भाग-२७(27) सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम का दु:खी नगरवासियों के मुख से तरह-तरह की बातें सुनते हुए पिता के दर्शन के लिये कैकेयी के महल में जाना

 

विदेहकुमारी सीता के साथ श्रीराम और लक्ष्मण ब्राह्मणों को बहुत सा धन दान करके वन जाने के लिये उद्यत हो पिता का दर्शन करने के लिये गये । उनके साथ दो सेवक श्रीराम और लक्ष्मण के वे धनुष आदि आयुध लेकर चले, जिन्हें फूल की मालाओं से सजाया गया था और सीताजी ने पूजा के लिये चढ़ाये हुए चन्दन आदि से अलंकृत किया था। उन दोनों के आयुधों की उस समय बड़ी शोभा हो रही थी। 

उस अवसर पर धनी लोग प्रासादों (तिमंजिले महलों), हर्म्यगृहों (राजभवनों ) तथा विमानों (सात मंजिले महलों) की ऊपरी छतों पर चढ़कर उदासीन भाव से उन तीनों की ओर देखने लगे। 

उस समय सड़कें मनुष्यों की भीड़ से भरी थीं। इसलिये उन पर सुगमता पूर्वक चलना कठिन हो गया था। अत: अधिकांश मनुष्य प्रासादों (तिमंजिले मकानों) पर चढ़कर वहीं से दुःखी होकर श्रीरामचन्द्रजी की ओर देख रहे थे। 

श्रीराम को अपने छोटे भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ पैदल जाते देख बहुत-से मनुष्यों का हृदय शोक से व्याकुल हो उठा। वे खेदपूर्वक कहने लगे -  हाय! यात्रा के समय जिनके पीछे विशाल चतुरङ्गिणी सेना चलती थी, वे ही श्रीराम आज अकेले जा रहे हैं। और उनके पीछे सीता के साथ लक्ष्मण चल रहे हैं। जो ऐश्वर्य के सुख का अनुभव करने वाले तथा भोग्य वस्तुओं के महान् भण्डार थे - जहाँ सबकी कामनाएँ पूर्ण होती थीं, वे ही श्रीराम आज धर्म का गौरव रखने के लिये पिता की बात झूठी करना नहीं चाहते हैं। 

'ओह! पहले जिसे आकाश में विचरने वाले प्राणी भी नहीं देख पाते थे, उसी सीता को इस समय सड़कों पर खड़े हुए लोग देख रहे हैं। सीता अङ्गराग-सेवन के योग्य हैं, लाल चन्दन का सेवन करनेवाली हैं। अब वर्षा, गर्मी और सर्दी शीघ्र ही इनके अङ्गों की कान्ति फीकी कर देगी। निश्चय ही आज राजा दशरथ किसी पिशाच के आवेश में पड़कर अनुचित बात कह रहे हैं; क्योंकि अपनी स्वाभाविक स्थिति में रहनेवाला कोई भी राजा अपने प्यारे पुत्र को घर से निकाल नहीं सकता।' 

'पुत्र यदि गुणहीन हो तो भी उसे घर से निकाल देने का साहस कैसे हो सकता है? फिर जिसके केवल चरित्र से ही यह सारा संसार वशीभूत हो जाता है, उसको वनवास देने की तो बात ही कैसे की जा सकती है ? क्रूरता का अभाव, दया, विद्या, शील, दम (इन्द्रिय संयम) और शम (मनोनिग्रह) – ये छः गुण नरश्रेष्ठ श्रीराम को सदा ही सुशोभित करते हैं। अत: इनके ऊपर आघात करने - इनके राज्याभिषेक में विघ्न डालने से प्रजा को उसी तरह महान् क्लेश पहुँचा है, जैसे गर्मी में जलाशय का पानी सूख जाने से उसके भीतर रहनेवाले जीव तड़पने लगते हैं।'

‘इन जगदीश्वर श्रीराम की व्यथा से सम्पूर्ण जगत् व्यथित हो उठा है, जैसे जड़ काट देने से पुष्प और फल सहित सारा वृक्ष सूख जाता है। ये महान् तेजस्वी श्रीराम सम्पूर्ण मनुष्यों के मूल हैं, धर्म ही इनका बल है। जगत के दूसरे प्राणी पत्र, पुष्प, फल और शाखाएँ हैं। अत: हम लोग भी लक्ष्मण की भाँति पत्नी और बन्धु बान्धवों के साथ शीघ्र ही इन जानेवाले श्रीराम के ही पीछे- पीछे चल दें। जिस मार्ग से श्रीरघुनाथजी जा रहे हैं, उसी का हम भी अनुसरण करें।' 

