कौशल्या ने जब देखा कि श्रीराम ने पिता की आज्ञा के पालन का ही दृढ़ निश्चय कर लिया है, तब वे आँसुओं से रुँधी हुई गद्गद वाणी में धर्मात्मा श्रीराम से इस प्रकार बोलीं - हाय! जिसने जीवन में कभी दुःख नहीं देखा है, जो समस्त प्राणियों से सदा प्रिय वचन बोलता है, जिसका जन्म महाराज दशरथ से मेरे द्वारा हुआ है, वह मेरा धर्मात्मा पुत्र उञ्छवृत्ति से – खेत में गिरे हुए अनाज के एक-एक दाने को बीनकर कैसे जीवन निर्वाह कर सकेगा? जिनके भृत्य और दास भी शुद्ध, स्वादिष्ट अन्न खाते हैं, वे ही श्रीराम वन में फल - मूल का आहार कैसे करेंगे? जो सद्गुणसम्पन्न और महाराज दशरथ के प्रिय हैं, उन्हीं ककुत्स्थ - कुल भूषण श्रीराम को जो वनवास दिया जा रहा है, इसे सुनकर कौन इस पर विश्वास करेगा? अथवा ऐसी बात सुनकर किसको भय नहीं होगा ?
'श्रीराम ! निश्चय ही इस जगत में दैव सबसे बड़ा बलवान् है। उसकी आज्ञा सबके ऊपर चलती है - वही सबको सुख-दुःख से संयुक्त करता है; क्योंकि उसी के प्रभाव में आकर तुम्हारे जैसा लोकप्रिय मनुष्य भी वन में जाने को उद्यत है। परंतु पुत्र! तुमसे बिछुड़ जाने पर यहाँ मुझे शोक की अनुपम एवं बहुत बढ़ी हुई आग उसी तरह जलाकर भस्म कर डालेगी, जैसे ग्रीष्मऋतु में दावानल सूखी लकड़ियों और घास-फूस को जला डालता है। शोक की यह आग मेरे अपने ही मन में प्रकट हुई है। तुम्हें न देख पाने की सम्भावना ही वायु बनकर इस अग्नि को उद्दीप्त कर रही है । विलापजनित दु:ख ही इसमें ईंधन का काम कर रहे हैं। रोने से जो अश्रुपात होते हैं, वे ही मानो इसमें दी हुई घी की आहुति हैं। चिन्ता के कारण जो गरम-गरम उच्छवास उठ रहा है, वही इसका महान् धूम है।'
'तुम दूर देश में जाकर फिर किस तरह आओगे - इस प्रकार की चिंता ही इस शोकानि को जन्म दे रही है। साँस लेने का जो प्रयत्न है, उसी से इस आग की प्रतिक्षण वृद्धि हो रही है। तुम्हीं इसे बुझाने के लिये जल हो। तुम्हारे बिना यह आग मुझे अधिक सुखाकर जला डालेगी। वत्स! धेनु आगे जाते हुए अपने बछड़े के पीछे-पीछे कैसे चली जाती है, उसी प्रकार मैं भी तुम जहाँ भी जाओगे, तुम्हारे पीछे-पीछे चली चलूँगी।'
माता कौशल्या ने जैसे जो कुछ कहा, उस वचन को सुनकर पुरुषोत्तम श्रीराम ने अत्यन्त दु:ख में डूबी हुई अपनी माँ से पुन: इस प्रकार कहा - ‘माँ! माता कैकेयी ने राजा के साथ धोखा किया है। इधर मैं वन को चला जा रहा हूँ। इस दशा में यदि तुम भी उनका परित्याग कर दोगी तो निश्चय ही वे जीवित नहीं रह सकेंगे। पति का परित्याग नारी के लिये बड़ा ही क्रूरतापूर्ण कर्म है। सत्पुरुषों ने इसकी बड़ी निन्दा की है; अत: तुम्हें तो ऐसी बात कभी मन में भी नहीं लानी चाहिये। मेरे पिता ककुत्स्थ कुल भूषण महाराज दशरथ जब तक जीवित हैं, तब तक तुम उन्हीं की सेवा करो।पति की सेवा ही स्त्री के लिये सनातन धर्म है।'
श्रीराम के ऐसा कहने पर शुभ कर्मों पर दृष्टि रखने वाली देवी कौशल्या ने अत्यन्त प्रसन्न होकर अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीराम से कहा- अच्छा पुत्र! ऐसा ही करूंगी।
