भाग-२१(21) शूर्पणखा का खर के पास आकर उन राक्षसों के वध का समाचार बताना और राम का भय दिखाकर उसे युद्ध के लिये उत्तेजित करना तथा चौदह हजार राक्षसों की सेना के साथ खर-दूषण का जनस्थान से पञ्चवटी की ओर प्रस्थान

 


शूर्पणखा को पुनः पृथ्वी पर पड़ी हुई देख अनर्थ के लिये आयी हुई उस बहिन से खर ने क्रोधपूर्वक स्पष्ट वाणी में फिर कहा - बहिन! मैंने तुम्हारा प्रिय करने के लिये उस समय बहुत से शूरवीर एवं मांसाहारी राक्षसों को जाने की आज्ञा दे दी थी, अब फिर तुम किसलिये रो रही हो ? मैंने जिन राक्षसों को भेजा था, वे मेरे भक्त, मुझमें अनुराग रखने वाले और सदा मेरा हित चाहनेवाले हैं। वे किसी के मारने पर भी मर नहीं सकते। उनके द्वारा मेरी आज्ञा का पालन न हो, यह भी सम्भव नहीं है। फिर ऐसा कौन-सा कारण उपस्थित हो गया, जिसके लिये तुम 'हा नाथ' की पुकार मचाती हुई साँप की तरह धरती पर लोट रही हो। मैं उसे सुनना चाहता हूँ। मेरे-जैसे संरक्षक के रहते हुए तुम अनाथ की तरह विलाप क्यों करती हो? उठो! उठो!! इस तरह लोटो मत। घबराहट छोड़ दो।

खर के इस प्रकार सान्त्वना देने पर वह दुर्धर्ष राक्षसी अपने आँसूभरे नेत्रों को पोंछकर भाई खर से बोली - भैया मैं इस समय फिर तुम्हारे पास क्यों आयी हूँ - यह बताती हूँ, सुनो मेरे नाक-कान कट गये और मैं खून की धारा से नहा उठी, उस अवस्था में जब पहली बार मैं आयी थी, तब तुमने मुझे बड़ी सान्त्वना दी थी। तत्पश्चात् मेरा प्रिय करने के लिये लक्ष्मण सहित राम का वध करने के उद्देश्य से तुमने जो वे चौदह शूरवीर राक्षस भेजे थे, वे सब-के-सब अमर्ष में भरकर हाथों में शूल और पट्टिश लिये वहाँ जा पहुँचे, परंतु राम ने अपने मर्मभेदी बाणोंद्वारा उन सबको समराङ्गण में मार गिराया। 

‘उन महान् वेगशाली निशाचरों को क्षणभर में ही धराशायी हुआ देख राम के उस महान् पराक्रम पर दृष्टिपात करके मेरे मन में बड़ा भय उत्पन्न हो गया। निशाचरराज! मैं भयभीत, उद्विग्न और विषादग्रस्त हो गयी हूँ। मुझे सब ओर भय ही भय दिखायी देता है, इसीलिये फिर तुम्हारी शरण में आयी हूँ। मैं शोक के उस विशाल समुद्र में डूब गयी हूँ, जहाँ विषादरूपी मगर निवास करते हैं और त्रास की तरङ्गमालाएँ उठती रहती हैं। तुम उस शोकसागर से मेरा उद्धार क्यों नहीं करते हो?' 

'जो मांसभक्षी राक्षस मेरे साथ गये थे, वे सब-के-सब राम के पैने बाणों से मारे जाकर पृथ्वी पर पड़े हैं। राक्षसराज ! यदि मुझ पर और उन मरे हुए राक्षसों पर तुम्हें दया आती हो तथा यदि राम के साथ लोहा लेने के लिये तुममें शक्ति और तेज हो तो उन्हें मार डालो; क्योंकि दण्डकारण्य में घर बनाकर रहने वाले राम राक्षसों के लिये कण्टक हैं।' 

