प्रचण्ड पराक्रमी खर जब श्रीराम के आश्रम की ओर चला, तब भाईसहित श्रीराम ने भी उन्हीं उत्पात-सूचक लक्षणों को देखा। प्रजा के अहित की सूचना देने वाले उन महाभयंकर उत्पातों को देखकर श्रीरामचन्द्रजी राक्षसों के उपद्रव का विचार करके अत्यन्त अमर्ष में भर गये और लक्ष्मण से इस प्रकार बोले – महाबाहो ! ये जो बड़े-बड़े उत्पात प्रकट हो रहे हैं, इनकी ओर दृष्टिपात करो। समस्त भूतों के संहार की सूचना देने वाले ये महान् उत्पात इस समय इन सारे राक्षसों का संहार करने के लिये उत्पन्न हुए हैं। आकाश में जो गधों के समान धूसर वर्ण वाले बादल इधर-उधर विचर रहे हैं, ये प्रचण्ड गर्जना करते हुए खून की धाराएँ बरसा रहे हैं।
‘युद्धकुशल लक्ष्मण! मेरे सारे बाण उत्पात वश उठने वाले धूम से सम्बद्ध हो युद्ध के लिये मानो आनन्दित हो रहे हैं तथा जिनके पृष्ठभाग में सुवर्ण मढ़ा हुआ है, वे मेरे धनुष भी प्रत्यञ्चा से जुड़ जाने के लिये स्वयं ही चेष्टाशी पड़ते हैं। यहाँ जैसे-जैसे वनचारी पक्षी बोल रहे हैं, उनसे हमारे लिये भविष्य में अभय की और राक्षसों के लिये प्राणसंकट की प्राप्ति सूचित हो रही है। मेरी यह दाहिनी भुजा बारंबार फड़क कर इस बात की सूचना देती है कि कुछ ही देर में बहुत बड़ा युद्ध होगा, इसमें संशय नहीं है।'
‘शूरवीर लक्ष्मण! परंतु निकट भविष्य में ही हमारी विजय और शत्रु की पराजय होगी; क्योंकि तुम्हारा मुख कान्तिमान् एवं प्रसन्न दिखायी दे रहा है। लक्ष्मण! युद्ध के लिये उद्यत होने पर जिनका मुख प्रभाहीन (उदास) हो जाता है, उनकी आयु नष्ट हो जाती है। गरजते हुए राक्षसों का यह घोर नाद सुनायी देता है, तथा क्रूरकर्मा राक्षसों द्वारा बजायी गयी भेरियों की यह महाभयंकर ध्वनि कानों में पड़ रही है। अपना कल्याण चाहने वाले विद्वान् पुरुष को उचित है कि आपत्ति की आशङ्का होने पर पहले से ही उससे बचने का उपाय कर ले।'
‘इसलिये तुम धनुष-बाण धारण करके विदेहकुमारी सीता को साथ ले पर्वत की उस गुफा में चले जाओ, जो वृक्षों से आच्छादित है। वत्स! तुम मेरे इस वचन के प्रतिकूल कुछ कहो या करो, यह मैं नहीं चाहता। अपने चरणों की शपथ दिलाकर कहता हूँ, शीघ्र चले जाओ। इसमें संदेह नहीं कि तुम बलवान् और शूरवीर हो तथा इन राक्षसों का वध कर सकते हो; तथापि मैं स्वयं ही इन निशाचरों का संहार करना चाहता हूँ (इसलिये तुम मेरी बात मानकर सीता को सुरक्षित रखने के लिये इसे गुफा में ले जाओ )।'
श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर लक्ष्मण धनुष-बाण ले सीता के साथ पर्वत की दुर्गम गुफा में चले गये। सीता सहित लक्ष्मण के गुफा के भीतर चले जाने पर श्रीरामचन्द्रजी ने 'हर्ष की बात है, लक्ष्मण ने शीघ्र मेरी बात मान ली और सीता की रक्षा का समुचित प्रबन्ध हो गया' ऐसा कहकर कवच धारण किया।
प्रज्वलित आग के समान प्रकाशित होने वाले उस कवच से विभूषित हो श्रीराम अन्धकार में प्रकट हुए महान् अग्निदेव के समान शोभा पाने लगे। पराक्रमी श्रीराम महान् धनुष एवं बाण हाथ में लेकर युद्ध के लिये डटकर खड़े हो गये और प्रत्यञ्चाकी टंकार से सम्पूर्ण दिशाओं को गुँजाने लगे। तदनन्तर श्रीराम और राक्षसों का युद्ध देखने की इच्छा से देवता, गन्धर्व, सिद्ध और चारण आदि महात्मा वहाँ एकत्र हो गये।
इनके सिवा, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध ब्रह्मर्षि-शिरोमणि पुण्यकर्मा महात्मा ऋषि हैं, वे सभी वहाँ जुट गये और एक साथ खड़े हो परस्पर मिलकर यों कहने लगे - 'गौओं, ब्राह्मणों और समस्त लोकों का कल्याण हो। जैसे चक्रधारी भगवान् विष्णु युद्ध में समस्त श्रेष्ठ असुरों को परास्त कर देते हैं, उसी प्रकार इस संग्राम में श्रीरामचन्द्रजी पुलस्त्यवंशी निशाचरों पर विजय प्राप्त करें।
ऐसा कहकर वे पुन: एक-दूसरे की ओर देखते हुए बोले - एक ओर भयंकर कर्म करने वाले चौदह हजार राक्षस हैं और दूसरी ओर अकेले धर्मात्मा श्रीराम हैं, फिर यह युद्ध कैसे होगा?
