भाग-२६(26) त्रिशिरा का वध

 


खर को भगवान् श्रीराम के सम्मुख जाते देख सेनापति राक्षस त्रिशिरा तुरंत उसके पास आ पहुँचा और इस प्रकार बोला - राक्षसराज! मुझ पराक्रमी वीर को इस युद्ध में लगाइये और स्वयं इस साहसपूर्ण कार्य से अलग रहिये। देखिये, मैं अभी महाबाहु राम को युद्ध में मार गिराता हूँ। आपके सामने मैं सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ और अपने हथियार छूकर शपथ खाता हूँ कि जो समस्त राक्षसों के लिये वध के योग्य हैं, उन राम का मैं अवश्य वध करूंगा। 

'इस युद्ध में या तो मैं इनकी मृत्यु बनूँगा, या ये ही समराङ्गण में मेरी मृत्यु का कारण होंगे। आप इस समय अपने युद्धविषयक उत्साह को रोक कर एक मुहूर्त के लिये जय-पराजय को निर्णय करने वाले साक्षी बन जाइये। यदि मेरे द्वारा राम मारे गये तो आप प्रसन्नतापूर्वक जनस्थान को लौट जाइये अथवा यदि राम ने ही मुझे मार दिया तो आप युद्ध के लिये इन पर धावा बोल दीजियेगा।' 

भगवान के हाथ से मृत्यु का लोभ होने के कारण जब त्रिशिरा ने इस प्रकार खर को राजी किया, तब उसने आज्ञा दे दी – 'अच्छा जाओ, युद्ध करो। आज्ञा पाकर वह श्रीरामचन्द्रजी की ओर चला। घोड़े जुते हुए एक तेजस्वी रथ के द्वारा त्रिशिरा ने रणभूमि में श्रीराम पर आक्रमण किया। उस समय वह तीन शिखरों वाले पर्वत के समान जान पड़ता था। उसने आते ही बड़े भारी मेघ की भाँति बाणरूपी धाराओं की वर्षा प्रारम्भ कर दी और वह जल से भीगे हुए नगाड़े की तरह विकट गर्जना करने लगा। 

त्रिशिरा नामक राक्षस को आते देख श्रीरघुनाथजी ने धनुष के द्वारा पैने बाण छोड़ते हुए उसे अपने प्रतिद्वन्द्वी के रूप में ग्रहण किया (अथवा उसे आगे बढ़ने से रोक दिया)। अत्यन्त बलशाली श्रीराम और त्रिशिरा का वह संग्राम महाबली सिंह और गजराज के युद्ध की भाँति बड़ा भयंकर प्रतीत होता था। उस समय त्रिशिरा ने तीन बाणों से श्रीरामचन्द्रजी के ललाट को बींध डाला। 

श्रीराम उसकी यह उद्दण्डता सहन न कर सके। वे कुपित हो रोषावेश में भरकर इस प्रकार बोले – अहो! पराक्रम प्रकट करने में शूरवीर राक्षस का ऐसा ही बल है, जो तुमने फूलों-जैसे बाणों द्वारा मेरे ललाट पर प्रहार किया है। अच्छा, अब धनुष की डोरी से छूटे हुए मेरे बाणों को भी ग्रहण करो। 

ऐसा कहकर रोष में भरे हुए श्रीराम ने त्रिशिरा की छाती में क्रोधपूर्वक चौदह बाण मारे, जो विषधर सर्पों के समान भयंकर थे। तदनन्तर तेजस्वी रघुनाथजी ने झुकी गाँठ वाले चार बाणों से उसके चारों घोड़ों को मार गिराया। फिर आठ सायकों द्वारा उसके सारथि को भी रथ की बैठक में ही सुला दिया। इसके बाद श्रीराम ने एक बाण से उसकी ध्वजा भी काट डाली। तदनन्तर जब वह उस नष्ट हुए रथ से कूदने लगा, उसी समय श्रीराघवेन्द्र ने अनेक बाणों द्वारा उस निशाचर की छाती छेद डाली। फिर तो वह जडवत् हो गया। 

इसके बाद अप्रमेयस्वरूप श्रीराम ने अमर्ष में भरकर तीन वेगशाली एवं विनाशकारी बाणों द्वारा उस राक्षस के तीनों मस्तक काट गिराये। समराङ्गण में खड़ा हुआ वह निशाचर श्रीरामचन्द्रजी के बाणों से पीड़ित हो अपने धड़ से भापसहित रुधिर उगलता हुआ पहले गिरे हुए मस्तकों के साथ ही धराशायी हो गया। तत्पश्चात् खर की सेवामें रहने वाले राक्षस, जो मरने से बचे हुए थे, भाग खड़े हुए। वे व्याघ्र से डरे हुए मृगों के समान भागते ही चले जाते थे, खड़े नहीं होते थे।उन्हें भागते देख रोष में भरे हुए खर ने तुरंत लौटाया और जैसे राहु चन्द्रमा पर आक्रमण करता है, उसी प्रकार उसने श्रीराम पर ही धावा किया। 

इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का भाग-२६(26) समाप्त !

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