'यदि तुम आज ही शत्रुघाती राम का वध नहीं कर डालोगे तो मैं तुम्हारे सामने ही अपने प्राण त्याग दूँगी; क्योंकि मेरी लाज लुट चुकी है। मैं बुद्धि से बारंबार सोचकर देखती हूँ कि तुम महासमर में सबल होकर भी राम के सामने युद्ध में नहीं ठहर सकोगे। तुम अपने को शूरवीर मानते हो, किंतु तुममें शौर्य है ही नहीं। तुमने झूठे ही अपने-आप में पराक्रम का आरोप कर लिया है। मूढ़! तुम समराङ्गण में उन दोनों को मार डालो अन्यथा अपने कुल में कलङ्क लगाकर भाई-बन्धुओं के साथ तुरंत ही इस जनस्थान से भाग जाओ।' 

‘राम और लक्ष्मण मनुष्य हैं, यदि उन्हें भी मारने की तुममें शक्ति नहीं है तो तुम्हारे जैसे निर्बल और पराक्रमशून्य राक्षस का यहाँ रहना कैसे सम्भव हो सकता है ? तुम राम के तेज से पराजित होकर शीघ्र ही नष्ट हो जाओगे; क्योंकि दशरथकुमार राम बड़े तेजस्वी हैं। उनका भाई भी महान् पराक्रमी है, जिसने मुझे नाक-कान से हीन करके अत्यन्त कुरूप बना दिया।' 

इस प्रकार बहुत विलाप करके गुफा के समान गहरे पेटवाली वह राक्षसी शोक से आतुर हो अपने भाई के पास मूर्च्छित-सी हो गयी और अत्यन्त दुःखी हो दोनों हाथों से पेट पीटती हुई फूट-फूट कर रोने लगी। 

शूर्पणखा द्वारा इस प्रकार तिरस्कृत होकर शूरवीर खर ने राक्षसों के बीच अत्यन्त कठोर वाणी में कहा - बहिन! तुम्हारे अपमान के कारण मुझे बेतरह क्रोध चढ़ आया है। इसे धारण करना या दबा देना उसी प्रकार असम्भव है, जैसे पूर्णिमा को प्रचण्ड वेग से बढ़े हुए खारे पानी के समुद्र के जलको (अथवा यह उसी प्रकार असह्य है, जैसे घाव पर नमकीन पानी का छिड़कना)। 

मैं पराक्रम की दृष्टि से राम को कुछ भी नहीं गिनता हूँ; क्योंकि उस मनुष्य का जीवन अब क्षीण हो चला है। वह अपने दुष्कर्मों से ही मारा जाकर आज प्राणों से हाथ धो बैठेगा। तुम अपने आँसुओं को रोको और यह घबराहट छोड़ो। मैं भाईसहित राम को अभी यमलोक पहुँचा देता हूँ।  राक्षसी! आज मेरे फरसे की मार से निष्प्राण होकर धरती पर पड़े हुए राम का गरम-गरम रक्त तुम्हें पीने को मिलेगा।' 

खर के मुख से निकली हुई इस बात को सुनकर शूर्पणखा को पड़ी प्रसन्नता हुई। उसने मूर्खतावश राक्षसों में श्रेष्ठ भाई खर की पुन: भूरि-भूरि प्रशंसा की। 

उसने पहले जिसका कठोर वाणी द्वारा तिरस्कार किया और पुनः जिसकी अत्यन्त सराहना की, उस खर ने उस समय अपने सेनापति दूषण से कहा – सौम्य! मेरे मन के अनुकूल चलने वाले, युद्ध के मैदान से पीछे न हटने वाले, भयंकर वेगशाली, मेघों की काली घटा के समान काले रंगवाले, लोगों की हिंसा से ही क्रीड़ा - विहार करने वाले तथा युद्ध में उत्साहपूर्वक आगे बढ़नेवाले चौदह सहस्र (चौदह हजार) राक्षसों को युद्ध के लिये भेजने की पूरी तैयारी कराओ। 

'सौम्य सेनापते! तुम शीघ्र ही मेरा रथ भी यहाँ मँगवा लो। उस पर बहुत-से धनुष, बाण, विचित्रविचित्र खड्ग और नाना प्रकार की तीखी शक्तियों को भी रख दो। रणकुशल वीर! मैं इस उद्दण्ड राम का वध करने के लिये महामनस्वी पुलस्त्यवंशी राक्षसों के आगे-आगे जाना चाहता हूँ।' 

