खर ने अपने अग्रगामी सैनिकों के साथ आश्रम के पास पहुँच कर क्रोध में भरे हुए शत्रुघाती श्रीराम को देखा, जो हाथ में धनुष लिये खड़े थे। उन्हें देखते ही अपने तीव्र टंकार करने वाले प्रत्यञ्चा सहित धनुष को उठाकर सूत को आज्ञा दी -'मेरा रथ राम के सामने ले चलो'।
खर की आज्ञा से सारथि ने घोड़ों को उधर ही बढ़ाया, जहाँ महाबाहु श्रीराम अकेले खड़े होकर अपने धनुष की टंकार कर रहे थे। खर को श्रीराम के समीप पहुँचा देख श्येनगामी आदि उसके निशाचर मन्त्री भी बड़े जोर से सिंहनाद करके उसे चारों ओर से घेरकर खड़े हो गये। (सौंदर्य-माधुर्यनिधि) प्रभु श्री रामजी को देखकर राक्षसों की सेना थकित रह गई। वे उन पर बाण नहीं छोड़ सके।
मंत्री को बुलाकर खर-दूषण ने कहा - यह राजकुमार कोई मनुष्यों का भूषण है। जितने भी नाग, असुर, देवता, मनुष्य और मुनि हैं, उनमें से हमने न जाने कितने ही देखे, जीते और मार डाले हैं। पर हे सब भाइयों! सुनो, हमने जन्मभर में ऐसी सुंदरता कहीं नहीं देखी। यद्यपि इसने हमारी बहिन को कुरूप कर दिया तथापि ये अनुपम पुरुष वध करने योग्य नहीं हैं। 'छिपाई हुई अपनी स्त्री हमें तुरंत दे दो और दोनों भाई जीते जी घर लौट जाओ'।
उसे सुनते ही श्री रामचंद्रजी मुस्कुराकर बोले - हम क्षत्रिय हैं, यद्यपि हम मनुष्य हैं, परन्तु दैत्यकुल का नाश करने वाले और मुनियों की रक्षा करने वाले हैं, परन्तु दुष्टों को दण्ड देने वाले। यदि बल न हो तो घर लौट जाओ। संग्राम में पीठ दिखाने वाले किसी को मैं नहीं मारता।
उन राक्षसों के बीच में रथ पर बैठा हुआ खर तारों के मध्यभाग में उगे हुए मङ्गलकी भाँति शोभा पा रहा था। उस समय खर ने समराङ्गण में सहस्रों बाणों द्वारा अप्रतिम बलशाली श्रीराम को पीड़ित सा करके बड़े जोर से गर्जना की।
तदनन्तर क्रोध में भरे हुए समस्त निशाचर भयंकर धनुष धारण करनेवाले दुर्जय वीर श्रीराम पर नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करने लगे।
उस समराङ्गण में रुष्ट हुए राक्षसों ने शूरवीर श्रीराम पर लोहे के मुद्दरों, शूलों, प्रासों, खड्गों और फरसों द्वारा प्रहार किया। वे मेघोंके समान काले, विशालकाय और महाबली निशाचर रथों, घोड़ों और पर्वतशिखर के समान गजराजों द्वारा ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम पर चारों ओर से टूट पड़े। वे युद्ध में उन्हें मार डालना चाहते थे। जैसे बड़े-बड़े मेघ गिरिराज पर जल की धाराएँ बरसा रहे हों, उसी प्रकार वे राक्षसगण श्रीराम पर बाणों की वृष्टि कर रहे थे।
क्रूरतापूर्ण दृष्टि से देखनेवाले उन सभी राक्षसों ने श्रीराम को उसी प्रकार घेर रखा था, जैसे प्रदोषसंज्ञक तिथियों में भगवान् शिव के पार्षदगण उन्हें घेरे रहते हैं। श्रीरघुनाथजी ने राक्षसों के छोड़े हुए उन अस्त्र-शस्त्रों को अपने बाणों द्वारा उसी तरह ग्रस लिया, जैसे समुद्र नदियों के प्रवाह को आत्मसात् कर लेता है। उन राक्षसों के घोर अस्त्र-शस्त्रों के प्रहार से यद्यपि श्रीराम का शरीर क्षत-विक्षत हो गया था तो भी वे व्यथित या विचलित नहीं हुए, जैसे बहुसंख्यक दीप्तिमान् वज्रों के आघात सहकर भी महान् पर्वत अडिग बना रहता है।