माँ के इस प्रकार स्वीकृति सूचक बात कहने पर धर्मात्माओं में श्रेष्ठ श्रीराम ने अत्यन्त दु:ख में पड़ी हुई अपनी माता से पुन: इस प्रकार कहा – माँ ! पिताजी की आज्ञा का पालन करना मेरा और तुम्हारा - दोनों का कर्तव्य है; क्योंकि राजा हम सब लोगों के स्वामी, श्रेष्ठ गुरु, ईश्वर एवं प्रभु हैं। इन चौदह वर्षों तक मैं विशाल वन में घूम-फिरकर लौट आऊँगा और बड़े प्रेम से तुम्हारी आज्ञा का पालन करता रहूँगा।
उनके ऐसा कहने पर पुत्रवत्सला कौशल्या के मुख पर पुनः आँसुओं की धारा बह चली। वे उस समय अत्यन्त आर्त होकर अपने प्रिय पुत्र से बोलीं - बेटा राम ! अब मुझसे इन सौतों के बीच में नहीं रहा जायेगा। काकुत्स्थ ! यदि पिता की आज्ञा का पालन करने की इच्छा से तुमने वन में जाने का ही निश्चय किया है तो मुझे भी वनवासिनी हिरणी की भाँति वन में ही ले चलो।
यह कहकर माता कौशल्या रोने लगीं। उन्हें उस तरह रोती देख श्रीराम भी रो पड़े और उन्हें सान्त्वना देते हुए बोले - ‘माँ! स्त्री के जीते-जी उसका पति ही उसके लिये देवता और ईश्वर के समान है। महाराज तुम्हारे और मेरे दोनों के प्रभु हैं। जब तक बुद्धिमान् जगदीश्वर महाराज दशरथ जीवित हैं, तब तक हमें अपने को अनाथ नहीं समझना चाहिये। भरत भी बड़े धर्मात्मा हैं। वे समस्त प्राणियों के प्रति प्रिय वचन बोलने वाले और सदा ही धर्म में तत्पर रहनेवाले हैं; अत: वे तुम्हारा अनुसरण - तुम्हारी सेवा करेंगे।
‘मेरे चले जाने पर जिस तरह भी महाराज को पुत्रशोक के कारण कोई विशेष कष्ट न हो, तुम सावधानी के साथ वैसा ही प्रयत्न करना। कहीं ऐसा न हो कि यह दारुण शोक इनकी जीवनलीला ही समाप्त कर डाले। जैसे भी सम्भव हो, तुम सदा सावधान रहकर बूढ़े महाराज के हित-साधन में लगी रहना। उत्कृष्ट गुण और जाति आदि की दृष्टि से परम उत्तम तथा व्रत उपवास में तत्पर होकर भी जो नारी पति की सेवा नहीं करती है, उसे पापियों को मिलने वाली गति (नरक आदि) की प्राप्ति होती है।'
‘जो अन्यान्य देवताओं की वन्दना और पूजा से दूर रहती है, वह नारी भी केवल पति की सेवामात्र से उत्तम स्वर्गलोक को प्राप्त कर लेती है। अत: नारी को चाहिये कि वह पति के प्रिय एवं हित साधन में तत्पर रहकर सदा उसकी सेवा ही करे, यही स्त्री का वेद और लोक में प्रसिद्ध नित्य सनातन धर्म है। इसी का श्रुतियों और स्मृतियों में भी वर्णन है।'
'माता ! तुम्हें मेरी मङ्गल कामना से सदा अग्निहोत्र के अवसरों पर पुष्पों से देवताओं का तथा सत्कार पूर्वक ब्राह्मणों का भी पूजन करते रहना चाहिये। इस प्रकार तुम नियमित आहार करके नियमों का पालन करती हुई स्वामी की सेवा में लगी रहो और मेरे आगमन की इच्छा रखकर समय की प्रतीक्षा करो। यदि धर्मात्माओं में श्रेष्ठ महाराज जीवित रहेंगे तो मेरे लौट आने पर तुम्हारी भी शुभ कामना पूर्ण होगी।'
