भाग-२८(28) सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का राजा दशरथ के पास जाकर वनवास के लिये विदा माँगना

 


जब कमलनयन श्यामसुन्दर उपमा रहित महापुरुष श्रीराम ने सूत सुमन्त्र से कहा - आप पिताजी को मेरे आगमन की सूचना दे दीजिये तब श्रीराम की प्रेरणा से शीघ्र ही भीतर जाकर सारथि सुमन्त्र ने राजा का दर्शन किया। उनकी सारी इन्द्रियाँ संताप से कलुषित हो रही थीं। वे लम्बी साँस खींच रहे थे। 

सुमन्त्र ने देखा, पृथ्वीपति महाराज दशरथ राहुग्रस्त सूर्य, राख से ढकी हुई आग तथा जलशून्य तालाब के समान श्रीहीन हो रहे हैं। उनका चित्त अत्यन्त व्याकुल है और वे श्रीरामका ही चिन्तन कर रहे हैं। तब महाप्राज्ञ सुमन्त्र ने महाराज को सम्बोधित करके हाथ जोड़कर कहा। 

पहले तो सुमन्त्र ने विजयसूचक आशीर्वाद देते हुए महाराज की अभ्युदय - कामना की; फिर भय से व्याकुल मन्द-मधुर वाणी द्वारा यह बात कही। 

‘पृथ्वीनाथ! आपके पुत्र ये सत्यप्राक्रमी पुरुषसिंह श्रीराम ब्राह्मणों तथा आश्रित सेवकों को अपना सारा धन देकर द्वार पर खड़े हैं। आपका कल्याण हो, ये अपने सब सुहृदों से मिलकर – उनसे विदा लेकर इस समय आपका दर्शन करना चाहते हैं। आज्ञा हो तो यहाँ आकर आपका दर्शन करें। राजन् ! अब ये विशाल वन में चले जायेंगे, अत: किरणों से युक्त सूर्य की भाँति समस्त राजोचित गुण से सम्पन्न इन श्रीराम को आप भी जी भरकर देख लीजिये।' 

यह सुनकर समुद्र के समान गम्भीर तथा आकाश की भाँति निर्मल, सत्यवादी धर्मात्मा महाराज दशरथ ने उन्हें उत्तर दिया - सुमन्त्र! यहाँ जो कोई भी स्त्रियाँ हैं, उन सबको बुलाओ। उन सबके साथ मैं श्रीराम को देखना चाहता हूँ। 

तब सुमन्त्र ने बड़े वेग से अन्त: पुर में जाकर सब स्त्रियों से कहा – देवियों ! आपलोगों को महाराज बुला रहे हैं, अतः वहाँ शीघ्र चलें। 

राजा की आज्ञा से सुमन्त्र के ऐसा कहने पर वे सब स्त्रियां रानियों सहित स्वामी का आदेश समझकर उस भवन की ओर चलीं। कुछ-कुछ लाल नेत्रों वाली साढ़े तीन सौ पतिव्रता युवती स्त्रियाँ महारानी कौशल्या को सब ओर से घेरकर धीरे- धीरे उस भवन में गयीं। 

उन सबके आ जाने पर उन्हें देखकर पृथ्वीपति राजा दशरथ ने सुमन्त्र से कहा – सुमन्त्र! अब मेरे पुत्र को ले आओ। आज्ञा पाकर सुमन्त्र गये और श्रीराम, लक्ष्मण तथा सीता को साथ लेकर शीघ्र ही महाराज के पास लौट आये। 

महाराज दूर से ही अपने पुत्र को हाथ जोड़कर आते देख सहसा अपने आसन से उठ खड़े हुए। उस समय स्त्रियों से घिरे हुए वे नरेश शोक से आर्त हो रहे थे। श्रीराम को देखते ही वे प्रजापालक महाराज बड़े वेग से उनकी ओर दौड़े, किंतु उनके पास पहुँचने के पहले ही दु:ख से व्याकुल हो पृथ्वी पर गिर पड़े और मूर्च्छित हो गये। उस समय श्रीराम और महारथी लक्ष्मण बड़ी तेजी से चलकर दुःख के कारण अचेत से हुए शोकमग्न महाराज के पास जा पहुँचे। इतने ही में उस राजभवन के भीतर सहसा आभूषणों की ध्वनि के साथ सहस्रों स्त्रियों का 'हा राम ! हा राम !' यह आर्तनाद गूँज उठा। 

