भाग-२४(24) श्रीराम के पूछने पर विश्वामित्रजी का उनसे तारका की उत्पत्ति, विवाह एवं शाप आदि का प्रसंग सुनाकर उन्हें तारका - वध के लिये प्रेरित करना तथा श्रीराम द्वारा तारका का वध

 


अपरिमित प्रभावशाली विश्वामित्र मुनि का यह उत्तम वचन सुनकर पुरुष सिंह श्रीराम ने यह शुभ बात कही - मुनिश्रेष्ठ! जब वह यक्षिणी एक अबला सुनी जाती है, तब तो उसकी शक्ति थोड़ी ही होनी चाहिये; फिर वह एक हजार हाथियों का बल कैसे धारण करती है ?

अमित तेजस्वी श्रीरघुनाथ के कहे हुए इस वचन को सुनकर विश्वामित्रजी अपनी मधुर वाणी द्वारा लक्ष्मण सहित शत्रुदमन श्रीराम को हर्ष प्रदान करते हुए बोले - रघुनन्दन ! जिस कारण से तारका अधिक बलशालिनी हो गयी है, वह बताता हूँ, सुनो। उसमें वरदानजनित बल का उदय हुआ है; अतः वह अबला होकर भी बल धारण करती है। (सबला हो गयी है।) 

‘पूर्वकाल की बात है, सुकेतु नाम से प्रसिद्ध एक महान् यक्ष थे। वे बड़े पराक्रमी और सदाचारी थे; परंतु उन्हें कोई संतान नहीं थी; इसलिये उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की। श्रीराम! यक्षराज सुकेतु की उस तपस्या से ब्रह्माजी को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने सुकेतु को एक कन्यारन्त प्रदान किया, जिसका नाम तारका था।' 

'ब्रह्माजी ने ही उस कन्या को एक हजार हाथियों के समान बल दे दिया; परंतु उन महायशस्वी पितामह ने उस यक्ष को पुत्र नहीं ही दिया (उसके संकल्पके अनुसार पुत्र प्राप्त हो जाने पर उसके द्वारा जनता का अत्यधिक उत्पीड़न होता, यही सोचकर ब्रह्माजी ने पुत्र नहीं दिया)। धीरे-धीरे वह यक्ष-बालिका बढ़ने लगी और बढ़कर रूप-यौवन से सुशोभित होने लगी। उस अवस्था में सुकेतु ने अपनी उस यशस्विनी कन्या को जम्भपुत्र सुन्द के हाथ में उसकी पन्ती के रूप में दे दिया।' 

'कुछ काल के बाद उस यक्षी तारका ने मारीच नाम से प्रसिद्ध एक दुर्जय पुत्र को जन्म दिया, जो अगस्त्य मुनि के शाप से राक्षस हो गया। श्रीराम! अगस्त्य ने ही शाप देकर तारका पति सुन्द को भी मार डाला। उसके मारे जाने पर तारका पुत्र सहित जाकर मुनिवर अगस्त्य को भी मौत के घाट उतार देने की इच्छा करने लगी। वह कुपित हो मुनि को खा जाने के लिये गर्जना करती हुई दौड़ी। 

उसे आती देख भगवान् अगस्त्य मुनि ने मारीच से कहा - तू देवयोनि-रूप का परित्याग करके राक्षसभाव को प्राप्त हो जा।  फिर अत्यन्त अमर्ष में भरे हुए ऋषि ने तारका को भी शाप दे दिया - तू विकराल मुखवाली नरभक्षिणी राक्षसी हो जा। तू है तो महायक्षी; परंतु अब शीघ्र ही इस रूप को त्यागकर तेरा भयङ्कर रूप हो जाये। 

'इस प्रकार शाप मिलने के कारण तारका का अमर्ष और भी बढ़ गया। वह क्रोध से मूर्च्छित हो उठी और उन दिनों अगस्त्यजी जहाँ रहते थे, उस सुन्दर देश को उजाड़ने लगी। रघुनन्दन! तुम गौओं और ब्राह्मणों का हित करने के लिये दुष्ट पराक्रम वाली इस परम भयङ्कर दुराचारिणी यक्षी का वध कर डालो। रघुकुल को आनन्दित करनेवाले वीर ! इस शापग्रस्त तारका को मारने के लिये तीनों लोकों में तुम्हारे सिवा दूसरा कोई पुरुष समर्थ नहीं है।' 

'नरश्रेष्ठ! तुम स्त्री-हत्या का विचार करके इसके प्रति दया न दिखाना। एक राजपुत्र को चारों वर्णों के हित के लिये स्त्री हत्या भी करनी पड़े तो उससे मुँह नहीं मोड़ना चाहिये। प्रजापालक नरेश को प्रजाजनों की रक्षा के लिये क्रूरतापूर्ण या क्रूरता रहित, पातक युक्त अथवा सदोष कर्म भी रना पड़े तो कर लेना चाहिये। यह बात उसे सदा ही ध्यान में रखनी चाहिये। जिनके ऊपर राज्य के पालन का भार है, उनका तो यह सनातन धर्म है।' 