श्रीरघुनाथजी के सारे अङ्गों में अस्त्र-शस्त्रों के आघात से घाव हो गया था। वे लहूलुहान हो रहे थे, अत: उस समय संध्याकाल के बादलों से घिरे हुए सूर्यदेव के समान शोभा पा रहे थे। श्रीराम अकेले थे। उस समय उन्हें अनेक सहस्र शत्रुओं से घिरा हुआ देख देवता, सिद्ध, गन्धर्व और महर्षि विषाद में डूब गये। देवता यह देखकर डरते हैं कि प्रेत (राक्षस) चौदह हजार हैं और अयोध्यानाथ श्री रामजी अकेले हैं। देवता और मुनियों को भयभीत देखकर माया के स्वामी प्रभु ने एक बड़ा कौतुक किया, जिससे शत्रुओं की सेना एक-दूसरे को राम रूप देखने लगी और आपस में ही युद्ध करके लड़ मरी। सब ('यही राम है, इसे मारो' इस प्रकार) राम-राम कहकर शरीर छोड़ते हैं और निर्वाण (मोक्ष) पद पाते हैं। कृपानिधान श्री रामजी ने यह उपाय करके क्षण भर में शत्रुओं को मार डाला।
तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजी ने अत्यन्त कुपित हो अपने धनुष को इतना खींचा कि वह गोलाकार दिखायी देने लगा। फिर तो वे उस धनुष से रणभूमि में सैकड़ों, हजारों ऐसे पैने बाण छोड़ने लगे, जिन्हें रोकना सर्वथा कठिन था, जो दुःसह होने के साथ ही कालपाश के समान भयंकर थे। उन्होंने खेल-खेल में ही चील के परों से युक्त असंख्य सुवर्णभूषित बाण छोड़े। शत्रु के सैनिकों पर श्रीराम द्वारा लीलापूर्वक छोड़े गये वे बाण कालपाश के समान राक्षसों के प्राण लेने लगे।
राक्षसों के शरीरों को छेदकर खून में डूबे हुए वे बाण जब आकाश में पहुँचते, तब प्रज्वलित अग्नि के समान तेज से प्रकाशित होने लगते थे। श्रीराम के मण्डलाकार धनुष से अत्यन्त भयंकर और राक्षसों के प्राण लेने वाले असंख्य बाण छूटने लगे। उन बाणों द्वारा श्रीराम ने समराङ्गण में शत्रुओं के सैकड़ों-हजारों धनुष, ध्वजाओं के अग्रभाग, ढाल, कवच, आभूषणों सहित भुजाएँ तथा हाथी की सूँड़ के समान जाँघें काट डालीं। प्रत्यञ्चा से छूटे हुए श्रीराम के बाणों ने उस समय सोने के साज- बाज एवं कवच से सजे और रथों में जुते हुए घोड़ों, सारथियों, हाथियों, हाथीसवारों, घोड़ों और घुड़सवारों को भी छिन्न-भिन्न कर डाला। इसी प्रकार श्रीराम ने समरभूमि में पैदल सैनिकों को भी मारकर यमलोक पहुँचा दिया।
उस समय उन के नालीक, नाराच और तीखे अग्रभागवाले विकर्णी नामक बाणों द्वारा छिन्न-भिन्न होते हुए निशाचर भयंकर आर्तनाद करने लगे। श्रीराम द्वारा चलाये हुए नाना प्रकार के मर्मभेदी बाणों द्वारा पीड़ित हुई वह राक्षस सेना आग से जलते हुए सूखे नक की भाँति सुख-शान्ति नहीं पाती थी। कुछ भयंकर बलशाली शूरवीर निशाचर अत्यन्त कुपित हो श्रीराम पर प्रासों, शूलों और फरसों का प्रहार करने