श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाई भी सीता के साथ रो पड़े और उन तीनों ने महाराज को दोनों भुजाओं से उठाकर पलंग पर बिठा दिया। शोकाश्रु के सागर में डूबे हुए महाराज दशरथ को दो घड़ी में जब फिर चेत हुआ, तब श्रीराम ने हाथ जोड़कर उनसे कहा - महाराज! आप हमलोगों के स्वामी हैं। मैं दण्डकारण्य को जा रहा हूँ और आपसे आज्ञा लेने आया हूँ। आप अपनी कल्याणमयी दृष्टि से मेरी ओर देखिये। मेरे साथ लक्ष्मण को भी वन में जाने की आज्ञा दीजिये। साथ ही यह भी स्वीकार कीजिये कि सीता भी मेरे साथ वन को जाये। मैंने बहुत-से सच्चे कारण बताकर इन दोनों को रोकने की चेष्टा की है, परंतु ये यहाँ रहना नहीं चाहते हैं; अत: दूसरों को मान देने वाले नरेश ! आप शोक छोड़कर हम सबको - मुझको, लक्ष्मण को और सीता को भी उसी तरह वन में जाने की आज्ञा दीजिये, जैसे ब्रह्माजी ने अपने पुत्र सनकादिकों को तप के लिये वन में जाने की अनुमति दी थी। 

इस प्रकार शान्तभाव से वनवास के लिये राजा की आज्ञा की प्रतीक्षा करते हुए श्रीरामचन्द्रजी की ओर देखकर महाराज ने उनसे कहा – रघुनन्दन! मैं कैकेयी को दिये हुए वर के कारण मोह में पड़ गया हूँ। तुम मुझे कैद करके स्वयं ही अब अयोध्या के राजा बन जाओ। सारी प्रजा तुम्हारे पक्ष में खड़ी है। अतः तुम अतिशीघ्र मेरा विरोध करो। पुत्र ! मुझ जैसे निर्दयी पिता को बंदी बना लो। 

महाराज के ऐसा कहने पर बातचीत करने में कुशल धर्मात्माओं में श्रेष्ठ श्रीराम ने दोनों हाथ जोड़कर पिता को इस प्रकार उत्तर दिया – महाराज! आप सहस्रों वर्षों तक इस पृथ्वी के अधिपति बने रहें। मैं तो अब वन में ही निवास करूँगा। मुझे राज्य लेने की इच्छा नहीं है। नरेश्वर! चौदह वर्षों तक वन में घूम-फिरकर आपकी प्रतिज्ञा पूरी कर लेने के पश्चात् मैं पुन: आपके युगल चरणों में मस्तक झुकाऊँगा। 

राजा दशरथ एक तो सत्य के बन्धन में बँधे हुए थे, दूसरे एकान्त में कैकेयी उन्हें श्रीराम को वन में तुरंत भेजने के लिये बाध्य कर रही थी। इस अवस्था में वे आर्त भाव से रोते हुए वहाँ अपने प्रिय पुत्र श्रीराम से बोले – तात! तुम कल्याण के लिये, वृद्धि के लिये और फिर लौट आने के लिये शान्तभाव से जाओ। तुम्हारा मार्ग विघ्न- बाधाओं से रहित और निर्भय हो। पुत्र रघुनन्दन! तुम सत्यस्वरूप और धर्मात्मा हो। तुम्हारे विचार को पलटना तो असम्भव है; परंतु रात भर और रह जाओ। सिर्फ एक रात के लिये सर्वथा अपनी यात्रा रोक दो । केवल एक दिन भी तो तुम्हें देखने का सुख उठा लूँ। 

