उस सेना के प्रस्थान करते समय आकाश में गधे के समान धूसर रंग वाले बादलों की महाभयंकर घटा घिर आयी। उसकी तुमुल गर्जना होने लगी तथा सैनिकों के ऊपर घोर अमङ्गलसूचक रक्तमय जल की वर्षा आरम्भ हो गयी। खर के रथ में जुते हुए महान् वेगशाली घोड़े फूल बिछे हुए समतल स्थान में सड़क पर चलते-चलते अकस्मात् गिर पड़े।
सूर्यमण्डल के चारों ओर अलातचक्र के समान गोलाकार घेरा दिखायी देने लगा, जिसका रंग काला और किनारे का रंग लाल था। तदनन्तर खर के रथ की सुवर्णमय दण्डवाली ऊँची ध्वजा पर एक विशालकाय गीध आकर बैठ गया, जो देखने में बड़ा ही भयंकर था। कठोर स्वर वाले मांसभक्षी पशु और पक्षी जनस्थान के पास आकर विकृत स्वर में अनेक प्रकार के विकट शब्द बोलने लगे तथा सूर्य की प्रभा से प्रकाशित हुई दिशाओं में जोर-जोर से चीत्कार करने वाले और मुँह से आग उगलने वाले भयंकर गीदड़ राक्षसों के लिये अमङ्गलजनक भैरवनाद करने लगे।
भयंकर मेघ, जो मद की धारा बहाने वाले गजराज के समान दिखायी देते थे और जल की जगह रक्त धारण किये हुए थे, तत्काल घिर आये। उन्होंने समूचे आकाश को ढक दिया। थोड़ा-सा भी अवकाश नहीं रहने दिया। सब ओर अत्यन्त भयंकर तथा रोमाञ्चकारी घना अन्धकार छा गया। दिशाओं अथवा कोणों का स्पष्ट रूप से भान नहीं हो पाता था। बिना समय के ही खून से भीगे हुए वस्त्र के समान रंग वाली संध्या प्रकट हो गयी। उस समय भयंकर पशु-पक्षी खर के सामने आकर गर्जना करने लगे।
भय की सूचना देने वाले कङ्क (सफेद चील), गीदड़ और गीध खर के सामने चीत्कार करने लगे। युद्ध में सदा अमङ्गल सूचित करने वाली और भय दिखाने वाली गीदड़ियाँ खर की सेना के सामने आकर आग उगलने वाले मुखों से घोर शब्द करने लगीं। सूर्य के निकट परिघ के समान कबन्ध (सिर कटा हुआ धड़) दिखायी देने लगा। महान् ग्रह राहु अमावास्या के बिना ही सूर्य को ग्रसने लगा। हवा तीव्र गति से चलने लगी एवं सूर्यदेव की प्रभा फीकी पड़ गयी।
बिना रात के ही जुगनू के समान चमकने वाले तारे आकाश में उदित हो गये। सरोवरों में मछली और जलपक्षी विलीन हो गये। उनके कमल सूख गये। उस क्षण में वृक्षों के फूल और फल झड़ गये। बिना हवा के ही बादलों के समान धूसर रंग की धूल ऊपर उठकर आकाश में छा गयी। वहाँ वन की सारिकाएँ चें चें करने लगीं। भारी आवाज के साथ भयानक उल्काएँ आकाश से पृथ्वी पर गिरने लगीं। पर्वत, वन और काननों सहित धरती डोलने लगी। बुद्धिमान् खर रथ पर बैठकर गर्जना कर रहा था। उस समय उसकी बायीं भुजा सहसा काँप उठी। स्वर अवरुद्ध हो गया और सब ओर देखते समय उसकी आँखों में आँसू आने लगे।उसके सिर में दर्द होने लगा, फिर भी मोहवश वह युद्ध से निवृत्त नहीं हुआ।
