वन्दनीया तपस्विनी हैं। क्रोध तो इन्हें कभी छू भी नहीं सका है। विदेहनन्दिनी सीता इन वृद्धा अनसूया देवी के पास जायँ।' 

ऐसी बात कहते हुए अत्रि मुनि से 'बहुत अच्छा' कहकर श्रीरामचन्द्रजी ने धर्मज्ञा सीता की ओर देखकर यह बात कही - राजकुमारी! महर्षि अत्रि के वचन तो तुमने सुन ही लिये; अब अपने कल्याण के लिये तुम शीघ्र ही इन तपस्विनी देवी के पास जाओ। जो अपने सत्कर्मों से संसार में अनसूया के नाम से विख्यात हुई हैं, वे तपस्विनी देवी तुम्हारे आश्रय लेने योग्य हैं; तुम शीघ्र उनके पास जाओ।' 

श्रीरामचन्द्रजी की यह बात सुनकर यशस्विनी मिथिलेशकुमारी सीता धर्म को जानने वाली अत्रिपत्नी  अनसूया के पास गयीं। अनसूया वृद्धावस्था के कारण शिथिल हो गयी थीं; उनके शरीर में झुर्रियाँ पड़ गयीं थीं तथा सिर के बाल सफेद हो गये थे। अधिक हवा चलने पर हिलते हुए कदलीवृक्ष के समान उनके सारे अङ्ग निरन्तर काँप रहे थे। सीता ने निकट जाकर शान्तभाव से अपना नाम बताया और उन महाभागा पतिव्रता अनसूया को प्रणाम किया।उन संयमशीला तपस्विनी को प्रणाम करके हर्ष से भरी हुई सीता ने दोनों हाथ जोड़कर उनका कुशल- समाचार पूछा। 

इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का भाग-२(2) समाप्त !

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