‘अपनी माता को और मुझको इस अवस्था में देखकर आज की इस रात में यहीं रह जाओ। मेरे द्वारा सम्पूर्ण अभिलषित वस्तुओं से तृप्त होकर कल प्रातः काल यहाँ से जाना। मेरे प्रिय पुत्र श्रीराम ! तुम सर्वथा दुष्कर कार्य कर रहे हो। मेरा प्रिय करने के लिये ही तुमने इस प्रकार वन का आश्रय लिया है। परंतु पुत्र रघुनन्दन! मैं सत्य की शपथ खाकर कहता हूँ कि यह मुझे प्रिय नहीं है।' 

मुझे तुम्हारा वन में जाना अच्छा नहीं लगता। यह मेरी स्त्री कैकेयी राख में छिपी हुई आग के समान भयंकर है। इसने अपने क्रूर अभिप्राय को छिपा रखा था। इसी ने आज मुझे मेरे अभीष्ट संकल्प से विचलित कर दिया है। कुलोचित सदाचार का विनाश करने वाली इस कैकेयी ने मुझे वरदान के लिये प्रेरित करके मेरे साथ बहुत बड़ा विश्वासघात किया है। इसके द्वारा जो वेदना मुझे प्राप्त हुई है, उसी को तुम पार करना चाहते हो। पुत्र ! तुम अपने पिता को सत्यवादी बनाना चाहते हो। तुम्हारे लिये यह कोई अधिक आश्चर्य की बात नहीं है; क्योंकि तुम गुण और अवस्था दोनों ही दृष्टियों से मेरे ज्येष्ठ पुत्र हो।' 

अपने शोकाकुल पिता का यह कथन सुनकर उस समय छोटे भाई लक्ष्मण सहित श्रीराम ने दुःखी होकर कहा – महाराज! आज यात्रा करके मैं जिन गुणों (लाभों) को पाऊँगा, उन्हें कल कौन मुझे देगा ? अत: मैं सम्पूर्ण कामनाओं के बदले आज यहाँ से निकल जाना ही अच्छा समझता हूँ और इसी का वरण करता हूँ। राष्ट्र और यहाँ के निवासी मनुष्यों सहित धनधान्य से सम्पन्न यह सारी पृथ्वी मैंने छोड़ दी। आप इसे भरत को दे

दें। 

'मेरा वनवास विषयक निश्चय अब बदल नहीं सकेगा। वरदायक नरेश ! आपने देवासुर संग्राम में माता कैकेयी को जो वर देने की प्रतिज्ञा की थी, उसे पूर्णरूप से दीजिये और सत्यवादी बनिये। मैं आपकी उक्त आज्ञा का पालन करता हुआ चौदह वर्षों तक वन में वनचारी प्राणियों के साथ निवास करूँगा। आपके मन में कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिये। आप यह सारी पृथ्वी भरत को दे दीजिये।' 

'रघुनन्दन ! मैंने अपने मन को सुख देने अथवा स्वजनों का प्रिय करने के उद्देश्य से राज्य लेने की इच्छा नहीं की थी। आपकी आज्ञा का यथावत रूप से पालन करने के लिये ही मैंने उसे ग्रहण करने की अभिलाषा की थी। आपका दु:ख दूर हो जाये, आप इस प्रकार आँसू न बहावें। सरिताओं का स्वामी दुर्धर्ष समुद्र क्षुब्ध नहीं होता है - अपनी मर्यादा का त्याग नहीं करता है इसी तरह आपको भी क्षुब्ध नहीं होना चाहिये।' 

'मुझे न तो इस राज्य की, न सुख की, न पृथ्वी की, न इन सम्पूर्ण भोगों की, न स्वर्ग की और न जीवन की ही इच्छा है। 

