खर को रथहीन होकर गदा हाथ में लिये सामने उपस्थित देख महातेजस्वी भगवान् श्रीराम पहले कोमल और फिर कठोर वाणी में बोले - निशाचर! हाथी, घोड़े और रथों से भरी हुई विशाल सेना के बीच में खड़े रहकर (असंख्य राक्षसों के स्वामित्व का अभिमान लेकर) तूने सदा जो क्रूरतापूर्ण कर्म किया है, उसकी समस्त लोकों द्वारा निन्दा हुई है। जो समस्त प्राणियों को उद्वेग में डालने वाला, क्रूर और पापाचारी है, वह तीनों लोकों का ईश्वर हो तो भी अधिक काल तक टिक नहीं सकता। जो लोक विरोधी कठोर कर्म करने वाला है, उसे सब लोग सामने आये हुए दुष्ट सर्प की भाँति मारते हैं।
'जो वस्तु प्राप्त नहीं हुई है, उसकी इच्छा को 'काम' कहते हैं और प्राप्त हुई वस्तु को अधिक-से-अधिक संख्या में पाने की इच्छा का नाम 'लोभ' है। जो काम अथवा लोभ से प्रेरित हो पाप करता है और उसके (विनाशकारी) परिणाम को नहीं समझता है, उलटे उस पाप में हर्ष का अनुभव करता है, वह उसी प्रकार अपना विनाशरूप परिणाम देखता है जैसे वर्षा के साथ गिरे हुए ओले को खाकर ब्राह्मणी (रक्तपुच्छिका) नाम वाली कीड़ी अपना विनाश देखती है।' (लाल पूँछ वाली एक कीड़ी होती है, जो ओला खा लेने पर मर जाती है। वह उसके लिये विष का काम करता है - यह बात लोक में प्रसिद्ध है।)
‘राक्षस! दण्डकारण्य में निवास करने वाले तपस्या में संलग्न धर्मपरायण महाभाग मुनियों की हत्या करके न जाने तू कौन - सा फल पायेगा ?जिनकी जड़ खोखली हो गयी हो, वे वृक्ष जैसे अधिक काल तक नहीं खड़े रह सकते, उसी प्रकार पापकर्म करने वाले लोकनिन्दित क्रूर पुरुष ( किसी पूर्वपुण्य के प्रभाव से) ऐश्वर्य को पाकर भी चिरकाल तक उसमें प्रतिष्ठित नहीं रह पाते (उससे भ्रष्ट हो ही जाते हैं )। जैसे समय आने पर वृक्ष में ऋतु के अनुसार फूल लगते ही हैं, उसी प्रकार पापकर्म करने वाले पुरुष को समयानुसार अपने उस पापकर्म का भयंकर फल अवश्य ही प्राप्त होता है।'
'निशाचर! जैसे खाये हुए विषमिश्रित अन्न का परिणाम तुरंत ही भोगना पड़ता है, उसी प्रकार लोक में किये गये पापकर्मों का फल शीघ्र ही प्राप्त होता है। राक्षस! जो संसार का बुरा चाहते हुए घोर पापकर्म में लगे हुए हैं, उन्हें प्राणदण्ड देने के लिये मेरे पिता महाराज दशरथ ने मुझे यहाँ वन में भेजा है। आज मेरे छोड़े हुए सुवर्णभूषित बाण जैसे सर्प बाँबी को छेदकर निकलते हैं, उसी प्रकार तेरे शरीर को फाड़कर पृथ्वी को भी विदीर्ण करके पाताल में जाकर गिरेंगे।'