उसके इस प्रकार आज्ञा देते ही एक सूर्य के समान प्रकाशमान और चितकबरे रंग के अच्छे घोड़ों से जुता हुआ विशाल रथ वहाँ आ गया। दूषण ने खर को इसकी सूचना दी। वह रथ मेरुपर्वत के शिखर की भाँति ऊँचा था, उसे तपाये हुए सोने के बने हुए साज- बाज से सजाया गया था, उसके पहियों में सोना जड़ा हुआ था, उसका विस्तार बहुत बड़ा था, उस रथ के कूबर वैदूर्यमणि से जड़े गये थे, उसकी सजावटके लिये सोने के बने हुए मत्स्य, फूल, वृक्ष, पर्वत, चन्द्रमा, सूर्य, माङ्गलिक पक्षियों के समुदाय तथा तारिकाओं से वह रथ सुशोभित हो रहा था, उस पर ध्वजा फहरा रही थी तथा रथ के भीतर खड्ग आदि अस्त्र-शस्त्र रखे हुए थे, छोटी-छोटी घण्टियों अथवा सुन्दर घुँघुरुओं से सजे और उत्तम घोड़ों से जुते हुए उस रथ पर राक्षस राज खर उस समय आरूढ़ हुआ। अपनी बहिन के अपमान का स्मरण करके उसके मन में बड़ा अमर्ष हो रहा था। 

रथ, ढाल, अस्त्र-शस्त्र तथा ध्वज से सम्पन्न उस विशाल सेना की ओर देखकर खर और दूषण ने समस्त राक्षसों से कहा - निकलो, आगे बढ़ो ! 

कूच करने की आज्ञा प्राप्त होते ही भयंकर ढाल, अस्त्र-शस्त्र तथा ध्वजा से युक्त वह विशाल राक्षस सेना जोर-जोर से गर्जना करती हुई जनस्थान से बड़े वेग के साथ निकली। सैनिकों के हाथ में मुद्गर, पट्टिश, शूल, अत्यन्त तीखे फरसे, खड्ग, चक्र और तोमर चमक उठे। शक्ति, भयंकर परिघ, विशाल धनुष, गदा, तलवार, मुसल तथा वज्र (आठ कोण वाले आयुधविशेष) उन राक्षसों के हाथों में आकर बड़े भयानक दिखायी दे रहे थे। इन अस्त्र-शस्त्रों से उपलक्षित और खर के मन की इच्छा के अनुसार चलने वाले अत्यन्त भयंकर चौदह हजार राक्षस जनस्थान से युद्ध के लिये चले। 

उन भयंकर दिखायी देने वाले राक्षसों को धावा करते देख खर का रथ भी कुछ देर सैनिकों के निकलने की प्रतीक्षा करके उनके साथ ही आगे बढ़ा। तदनन्तर खर का अभिप्राय जानकर उसके सारथि ने तपाये हुए सोने के आभूषणों से विभूषित उन चितकबरे घोड़ों को हाँका। उसके हाँकने पर शत्रुघाती खर का रथ शीघ्र ही अपने घर-घर शब्द से सम्पूर्ण दिशाओं तथा उपदिशाओं को प्रतिध्वनित करने लगा। 

उस समय खर का क्रोध बढ़ा हुआ था। उसका स्वर भी कठोर हो गया था। वह शत्रु के वध के लिये उतावला होकर यमराज के समान भयानक जान पड़ता था। जैसे ओलों की वर्षा करने वाला मेघ बड़े जोर से गर्जना करता है, उसी प्रकार महाबली खर ने उच्चस्वर से सिंहनाद करके पुनः सारथि को रथ हाँकने के लिये प्रेरित किया। 

इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का भाग-२१(21) समाप्त !

No comments:

Post a Comment

रामायण: एक परिचय

रामायण संस्कृत के रामायणम् का हिंदी रूपांतरण है जिसका शाब्दिक अर्थ है राम की जीवन यात्रा। रामायण और महाभारत दोनों सनातन संस्कृति के सबसे प्र...