‘पुरुषशिरोमणे! मेरे मन में यदि कोई इच्छा है तो यही कि आप सत्यवादी बनें। आपका वचन मिथ्या न होने पावे। यह बात मैं आपके सामने सत्य और शुभ कर्मों की शपथ खाकर कहता हूँ। तात! प्रभो! अब मैं यहाँ एक क्षण भी नहीं ठहर सकता। अतः आप इस शोक को अपने भीतर ही दबा लें। मैं अपने निश्चय के विपरीत कुछ नहीं कर सकता।' 

‘पिताश्री! माता कैकेयी ने मुझसे यह याचना की कि 'राम! तुम वन को चले जाओ' मैंने वचन दिया था कि 'अवश्य जाऊँगा' उस सत्य का मुझे पालन करना है। देव! बीच में हमें देखने या हमसे मिलने के लिये आप उत्कण्ठित न होंगे। शान्तस्वभाव वाले मृगों से भरे हुए भाँति-भाँति के पक्षियों के कलरवों से गूँजते हुए उस वन में हमलोग बड़े आनन्द से रहेंगे।' 

'तात! पिता देवताओं के भी देवता माने गये हैं। अतः मैं देवता समझकर ही पिता (आप) की आज्ञा का पालन करूँगा। नृपश्रेष्ठ! अब यह संताप छोड़िये। चौदह वर्ष बीत जाने पर आप फिर मुझे आया हुआ देखेंगे। पुरुषसिंह! यहाँ जितने लोग आँसू बहा रहे हैं, इन सबको धैर्य बँधाना आपका कर्तव्य है; फिर आप स्वयं ही इतने विकल कैसे हो रहे हैं?'

‘यह नगर, यह राज्य और यह सारी पृथ्वी मैंने छोड़ दी। आप यह सब कुछ भरत को दे दीजिये। अब मैं आपके आदेश का पालन करता हुआ दीर्घकाल तक वन में निवास करने के लिये यहाँ से यात्रा कर रहा हूँ। मेरी छोड़ी हुई पर्वतखण्डों, नगरों और उपवनों सहित इस सारी पृथ्वी का भरत कल्याणकारिणी मर्यादाओं में स्थित रहकर पालन करें। नरेश्वर ! आपने जो वचन दिया है, वह पूर्ण हो।' 

'पृथ्वीनाथ! निष्पाप महाराज ! सत्पुरुषों द्वारा अनुमोदित आपकी आज्ञा का पालन करने में मेरा मन जैसा लगता है, वैसा बड़े-बड़े भोगों में तथा अपने किसी प्रिय पदार्थ में भी नहीं लगता; अत: मेरे लिये आपके मन में जो दु:ख है, वह दूर हो जाना चाहिये। निष्पाप नरेश! आज आपको मिथ्यावादी बनाकर मैं अक्षय राज्य, सब प्रकार के भोग, वसुधा का आधिपत्य, मिथिलेशकुमारी सीता तथा अन्य किसी अभिलषित पदार्थ को भी स्वीकार नहीं कर सकता। मेरी एकमात्र इच्छा यही है कि 'आपकी प्रतिज्ञा सत्य हो। मैं विचित्र वृक्षों से युक्त वन में प्रवेश करके फल- मूल का भोजन करता हुआ वहाँ के पर्वतों, नदियों और सरोवरों को देख-देख कर सुखी होऊँगा; इसलिये आप अपने मन को शान्त कीजिये।' 

श्रीराम के ऐसा कहने पर पुत्र - बिछोह के संकट में पड़े हुए राजा दशरथ ने दु:ख और संताप से पीड़ित हो उन्हें छाती से लगाया और फिर अचेत होकर वे पृथ्वी पर गिर पड़े। उस समय उनका शरीर जड़ की भाँति कुछ भी चेष्टा न कर सका। यह देख राजरानी कैकेयी को छोड़कर वहाँ एकत्र हुई अन्य सभी रानियाँ रो पड़ीं। सुमन्त्र भी रोते-रोते मूर्च्छित हो गये तथा वहाँ सब ओर हाहाकार मच गया। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-२८(28) समाप्त !

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