श्रीराम के ऐसा कहने पर कौशल्या के नेत्रों में आँसू छलक आये। वे पुत्रशोक से पीड़ित होकर श्रीरामचन्द्रजीसे बोलीं - बेटा! मैं तुम्हारे वन में जाने के निश्चित विचार को नहीं पलट सकती। वीर ! निश्चय ही काल की आज्ञा का उल्लङ्घन करना अत्यन्त कठिन है। सामर्थ्यशाली पुत्र! अब तुम निश्चिन्त होकर वन को जाओ, तुम्हारा सदा ही कल्याण हो। जब फिर तुम वन से लौट आओगे, उस समय मेरे सारे क्लेश – सब संताप दूर हो जायेंगे।'
‘पुत्र ! जब तुम वनवास का महान् व्रत पूर्ण करके कृतार्थ एवं महान् सौभाग्यशाली होकर लौट आओगे और ऐसा करके पिता के ऋण से उऋण हो जाओगे, तभी मैं उत्तम सुख की नींद सो सकूँगी। रघुनन्दन! इस भूतल पर दैव की गति को समझना बहुत ही कठिन है, जो मेरी बात काटकर तुम्हें वन जाने के लिये प्रेरित कर रहा है। महाबाहो! इस समय जाओ, फिर कुशलपूर्वक लौटकर सान्त्वना भरे मधुर एवं मनोहर वचनों से मुझे आनन्दित करना। वत्स! क्या वह समय अभी आ सकता है, जब कि जटा-वल्कल धारण किये वन से लौटकर आये हुए तुमको फिर देख सकूँगी।'
देवी कौशल्या ने जब देखा कि इस प्रकार श्रीराम वनवास का दृढ़ निश्चय कर चुके हैं, तब वे परम आदरयुक्त हृदय से उनको शुभसूचक आशीर्वाद देने और उनके लिये स्वस्तिवाचन कराने की इच्छा करने लगीं। तदनन्तर उस क्लेशजनक शोक को मन से निकालकर श्रीराम की मनस्विनी माता कौसल्या ने पवित्र जल से आचमन किया, फिर वे यात्रा कालिक मङ्गलकृत्यों का अनुष्ठान करने लगीं।
इसके बाद वे आशीर्वाद देती हुई बोलीं - रघुकुलभूषण ! अब मैं तुम्हें रोक नहीं सकती, इस समय जाओ, सत्पुरुषों के मार्ग पर स्थिर रहो और शीघ्र ही वन से लौट आओ। रघुकुलसिंह! तुम नियमपूर्वक प्रसन्नता के साथ जिस धर्म का पालन करते हो, वही सब ओर से तुम्हारी रक्षा करे। पुत्र! देवस्थानों और मन्दिरों में जाकर तुम जिनको प्रणाम करते हो, वे सब देवता महर्षियों के साथ वन में तुम्हारी रक्षा करें।
'तुम सद्गुणों से प्रकाशित हो, बुद्धिमान् विश्वामित्रजी ने तुम्हें जो-जो अस्त्र दिये हैं, वे सब-के-सब सदा सब ओर से तुम्हारी रक्षा करें। महाबाहु पुत्र! तुम पिता की शुश्रूषा, माता की सेवा तथा सत्य के पालन से सुरक्षित होकर चिरंजीवी बने रहो। नरश्रेष्ठ! समिधा, कुशा, पवित्री, वेदियाँ, मन्दिर, ब्राह्मणों के देवपूजनसम्बन्धी स्थान, पर्वत, वृक्ष, क्षुप (छोटी शाखा वाले वृक्ष), जलाशय, पक्षी, सर्प और सिंह वन में तुम्हारी रक्षा करें।'
‘साध्य, विश्वेदेव तथा महर्षियों सहित मरुद्गण तुम्हारा कल्याण करें; धाता और विधाता तुम्हारे लिये मङ्गलकारी हों; पूषा, भग और अर्यमा तुम्हारा कल्याण करें। वे इन्द्र आदि समस्त लोकपाल, छहों ऋतुएँ, सभी मास, संवत्सर, रात्रि, दिन और मुहूर्त सदा तुम्हारा मङ्गल करें। पुत्र! श्रुति, स्मृति और धर्म भी सब ओर से तुम्हारी रक्षा करें। भगवान् स्कन्ददेव, सोम, बृहस्पति, सप्तर्षिगण और नारद - ये सभी सब ओर से तुम्हारी रक्षा करें।'