'ककुत्स्थकुलनन्दन ! तारका महापापिनी है। उसमें धर्म का लेशमात्र भी नहीं है; अतः उसे मार डालो। नरेश्वर! सुना जाता है कि पूर्वकाल में विरोचन की पुत्री मन्थरा (यहाँ जिस मंथरा का उल्लेख किया गया है वह कैकई की दासी नहीं अपितु कोई अन्य है। केवल इनके नाम में ही समानता है।) सारी पृथ्वी का नाश कर डालना चाहती थी। उसके इस विचार को जानकर इन्द्र ने उसका वध कर डाला। श्रीराम! प्राचीन काल में शुक्राचार्य की माता तथा भृगु की पतिव्रता पत्नी त्रिभुवन को इन्द्र से शून्य कर देना चाहती थीं। यह जानकर भगवान् विष्णु ने उनको मार डाला।' 

'इन्होंने तथा अन्य बहुत से महामनस्वी पुरुष प्रवर राजकुमारों ने पापचारिणी स्त्रियों का वध किया है। नरेश्वर ! अत: तुम भी मेरी आज्ञा से दया अथवा घृणा को त्यागकर इस राक्षसी को मार डालो।' 

मुनि के ये उत्साह भरे वचन सुनकर दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करनेवाले राजकुमार श्रीराम ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया – भगवन्! अयोध्या में मेरे पिता महामना महाराज दशरथ ने अन्य गुरुजनों के बीच मुझे यह उपदेश दिया था कि ‘पुत्र! तुम पिता के कहने से पिता के वचनों का गौरव रखने के लिये कुशिकनन्दन विश्वामित्र की आज्ञा का निःशङ्क होकर पालन करना। कभी भी उनकी बात की अवहेलना न करना'। अत: मैं पिताजी के उस उपदेश को सुनकर आप ब्रह्मवादी महात्मा की आज्ञा से तारका वधसम्बन्धी कार्य को उत्तम मानकर करूँगा- इसमें संदेह नहीं है। गौ, ब्राह्मण तथा समूचे देश का हित करने के लिये मैं आप जैसे अनुपम प्रभावशाली महात्मा के आदेश का पालन करने को सब प्रकारसे तैयार हूँ। 

ऐसा कहकर शत्रुदमन श्रीराम ने धनुष के मध्यभाग में मुट्ठी बाँधकर उसे जोर से पकड़ा और उसकी प्रत्यञ्चा पर तीव्र टङ्कार दी। उसकी आवाज से सम्पूर्ण दिशाएँ गूंज उठीं। उस शब्द से तारका वन में रहनेवाले समस्त प्राणी थर्रा उठे। तारका भी उस टङ्कार घोष से पहले तो किंकर्तव्यविमूढ़ हो उठी; परंतु फिर कुछ सोचकर अत्यन्त क्रोध में भर गयी। उस शब्द को सुनकर वह राक्षसी क्रोध से अचेत सी हो गयी थी। उसे सुनते ही वह जहाँ से आवाज आयी थी, उसी दिशा की ओर रोषपूर्वक दौड़ी। 

उसके शरीर की ऊँचाई बहुत अधिक थी। उसकी मुखाकृति विकृत दिखायी देती थी। क्रोध में भरी हुई उस विकराल राक्षसी की ओर दृष्टिपात करके श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा - लक्ष्मण! देखो तो सही, इस यक्षिणी का शरीर कैसा दारुण एवं भयङ्कर है ! इसके दर्शनमात्र से भीरु पुरुषों के हृदय विदीर्ण हो सकते हैं। मायाबल से सम्पन्न होने के कारण यह अत्यन्त दुर्जय हो रही है। देखो, मैं अभी इसके कान और नाक काटकर इसे पीछे लौटने को विवश किये देता हूँ। यह अपने स्त्रीस्वभाव के कारण रक्षित है; अतः मुझे इसे मारने में उत्साह नहीं है। मेरा विचार यह है कि मैं इसके बल-पराक्रम तथा गमनशक्ति को नष्ट कर दूँ (अर्थात् इसके हाथ-पैर काट डालूँ)। 

श्रीराम इस प्रकार कह ही रहे थे कि क्रोध से अचेत हुई तारका वहाँ आ पहुँची और एक बाँह उठाकर गर्जना करती हुई उन्हीं की ओर झपटी। यह देख ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने अपने हुंकार के द्वारा उसे डाँटकर कहा – रघुकुल के इन दोनों राजकुमारों का कल्याण हो। इनकी विजय हो। 

