धर्मप्रेमी भगवान् श्रीराम ने अपने बाणों द्वारा खर की उस गदा को विदीर्ण करके मुसकराते हुए यह रोषसूचक बात कही - राक्षसाधम ! यही तेरा सारा बल है, जिसे तूने इस गदा के साथ दिखाया है। अब सिद्ध हो गया कि तू मुझसे अत्यन्त शक्तिहीन है, व्यर्थ ही अपने बल की डींग हाँक रहा था। मेरे बाणों से छिन्न-भिन्न होकर तेरी यह गदा पृथ्वी पर पड़ी हुई है। तेरे मन में जो यह विश्वास था कि मैं इस गदा से शत्रु का वध कर डालूँगा, इसका खण्डन तेरी इस गदा ने ही कर दिया। अब यह स्पष्ट हो गया कि तू केवल बातें बनाने में ढीठ है (तुझसे कोई पराक्रम नहीं हो सकता)।
‘तूने जो यह कहा था कि मैं तुम्हारा वध करके तुम्हारे हाथ से मारे गये राक्षसों का अभी आँसू पोछूँगा, तेरी वह बात भी झूठी हो गयी। तू नीच, क्षुद्रस्वभाव से युक्त और मिथ्याचारी राक्षस है। मैं तेरे प्राणों को उसी प्रकार हर लूँगा, जैसे गरुड़ ने देवताओं के यहाँ से अमृत का अपहरण किया था। अब मैं अपने बाणों से तेरे शरीर को विदीर्ण करके तेरा गला भी काट डालूँगा। फिर यह पृथ्वी फेन और बुद्बुदों से युक्त तेरे गरम-गरम रक्त का पान करेगी।'
‘तेरे सारे अङ्ग धूल से धूसर हो जायँगे, तेरी दोनों भुजाएँ शरीर से अलग होकर पृथ्वी पर गिर जायँगी और उस दशा में तू दुर्लभ युवती के समान इस पृथ्वी का आलिङ्गन करके सदा के लिये सो जायगा। तेरे-जैसे राक्षस कुलकलङ्क के सदा के लिये महानिद्रा में सो जाने पर ये दण्डकवन के प्रदेश शरणार्थियों को शरण देने वाले हो जायँगे। राक्षस! मेरे बाणों से जनस्थान में बने हुए तेरे निवासस्थान के नष्ट हो जाने पर मुनिगण इस वन में सब ओर निर्भय विचर सकेंगे।'
‘जो अब तक दूसरों को भय देती थीं, वे राक्षसियाँ आज अपने बान्धवजनों के मारे जाने से दीन हो आँसुओं से भींगे मुँह लिये जनस्थान से स्वयं ही भय के कारण भाग जायँगी। जिनका तुझ जैसा दुराचारी पति है, वे तदनुरूप कुलवाली तेरी पत्नियाँ आज तेरे मारे जाने पर काम आदि पुरुषार्थों से वञ्चित हो शोकरूपी स्थायी भाव वाले करुण रस का अनुभव करनेवाली होंगी। क्रूरस्वभाव वाले निशाचर! तेरा हृदय सदा ही क्षुद्र विचारों से भरा रहता है। तू ब्राह्मणों के लिये कण्टकरूप है। तेरे ही कारण मुनि लोग शङ्कित रहकर ही अग्नि में हविष्य की आहुतियाँ डालते हैं।'
वन में श्रीरामचन्द्रजी जब इस प्रकार रोषपूर्ण बातें कह रहे थे, उस समय क्रोध के कारण खर का भी स्वर अत्यन्त कठोर हो गया और उसने उन्हें फटकारते हुए कहा – अहो ! निश्चय ही तुम बड़े अहंकारी हो, भय के अवसरों पर भी निर्भय बने हुए हो। जान पड़ता है कि तुम मृत्यु के अधीन हो गये हो, इस कारण से ही तुम्हें यह भी पता नहीं है कि कब क्या कहना चाहिये और क्या नहीं कहना चाहिये? जो पुरुष काल के फन्दे में फँस जाते हैं, उनकी छहों इन्द्रियाँ बेकाम हो जाती हैं; इसीलिये उन्हें कर्तव्य और अकर्तव्य का ज्ञान नहीं रह जाता है।
ऐसा कहकर उस निशाचर ने एक बार श्रीराम की और भौंहें टेढ़ी करके देखा और रणभूमि में उन पर प्रहार करने के लिये वह चारों ओर दृष्टिपात करने लगा। इतने में ही उसे एक विशाल साखू का वृक्ष दिखायी दिया, जो निकट ही था। खर ने अपने होठों को दाँतों से दबाकर उस वृक्ष को उखाड़ लिया। फिर उस महाबली निशाचर ने विकट गर्जना करके दोनों हाथों से उस वृक्ष को उठा लिया और श्रीराम पर दे मारा। साथ ही यह भी कहा – 'लो, अब तुम मारे गये।'
परमप्रतापी भगवान् श्रीराम ने अपने ऊपर आते हुए उस वृक्ष को बाण - समूहों से काट गिराया और उस समरभूमि में खर को मार डालने के लिये अत्यन्त क्रोध प्रकट किया। उस समय श्रीराम के शरीर में पसीना आ गया। उनके नेत्रप्रान्त रोष से रक्तवर्ण के हो गये। उन्होंने सहस्रों बाणों का प्रहार करके समराङ्गण में खर को क्षत-विक्षत कर दिया। उनके बाणों के आघात से उस निशाचर के शरीर में जो घाव हुए थे, उनसे अधिक मात्रा में फेनयुक्त रक्त प्रवाहित होने लगा, मानो पर्वत के झरने से जल की धाराएँ गिर रही हों।