'पुत्र! वे प्रसिद्ध सिद्धगण, दिशाएँ और दिक्पाल मेरी की हुई स्तुति से संतुष्ट हो उस वन में सदा सब ओर से तुम्हारी रक्षा करें। समस्त पर्वत, समुद्र, राजा वरुण, द्युलोक, अन्तरिक्ष, पृथ्वी, वायु, चराचर प्राणी, समस्त नक्षत्र, देवताओं सहित ग्रह, दिन और रात तथा दोनों संध्याएँ - ये सब-के-सब वन में जाने पर सदा तुम्हारी रक्षा करें। छ: ऋतुएँ, अन्यान्य मास, संवत्सर, कला और काष्ठा – ये सब तुम्हें कल्याण प्रदान करें मुनि का वेष धारण करके उस विशाल वन में विचरते हुए तुझ बुद्धिमान् पुत्र के लिये समस्त देवता और दैत्य सदा सुखदायक हों।'
'पुत्र! तुम्हें भयंकर राक्षसों, क्रूरकर्मा पिशाचों तथा समस्त मांसभक्षी जन्तुओं से कभी भय न हो। वन में जो मेढक या वानर, बिच्छू, डाँस, मच्छर, पर्वतीय सर्प और कीड़े होते हैं, वे उस गहन वन में तुम्हारे लिये हिंसक न हों। पुत्र! बड़े-बड़े हाथी, सिंह, व्याघ्र, रीछ, दाढ़वाले अन्य जीव तथा विशाल सींग वाले भयंकर भैंसे वन में तुमसे द्रोह न करें। वत्स! इनके सिवा जो सभी जातियों में नरमांसभक्षी भयंकर प्राणी हैं, वे मेरे द्वारा यहाँ पूजित होकर वन में तुम्हारी हिंसा न करें।'
'पुत्र राम! सभी मार्ग तुम्हारे लिये मङ्गलकारी हों । तुम्हारे पराक्रम सफल हों तथा तुम्हें सब सम्पत्तियाँ प्राप्त होती रहें। तुम सकुशल यात्रा करो। तुम्हें आकाशचारी प्राणियों से, भूतल के जीव-जन्तुओं से, समस्त देवताओं से तथा जो तुम्हारे शत्रु हैं, उनसे भी सदा कल्याण प्राप्त होता रहे। श्रीराम! शुक्र, सोम, सूर्य, कुबेर तथा यम – ये मुझसे पूजित हो दण्डकारण्य में निवास करते समय सदा तुम्हारी रक्षा करें।'
‘रघुनन्दन! स्नान और आचमन के समय अग्नि, वायु, धूम तथा ऋषियों के मुख से निकले हुए मन्त्र तुम्हारी रक्षा करें। समस्त लोकों के स्वामी ब्रह्मा, जगत के कारणभूत परब्रह्म, ऋषिगण तथा उनके अतिरिक्त जो देवता हैं, वे सब- के-सब वनवास के समय तुम्हारी रक्षा करें।'
ऐसा कहकर विशाललोचना यशस्विनी रानी कौशल्या ने पुष्पमाला और गन्ध आदि उपचारों से तथा अनुरूप स्तुतियों द्वारा देवताओं का पूजन किया। उन्होंने श्रीराम की मङ्गलकामना से अग्नि को लाकर एक महात्मा ब्राह्मण के द्वारा उसमें विधिपूर्वक होम करवाया। श्रेष्ठ नारी महारानी कौशल्या ने घी, श्वेत पुष्प और माला, समिधा तथा सरसों आदि वस्तुएँ ब्राह्मण के समीप रखवा दीं। पुरोहितजी ने समस्त उपद्रवों की शान्ति और आरोग्य के उद्देश्य से विधिपूर्वक अग्नि में होम करके हवन से बचे हुए हविष्य के द्वारा होम की वेदी से बाहर दसों दिशाओं में इन्द्र आदि लोकपालों के लिये बलि अर्पित की।
तदनन्तर स्वस्तिवाचन के उद्देश्य से ब्राह्मणों को मधु, दही, अक्षत और घृत अर्पित करके 'वन में श्रीराम का सदा मङ्गल हो' इस कामना से कौशल्याजी ने उन सबसे स्वस्त्ययन सम्बन्धी मन्त्रों का पाठ करवाया।