ऐसी बातें करते हुए राजर्षि, सिद्ध, विद्याधर आदि देवयोनिगण सहित श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि तथा विमान पर स्थित हुए देवता कौतूहल वश वहाँ खड़े हो गये। युद्ध के मुहाने पर वैष्णव तेज से आविष्ट हुए श्रीराम को खड़ा देख उस समय सब प्राणी (उनके प्रभाव को न जानने के कारण भय से व्यथित हो उठे।) अनायास ही महान् कर्म करने वाले तथा रोष में भरे हुए महात्मा श्रीराम का वह रूप कुपित हुए रुद्रदेव के समान तुलनारहित प्रतीत होता था।
जब देवता, गन्धर्व और चारण पूर्वोक्तरूप से श्रीराम की मङ्गलकामना कर रहे थे, उसी समय भयंकर ढाल- तलवार आदि आयुधों और ध्वजाओं से उपलक्षित होने वाली निशाचरों की वह सेना गम्भीर गर्जना करती हुई चारों ओर से श्रीरामजी के पास आ पहुँची। वे राक्षस-सैनिक वीरोचित वार्तालाप करते, युद्ध का ढंग बताने के लिये एक-दूसरे के सामने जाते, धनुषों को खींचकर उनकी टंकार फैलाते, बारंबार मदमत्त होकर उछलते, जोर-जोर से गर्जना करते और नगाड़े पीटते थे। उनका वह अत्यन्त तुमुल नाद उस वन में सब ओर गूंजने लगा।
उस शब्द से डरे हुए वनचारी हिंसक जन्तु उस वन में गये, जहाँ किसी प्रकार का कोलाहल नहीं सुनायी पड़ता था। वे वन्यजन्तु भय के मारे पीछे फिरकर देखते भी नहीं थे। वह सेना बड़े वेग से श्रीराम की ओर चली। उसमें नाना प्रकार के आयुध धारण करने वाले सैनिक थे। वह समुद्र के समान गम्भीर दिखायी देती थी। युद्धकला के विद्वान् श्रीरामचन्द्रजी ने भी चारों ओर दृष्टिपात करते हुए खर की सेना का निरीक्षण किया और वे युद्ध के लिये उसके सामने बढ़ गये।
फिर उन्होंने तरकस से अनेक बाण निकाले और अपने भयंकर धनुष को खींचकर सम्पूर्ण राक्षसों का वध करने के लिये तीव्र क्रोध प्रकट किया। कुपित होने पर वे प्रलयकालिक अग्नि के समान प्रज्वलित होने लगे। उस समय उनकी ओर देखना भी कठिन हो गया। तेज से आविष्ट हुए श्रीराम को देखकर वन के देवता व्यथित हो उठे। उस समय रोष में भरे हुए श्रीराम का रूप दक्षयज्ञ का विनाश करने के लिये उद्यत हुए पिनाकधारी महादेवजी के समान दिखायी देने लगा। धनुषों, आभूषणों, रथों और अग्नि के समान कान्ति वाले चमकीले कवचों से युक्त वह पिशाचों की सेना सूर्योदयकाल में नीले मेघों की घटा के समान प्रतीत होती थीं।