उस समय प्रकट हुए उन बड़े-बड़े रोमाञ्चकारी उत्पातों को देखकर खर जोर-जोर से हँसने लगा और समस्त राक्षसों से बोला - ये जो भयानक दिखायी देने वाले बड़े-बड़े उत्पात प्रकट हो रहे हैं, इन सबकी मैं अपने बल के भरोसे कोई परवाह नहीं करता; ठीक उसी तरह, जैसे बलवान् वीर दुर्बल शत्रुओं को कुछ नहीं समझता है। मैं अपने तीखे बाणों द्वारा आकाश से तारों को भी गिरा सकता हूँ। यदि कुपित हो जाऊँ तो मृत्यु को भी मौत के मुख में डाल सकता हूँ। आज बल का घमंड रखने वाले राम और उसके भाई लक्ष्मण को तीखे बाणों से मारे बिना मैं पीछे नहीं लौट सकता।
‘जिसे दण्ड देने के लिये राम और लक्ष्मण की बुद्धि में विपरीत विचार (क्रूरतापूर्ण कर्म करने के भाव ) का उदय हुआ है, वह मेरी बहिन शूर्पणखा उन दोनों का खून पीकर सफलमनोरथ हो जाय। आज तक जितने युद्ध हुए हैं, उनमें से किसी में भी पहले मेरी कभी पराजय नहीं हुई है; यह तुम लोगों ने प्रत्यक्ष देखा है। मैं झूठ नहीं कहता हूँ। मैं मतवाले ऐरावत पर चलने वाले वज्रधारी देवराज इन्द्र को भी रणभूमि में कुपित होकर काल के गाल में डाल सकता हूँ, फिर उन दो मनुष्यों की तो बात ही क्या है ?'
खर की यह गर्जना सुनकर राक्षसों की वह विशाल सेना, जो मौत के पाश से बँधी हुई थी, अनुपम हर्ष से भर गयी। उस समय युद्ध देखने की इच्छा वाले बहुत से पुण्यकर्मा महात्मा, ऋषि, देवता, गन्धर्व, सिद्ध और चारण वहाँ एकत्र हो गये। एकत्र हो वे सभी मिलकर एक-दूसरे से कहने लगे – गौओं और ब्राह्मणोंका कल्याण हो तथा जो अन्य लोकप्रिय महात्मा हैं, वे भी कल्याण के भागी हों। जैसे चक्रधारी भगवान् विष्णु समस्त असुरशिरोमणियों को परास्त कर देते हैं, उसी प्रकार रघुकुलभूषण श्रीराम युद्ध में इन पुलस्त्यवंशी निशाचरों को पराजित करें।
ये तथा और भी बहुत-सी मङ्गलकामना सूचक बातें कहते हुए वे महर्षि और देवता कौतूहलवश विमान पर बैठकर जिनकी आयु समाप्त हो चली थी, उन राक्षसों की उस विशाल वाहिनी को देखने लगे। खर रथ के द्वारा बड़े वेग से चलकर सारी सेना से आगे निकल आया और श्येनगामी, पृथुग्रीव, यज्ञशत्रु, विहंगम, दुर्जय, करवीराक्ष, परुष, कालकार्मुक, हेममाली, महामाली, सर्पास्य तथा रुधिराशन- ये बारह महापराक्रमी राक्षस खर को दोनों ओर से घेरकर उसके साथ-साथ चलने लगे।
महाकपाल, स्थूलाक्ष, प्रमाथ और त्रिशिरा – ये चार राक्षस-वीर सेना के आगे और सेनापति दूषण के पीछे-पीछे चल रहे थे। राक्षस वीरों की वह भयंकर वेगवाली अत्यन्त दारुण सेना, जो युद्ध की अभिलाषा से आ रही थी, सहसा उन दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण के पास जा पहुँची, मानो ग्रहों की पंक्ति चन्द्रमा और सूर्य के समीप प्रकाशित हो रही हो।