‘बाग-बगीचे, घर-द्वार और खेती-बारी - सब छोड़कर धर्मात्मा श्रीराम का अनुगमन करें। इनके दुःख-सुख के साथी बनें। हम अपने घरों की गड़ी हुई निधि निकालें। आँगन की फर्श खोद डालें। सारा धन धान्य साथ ले लें। सारी आवश्यक वस्तुएँ हटा लें। इनमें चारों ओर धूल भर जाये। देवता इन घरों को छोड़कर भाग जायें । चूहे बिल से बाहर निकलकर इनमें चारों ओर दौड़ लगाने लगें और उनसे ये घर भर जाये। इनमें न कभी आग जले, न पानी रहे और न झाड़ू ही लगे। यहाँ बलिवैश्वदेव, यज्ञ, मन्त्रपाठ, होम और जप बंद हो जाये। मानो बड़ा भारी अकाल पड़ गया हो, इस प्रकार ये सारे घर ढह जायें। इनमें टूटे बर्तन बिखरे पड़े हों और हम सदा के लिये इन्हें छोड़ दें – ऐसी दशा में इन घरों पर कैकेयी आकर अधिकार कर ले।' 

'जहाँ पहुँचने के लिये ये श्रीरामचन्द्रजी जा रहे हैं, वह वन ही नगर हो जाये और हमारे छोड़ देने पर यह नगर भी वन के रूप में परिणत हो जाये।  वन में हम लोगों के भय से साँप अपने बिल छोड़कर भाग जायें। पर्वत पर रहनेवाले मृग और पक्षी उसके शिखरों को छोड़ दें तथा हाथी और सिंह भी उन वनों को त्यागकर दूर चले जायें। वे सर्प आदि उन स्थानों में चले जायें, जिन्हें हम लोगों ने छोड़ रखा है और उन स्थानों को त्याग दें, जिनका हम सेवन करते हैं। यह देश घास चरने वाले पशुओं, मांसभक्षी हिंसक जन्तुओं और फल खाने वाले पक्षियों का निवास स्थान बन जाये। यहाँ सर्प, पशु और पक्षी रहने लगें। उस दशा में पुत्र और बन्धु बान्धवों सहित कैकेयी इसे अपने अधिकार में कर ले। हम सब लोग वन में श्रीरघुनाथजी के साथ बड़े आनन्द से रहेंगे।' 

इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीने बहुत-से मनुष्यों के मुँह से निकली हुई तरह-तरह की बातें सुनीं; किंतु सुनकर भी उनके मन में कोई विकार नहीं हुआ। मतवाले गजराज के समान पराक्रमी धर्मात्मा श्रीराम पुनः माता कैकेयी के कैलाश शिखर के सदृश शुभ भवन में गये। विनयशील वीर पुरुषों से युक्त उस राजभवन में प्रवेश करके उन्होंने देखा – सुमन्त्र पास ही दुःखी होकर खड़े हैं। पूर्वजों की निवास भूमि अवध के मनुष्य वहाँ शोक से आतुर होकर खड़े थे। उन्हें देखकर भी श्रीराम स्वयं शोक से पीड़ित नहीं हुए - उनके शरीर पर व्यथा का कोई चिह्न प्रकट नहीं हुआ। वे पिता की आज्ञा का विधिपूर्वक पालन करने की इच्छा से उनका दर्शन करने के लिये हँसते हुए-से आगे बढ़े। 

शोकाकुल रूप से पड़े हुए राजा के पास जानेवाले महात्मा महामना इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीराम वहाँ पहुँचने से पहले सुमन्त्र को देखकर पिता के पास अपने आगमन की सूचना भेजने के लिये उस समय वहीं ठहर गये। पिता के आदेश से वन में प्रवेश करने का बुद्धिपूर्वक निश्चय करके आये हुए धर्मवत्सल श्रीरामचन्द्रजी सुमन्त्र की ओर देखकर बोले - आप महाराज को मेरे आगमन की सूचना दे दें। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-२७(27) समाप्त !

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