लगे। परंतु पराक्रमी महाबाहु श्रीराम ने रणभूमि में अपने बाणों द्वारा उनके उन अस्त्र-शस्त्रों को रोककर उनके गले काट डाले और प्राण हर लिये। सिर, ढाल और धनुष के कट जाने पर वे निशाचर गरुड़ के पंख की हवा से टूटकर गिरने वाले नन्दनवन के वृक्षों की भाँति धराशायी हो गये। जो बचे थे, वे राक्षस भी श्रीराम के बाणों से आहत हो विषाद में डूब गये और अपनी रक्षा के लिये खर के पास ही दौड़े गये।
परंतु बीच में दूषण ने धनुष लेकर उन सबको आश्वासन दिया और अत्यन्त कुपित हो रोष में भरे हुए यमराज की भाँति वह क्रुद्ध होकर युद्ध के लिये डटे हुए श्रीरामचन्द्रजी की ओर दौड़ा। दूषण का सहारा मिल जाने से निर्भय हो वे सब-के-सब फिर लौट आये और साखू, ताड़ आदि के वृक्ष तथा पत्थर पुन: श्रीराम पर ही टूट पड़े। उस युद्धस्थलमें अपने हाथों में शूल, मुद्गर और पाश धारण किये वे महाबली निशाचर बाणों तथा अन्य अस्त्र- शस्त्रों की वर्षा करने लगे।
कोई राक्षस वृक्षों की वर्षा करने लगे तो कोई पत्थरों की। उस समय इन श्रीराम और उन निशाचरों में पुन: बड़ा ही अद्भुत, महाभयंकर, घमासान और रोमाञ्चकारी युद्ध होने लगा। वे राक्षस कुपित होकर चारों ओर से पुन: श्रीरामचन्द्रजी को पीड़ित करने लगे। तब सब ओर से आये हुए राक्षसों से सम्पूर्ण दिशाओं और उपदिशाओं को घिरी हुई देख बाण - वर्षा से आच्छादित हुए महाबली श्रीराम ने भैरव-नाद करके उन राक्षसों पर परम तेजस्वी गन्धर्व नामक अस्त्र का प्रयोग किया। फिर तो उनके मण्डलाकार धनुष से सहस्रों बाण छूटने लगे। उन बाणों से दसों दिशाएँ पूर्णत: आच्छादित हो गयीं।
बाणों से पीड़ित राक्षस यह नहीं देख पाते थे कि श्रीरामचन्द्रजी कब भयंकर बाण हाथ में लेते हैं और कब उन उत्तम बाणों को छोड़ देते हैं। वे केवल उनको धनुष खींचते देखते थे। श्रीरामचन्द्रजी के बाणसमुदायरूपी अन्धकार ने सूर्यसहित सारे आकाशमण्डल को ढक दिया। उस समय श्रीराम उन बाणों को लगातार छोड़ते हुए एक स्थान पर खड़े थे। एक ही समय बाणों द्वारा अत्यन्त घायल हो एक साथ ही गिरते और गिरे हुए बहुसंख्यक राक्षसों की लाशों से बाँकी भूमि पट गयी। जहाँ-जहाँ दृष्टि जाती थी, वहीं-वहीं वे हजारों राक्षस मरे, गिरे, क्षीण हुए, कटे-पिटे और विदीर्ण हुए दिखायी देते थे।
वहाँ श्रीराम के बाणों से कटे हुए पगड़ियों सहित मस्तकों, बाजूबंदसहित भुजाओं, जाँघों, बाँहों, भाँति-भाँति के आभूषणों, घोड़ों, श्रेष्ठ हाथियों, टूटे-फूटे अनेकानेक रथों, चँवरों, व्यजनों, छत्रों, नाना प्रकार की ध्वजाओं, छिन्न-भिन्न हुए शूलों, पट्टिशों, खण्डित खड्गों, बिखरे प्रासों, फरसों, चूर-चूर हुई शिलाओं तथा टुकड़े-टुकड़े हुए बहुतेरे विचित्र बाणों से पटी हुई वह समरभूमि अत्यन्त भयंकर दिखायी देती थी। उन सबको मारा गया देख शेष राक्षस अत्यन्त आतुर हो वहाँ शत्रुनगरी पर विजय पाने वाले श्रीराम के सम्मुख जाने में असमर्थ हो गये।