तब तारका ने उन दोनों रघुवंशी वीरों पर भयङ्कर धूल उड़ाना आरम्भ किया। वहाँ धूल का विशाल बादल-सा छा गया। उसके द्वारा उसने श्रीराम और लक्ष्मण को दो घड़ी तक मोह में डाल दिया। तत्पश्चात् माया का आश्रय लेकर वह उन दोनों भाइयों पर पत्थरों की बड़ी भारी वर्षा करने लगी। यह देख रघुनाथजी उसपर कुपित हो उठे। रघुवीर ने अपनी बाणवर्षा के द्वारा उसकी बड़ी भारी शिलावृष्टि को रोककर अपनी ओर आती हुई उस निशाचरी के दोनों हाथ तीखे सायकों से काट डाले। 

दोनों भुजाएँ कट जाने से थकी हुई तारका उनके निकट खड़ी होकर जोर-जोर से गर्जना करने लगी । यह देख सुमित्रा कुमार लक्ष्मण ने क्रोध में भरकर उसके नाक-कान काट लिये। परंतु वह तो इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली यक्षिणी थी; अतः अनेक प्रकार के रूप बनाकर अपनी माया से श्रीराम और लक्ष्मण को मोह में डालती हुई अदृश्य हो गयी। 

अब वह पत्थरों की भयङ्कर वर्षा करती हुई आकाश में विचरने लगी। श्रीराम और लक्ष्मण पर चारों ओर से प्रस्तरों की वृष्टि होती देख तेजस्वी गाधिनन्दन विश्वामित्र ने इस प्रकार कहा - श्रीराम ! इसके ऊपर तुम्हारा दया करना व्यर्थ है। यह बड़ी पापिनी और दुराचारिणी है। सदा यज्ञों में विघ्न डाला करती है। यह अपनी माया से पुनः प्रबल हो उठे, इसके पहले ही इसे मार डालो। अभी संध्याकाल आना चाहता है, इसके पहले ही यह कार्य हो जाना चाहिये; क्योंकि संध्या के समय राक्षस दुर्जय हो जाते हैं। 

विश्वामित्रजी के ऐसा कहने पर श्रीराम ने शब्दवेधी बाण चलाने की शक्ति का परिचय देते हुए बाण मारकर प्रस्तरों की वर्षा करनेवाली उस यक्षिणी को सब ओर से अवरुद्ध कर दिया। उनके बाण समूह से घिर जाने पर मायाबल से युक्त वह यक्षिणी जोर-जोर से गर्जना करती हुई श्रीराम और लक्ष्मण के ऊपर टूट पड़ी। उसे चलाये हुए इन्द्र के वज्र की भाँति वेग से आती देख श्रीराम ने एक बाण मारकर उसकी छाती चीर डाली। तब तारका पृथ्वी पर गिरी और मर गयी। 

उस भयङ्कर राक्षसी को मारी गयी देख देवराज इन्द्र तथा देवताओं ने श्रीराम कि सराहना की। साधुवाद देते हुए उनकी उस समय सहस्रलोचन इन्द्र तथा समस्त देवताओं ने अत्यन्त प्रसन्न एवं हर्षोत्फुल्ल होकर विश्वामित्रजी से कहा – मुने! कुशिकनन्दन! आपका कल्याण हो। आपने इस कार्य से इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओं को संतुष्ट किया है। अब रघुकुलतिलक श्रीराम पर आप अपना स्नेह प्रकट कीजिये। ब्रह्मन् ! प्रजापति कृशाश्व के अस्त्र- -रूप धारी पुत्रों को, जो सत्यपराक्रमी तथा तपोबल से सम्पन्न हैं, श्रीराम को समर्पित कीजिये। विप्रवर! ये आपके अस्त्रदान के सुयोग्य पात्र हैं तथा आपके अनुसरण (सेवा-शुश्रूषा) में तत्पर रहते हैं। राजकुमार श्रीराम के द्वारा देवताओं का महान् कार्य सम्पन्न होनेवाला है। 

ऐसा कहकर सभी देवता विश्वामित्रजी की प्रशंसा करते हुए प्रसन्नतापूर्वक आकाशमार्ग से चले गये। तत्पश्चात् संध्या हो गयी। तदनन्तर तारका वध से संतुष्ट हुए मुनिवर विश्वामित्र ने श्रीरामचन्द्रजी का मस्तक सूँघकर उनसे यह बात कही – शुभदर्शन राम! आज की रात में हमलोग यहीं निवास करें। कल सबेरे अपने आश्रम पर चलेंगे। 

विश्वामित्रजी की यह बात सुनकर दशरथकुमार श्रीराम बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने तारका वन में रहकर वह रात्रि बड़े सुख से व्यतीत की। उसी दिन वह वन शापमुक्त होकर रमणीय शोभा से सम्पन्न हो गया और चित्ररथ वन की भाँति अपनी मनोहर छटा दिखाने लगा। यक्षकन्या तारका का वध करके श्रीरामचन्द्रजी देवताओं तथा सिद्धसमूहों की प्रशंसा के पात्र बन गये। उन्होंने प्रातःकाल की प्रतीक्षा करते हुए विश्वामित्रजी के साथ तारका वन में निवास किया। 

इति श्रीमद् राम कथा बालकाण्ड अध्याय-५ का भाग-२४(24) समाप्त !

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