‘तूने दण्डकारण्य में जिन धर्मपरायण ऋषियों का भक्षण किया है, आज युद्ध में मारा जाकर सेनासहित तू भी उन्हीं का अनुसरण करेगा। पहले तूने जिनका वध किया है, वे महर्षि विमान पर बैठकर आज तुझे मेरे बाणों से मारा गया और नरकतुल्य कष्ट भोगता हुआ देखें। कुलाधम! तेरी जितनी इच्छा हो, प्रहार कर जितना सम्भव हो, मुझे परास्त करने का प्रयत्न कर, किंतु आज मैं तेरे मस्तक को ताड़ के फल की भाँति अवश्य काट गिराऊँगा।'
श्रीराम के ऐसा कहने पर खर कुपित हो उठा। उसकी आँखें लाल हो गयीं। वह क्रोध से अचेत-सा होकर हँसता हुआ श्रीराम को इस प्रकार उत्तर देने लगा - दशरथकुमार! तुम साधारण राक्षसों को युद्ध में मारकर स्वयं ही अपनी इतनी प्रशंसा कैसे कर रहे हो? तुम प्रशंसा के योग्य कदापि नहीं हो। जो श्रेष्ठ पुरुष पराक्रमी अथवा बलवान् होते हैं, वे अपने प्रताप के कारण अधिक घमंड में भरकर कोई बात नहीं कहते हैं (अपने विषय में मौन ही रहते हैं)। राम! जो क्षुद्र, अजितात्मा और क्षत्रियकुलकलंक होते हैं, वे ही संसार में अपनी बड़ाई के लिये व्यर्थ डींग हाँका करते हैं; जैसे इस समय तुम (अपने विषय में) बढ़-बढ़कर बातें बना रहे हो।'
'जब कि मृत्यु के समान युद्ध का अवसर उपस्थित है, ऐसे समय में बिना किसी प्रस्ताव के ही समराङ्गण में कौन वीर अपनी कुलीनता प्रकट करता हुआ आप ही अपनी स्तुति करेगा? जैसे पीतल सुवर्णशोधक आग में तपाये जाने पर अपनी लघुता (कालेपन) को ही व्यक्त करता है, उसी प्रकार अपनी झूठी प्रशंसा के द्वारा तुमने सर्वथा अपने ओछेपन का ही परिचय दिया है। क्या तुम नहीं देखते कि मैं नाना प्रकार के धातुओं की खानों से युक्त तथा पृथ्वी को धारण करने वाले अविचल कुलपर्वत के समान यहाँ स्थिरभाव से तुम्हारे सामने गदा लेकर खड़ा हूँ।'
'मैं अकेला ही पाशधारी यमराज की भाँति गदा हाथ में लेकर रणभूमि में तुम्हारे और तीनों लोकों के भी प्राण लेने की शक्ति रखता हूँ। यद्यपि तुम्हारे विषय में मैं इच्छानुसार बहुत कुछ कह सकता हूँ तथापि इस समय कुछ नहीं कहूँगा; क्योंकि सूर्यदेव अस्ताचल को जा रहे हैं, अतः युद्ध में विघ्न पड़ जायगा। तुमने चौदह हजार राक्षसों का संहार किया है, अत: आज तुम्हारा भी विनाश करके मैं उन सबके आँसू पोछूँगा -उनकी मौत का बदला चुकाऊँगा।'
ऐसा कहकर अत्यन्त क्रोध से भरे हुए खर ने उत्तम वलय (कड़े) से विभूषित तथा प्रज्वलित वज्र के समान भयंकर गदा को श्रीरामचन्द्रजी के ऊपर चलाया। खर के हाथों से छूटी हुई वह दीप्तिमान् विशाल गदा वृक्षों और लताओं को भस्म करके उनके समीप जा पहुँची। मृत्यु के पाश की भाँति उस विशाल गदा को अपने ऊपर आती देख श्रीरामचन्द्रजी ने अनेक बाण मारकर आकाश में ही उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। बाणों से विदीर्ण एवं चूर-चूर होकर वह गदा पृथ्वी पर गिर पड़ी, मानो कोई सर्पिणी मन्त्र और ओषधियों के बल से गिरायी गयी हो।