इसके बाद यशस्विनी श्रीराम माता ने उन विप्रवर पुरोहितजी को उनकी इच्छा के अनुसार दक्षिणा दी और श्रीरघुनाथजी से इस प्रकार कहा - वृत्रासुर का नाश करने के निमित्त सर्वदेव वन्दित सहस्रनेत्रधारी इन्द्र को जो मङ्गलमय आशीर्वाद प्राप्त हुआ था, वही मङ्गल तुम्हारे लिये भी हो। पूर्वकाल में विनतादेवी ने अमृत लाने की इच्छा वाले अपने पुत्र गरुड़ के लिये जो मङ्गलकृत्य किया था, वही मङ्गल तुम्हें भी प्राप्त हो। अमृत की उत्पत्ति के समय दैत्यों का संहार करने वाले वज्रधारी इन्द्र के लिये माता अदिति ने जो मङ्गलमय आशीर्वाद दिया था, वही मङ्गल तुम्हारे लिये भी सुलभ हो। श्रीराम्! तीन पगों को बढ़ाते हुए अनुपम तेजस्वी भगवान् विष्णु के लिये जो मङ्गलाशंसा की गयी थी, वही मङ्गल तुम्हारे लिये भी प्राप्त हो। महाबाहो ! ऋषि, समुद्र, द्वीप, वेद, समस्त लोक और दिशाएँ तुम्हें मङ्गल प्रदान करें। तुम्हारा सदा शुभ मङ्गल हो।
इस प्रकार आशीर्वाद देकर विशाललोचना भामिनी कौशल्या ने पुत्र के मस्तक पर अक्षत रखकर चन्दन और रोली लगायी तथा सब मनोरथों को सिद्ध करने वाली विशल्यकरणी नामक शुभ औषधि लेकर रक्षा के उद्देश्य से मन्त्र पढ़ते हुए उसको श्रीराम के हाथ में बाँध दिया; फिर उसमें उत्कर्ष लाने के लिये मन्त्र का जप भी किया। तदनन्तर दुःख के अधीन हुई कौशल्या ने ऊपर से प्रसन्न - सी होकर मन्त्रों का स्पष्ट उच्चारण भी किया। उस समय वे वाणीमात्र से ही मन्त्रोच्चारण कर सकीं, हृदय से नहीं क्योंकि हृदय श्रीराम के वियोग की सम्भावना से व्यथित था, इसीलिये वे खेद से गद्गद, लड़खड़ाती हुई वाणी से मन्त्र बोल रही थीं।
इसके बाद उनके मस्तक को कुछ झुकाकर यशस्विनी माता ने सूँघा और बेटे को हृदय से लगाकर कहा – 'वत्स राम! तुम सफलमनोरथ होकर सुखपूर्वक वन को जाओ। जब पूर्णकाम होकर रोगरहित सकुशल अयोध्या में लौटोगे, उस समय तुम्हें राजमार्ग पर स्थित देखकर सुखी होऊँगी। उस समय मेरे दुःखपूर्ण संकल्प मिट जायेंगे, मुख पर हर्षजनित उल्लास छा जायेगा और मैं वन से आये हुए तुम को पूर्णिमा की रात में उदित हुए पूर्ण चन्द्रमा की भाँति देखूँगी।
‘श्रीराम! वनवास से यहाँ आकर पिता की प्रतिज्ञा को पूर्ण करके जब तुम राजसिंहासन पर बैठोगे, उस समय मैं पुन: प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारा दर्शन करूँगी। अब जाओ और वनवास से यहाँ लौटकर राजोचित मङ्गलमय वस्त्राभूषणों से विभूषित हो तुम सदा मेरी बहू सीता की समस्त कामनाएँ पूर्ण करते रहो। रघुनन्दन! मैंने सदा जिनका पूजन और सम्मान किया है, वे शिव आदि देवता, महर्षि, भूतगण, देवोपम नाग और सम्पूर्ण दिशाएँ - ये सब-के-सब वन में जाने पर चिरकाल तक तुम्हारे हितसाधन की कामना करते रहें।
इस प्रकार माता ने नेत्रों में अत्यन्त आँसू भरकर विधिपूर्वक वह स्वस्तिवाचन कर्म पूर्ण किया। फिर श्रीराम की परिक्रमा की और बारंबार उनकी ओर देखकर उन्हें छाती से लगाया। देवी कौशल्या ने जब श्रीराम की प्रदक्षिणा कर ली, तब महायशस्वी रघुनाथजी बारंबार माता के चरणों को दबाकर प्रणाम करके माता की मङ्गलकामना-जनित उत्कृष्ट शोभा से सम्पन्न हो सीताजी के महल की ओर चल दिये।
इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-२०(20) समाप्त !

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