श्रीराम ने युद्धस्थल में अपने बाणों की मार से खर को व्याकुल कर दिया; तो भी (उसका साहस कम नहीं हुआ।) वह खून की गन्ध से उन्मत्त होकर बड़े वेग से श्रीराम की ओर ही दौड़ा।
अस्त्र-विद्या के ज्ञाता भगवान् श्रीराम ने देखा कि यह राक्षस खून से लथपथ होने पर भी अत्यन्त क्रोधपूर्वक मेरी ही ओर बढ़ा आ रहा है तो वे तुरंत चरणों का संचालन करके दो-तीन पग पीछे हट गये (क्योंकि बहुत निकट होने पर बाण चलाना सम्भव नहीं हो सकता था)। तदनन्तर् श्रीराम ने समराङ्गण में खर का वध करने के लिये एक अग्नि के समान तेजस्वी बाण हाथ में लिया, जो दूसरे ब्रह्मदण्ड के समान भयंकर था। वह बाण बुद्धिमान् देवराज इन्द्र का दिया हुआ था। धर्मात्मा श्रीराम ने उसे धनुष पर रखा और खर को लक्ष्य करके छोड़ दिया। उस महाबाण के छूटते ही वज्रपात के समान भयानक शब्द हुआ। श्रीराम ने अपने धनुष को कान तक खींचकर उसे छोड़ा था। वह खर की छाती में जा लगा।
जैसे श्वेतवन में भगवान् रुद्र ने अन्धकासुर को जलाकर भस्म किया था, उसी प्रकार दण्डकवन में श्रीराम के उस बाण की आग में जलता हुआ निशाचर खर पृथ्वी पर गिर पड़ा। जैसे वज्र से वृत्रासुर, फेन से नमुचि और इन्द्र की अशनि से बलासुर मारा गया था, उसी प्रकार श्रीराम के उस बाण से आहत होकर खर धराशायी हो गया।
इसी समय देवता चारणों के साथ मिलकर आये और हर्ष में भरकर दुन्दुभि बजाते हुए वहाँ श्रीराम के ऊपर चारों ओर से फूलों की वर्षा करने लगे। उस समय उन्हें यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ था कि श्रीराम ने अपने पैने बाणों से डेढ़ मुहूर्त (७२ मिनट अर्थात् एक मुहूर्त 48 मिनट के बराबर होता है) में ही इच्छानुसार रूप धारण करने वाले खर-दूषण आदि चौदह हजार राक्षसों का इस महासमर में संहार कर डाला।
वे बोले - अहो! अपने स्वरूप को जानने वाले भगवान् श्रीराम का यह कर्म महान् और अद्भुत है, इनका बल- पराक्रम भी अद्भुत है और इनमें भगवान् विष्णु की भाँति आश्चर्यजनक दृढ़ता दिखायी देती है। ऐसा कहकर वे सब देवता जैसे आये थे, वैसे ही चले गये।
तदनन्तर बहुत से राजर्षि और अगस्त्य आदि महर्षि मिलकर वहाँ आये तथा प्रसन्नतापूर्वक श्रीराम का सत्कार करके उनसे इस प्रकार बोले - रघुनन्दन! इसीलिये महातेजस्वी पाकशासन पुरंदर इन्द्र शरभङ्ग मुनि के पवित्र आश्रम पर आये थे और इसी कार्य की सिद्धि के लिये महर्षियों ने विशेष उपाय करके आपको पञ्चवटी के इस प्रदेश में पहुँचाया था। मुनियों के शत्रुरूप इन पापाचारी राक्षसों के वध के लिये ही आपका यहाँ शुभागमन आवश्यक समझा गया था। दशरथनन्दन! आपने हम लोगों का यह बहुत बड़ा कार्य सिद्ध कर दिया। अब बड़े-बड़े ऋषि-मुनि दण्डकारण्य के विभिन्न प्रदेशों में निर्भय होकर अपने धर्म का अनुष्ठान करेंगे।
इसी बीच में वीर लक्ष्मण भी सीता के साथ पर्वत की कन्दरा से निकलकर प्रसन्नतापूर्वक आश्रम में आ गये। तत्पश्चात् महर्षियों से प्रशंसित और लक्ष्मण से पूजित विजयी वीर श्रीराम ने आश्रम में प्रवेश किया। महर्षियों को सुख देने वाले अपने शत्रुहन्ता पति का दर्शन करके विदेहराजनन्दिनी सीता को बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने परमानन्द में निमग्न होकर अपने स्वामी का आलिङ्गन किया। राक्षस समूह मारे गये और श्रीराम को कोई क्षति नहीं पहुँची यह देख और जानकर जानकीजी को बहुत संतोष हुआ।
प्रसन्नता से भरे हुए महात्मा मुनि जिनकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे तथा जिन्होंने राक्षसों के समुदाय को कुचल डाला था, उन प्राणवल्लभ, श्रीराम का बारम्बार आलिङ्गन करके उस समय जनकनन्दिनी सीता को बड़ा हर्ष हुआ। उनका मुख प्रसन्नता से खिल उठा।
