अपनी बहिन को इस प्रकार अङ्गहीन और रक्त से भीगी हुई अवस्था में पृथ्वी पर पड़ी देख राक्षस खर क्रोध से जल उठा और इस प्रकार पूछने लगा - बहिन उठो और अपना हाल बताओ। मूर्च्छा और घबराहट छोड़ो तथा साफ-साफ कहो, किसने तुम्हें इस तरह रूपहीन बनाया है? कौन अपने सामने आकर चुपचाप बैठे हुए निरपराध एवं विषैले काले साँप को अपनी अँगुलियों के अग्रभाग से खेल-खेल में पीड़ा दे रहा है? जिसने आज तुम पर आक्रमण करके तुम्हारे नाक-कान काटे हैं, उसने उच्चकोटि का विष पी लिया है तथा अपने गले में काल का फंदा डाल लिया है, फिर भी मोहवश वह इस बात को समझ नहीं रहा है।
'तुम तो स्वयं ही दूसरे प्राणियों के लिये यमराज के समान हो, बल और पराक्रम से सम्पन्न हो तथा इच्छानुसार सर्वत्र विचरने और अपनी रुचि के अनुसार रूप धारण करने में समर्थ हो, फिर भी तुम्हें किसने इस दुरवस्था में डाला है; जिससे दुःखी होकर तुम यहाँ आयी हो ? देवताओं, गन्धर्वों, भूतों तथा महात्मा ऋषियों में यह कौन ऐसा महान् बलशाली है, जिसने तुम्हें रूपहीन बना दिया? संसार में तो मैं किसी को ऐसा नहीं देखता, जो मेरा अप्रिय कर सके। देवताओं में सहस्रनेत्रधारी पाकशासन इन्द्र भी ऐसा साहस कर सकें, यह मुझे नहीं दिखायी देता।
‘जैसे हंस जल में मिले हुए दूध को पी लेता है, उसी प्रकार मैं आज इन प्राणान्तकारी बाणों से तुम्हारे अपराधी के शरीर से उसके प्राण ले लूँगा। युद्ध में मेरे बाणों से जिसके मर्मस्थान छिन्न-भिन्न हो गये हैं तथा जो मेरे हाथों मारा गया है, ऐसे किस पुरुष के नसहित गरम-गरम रक्त को यह पृथ्वी पीना चाहती है ?'
'रणभूमि में मेरे द्वारा मारे गये किस व्यक्ति के शरीर से मांस कुतर-कुतर कर ये हर्ष में भरे हुए झुंड के झुंड पक्षी खायँगे? जिसे मैं महासमर में खींच लूँ, उस दीन अपराधी को देवता, गन्धर्व, पिशाच और राक्षस भी नहीं बचा सकते। धीरे-धीरे होश में आकर तुम मुझे उसका नाम बताओ, जिस उद्दण्ड ने वन में तुम पर बलपूर्वक आक्रमण करके तुम्हें परास्त किया है।'
भाई का विशेषतः क्रोध में भरे हुए भाई खर का यह वचन सुनकर शूर्पणखा नेत्रों से आँसू बहाती हुई इस प्रकार बोली - भैया! वन में दो तरुण पुरुष आये हैं, जो देखने में बड़े ही सुकुमार, रूपवान् और महान् बलवान् हैं। उन दोनों के बड़े-बड़े नेत्र ऐसे जान पड़ते हैं मानो खिले हुए कमल हों। वे दोनों ही वल्कल-वस्त्र और मृगचर्म पहने हुए हैं। फल और मूल ही उनका भोजन है। वे जितेन्द्रिय, तपस्वी और ब्रह्मचारी हैं। दोनों ही राजा दशरथ के पुत्र और आपस में भाई-भाई हैं। उनके नाम राम और लक्ष्मण हैं।
'वे दो गन्धर्वराजों के समान जान पड़ते हैं और राजोचित लक्षणों से सम्पन्न हैं। ये दोनों भाई देवता अथवा दानव हैं, यह मैं अनुमान से भी नहीं जान सकती। उन दोनों के बीच में एक तरुण अवस्थावाली रूपवती स्त्री भी वहाँ देखी है, जिसके शरीर का मध्यभाग बड़ा ही सुन्दर है। वह सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित है।उस स्त्री के ही कारण उन दोनों ने मिलकर मेरी एक अनाथ और कुलटा स्त्री की भाँति ऐसी दुर्गति की है।'
'मैं युद्ध में उस कुटिल आचार वाली स्त्री के और उन दोनों राजकुमारों के भी मारे जाने पर उनका फेनसहित रक्त पीना चाहती हूँ। रणभूमि में उस स्त्री का और उन पुरुषों का भी रक्त मैं पी सकूँ – यह मेरी पहली और प्रमुख इच्छा है, जो तुम्हारे द्वारा पूर्ण की जानी चाहिये।'
शूर्पणखा के ऐसा कहने पर खर ने कुपित होकर अत्यन्त बलवान् चौदह राक्षसों को, जो यमराज के समान भयंकर थे, यह आदेश दिया - वीरो! इस भयंकर दण्डकारण्य के भीतर चीर और काला मृगचर्म धारण किये दो शस्त्रधारी मनुष्य एक युवती स्त्री के साथ घुस आये हैं। तुम लोग वहाँ जाकर पहले उन दोनों पुरुषों को मार डालो; फिर उस दुराचारिणी स्त्री के भी प्राण ले लो। मेरी यह बहिन उन तीनों का रक्त पीयेगी। राक्षसो! मेरी इस बहिन का यह प्रिय मनोरथ है। तुम वहाँ जाकर अपने प्रभाव से उन दोनों मनुष्यों को मार गिराओ और बहिन के इस मनोरथ को शीघ्र पूरा करो। रणभूमि में उन दोनों भाइयों को तुम्हारे द्वारा मारा गया देख यह हर्ष से खिल उठेगी और आनन्दमग्न होकर युद्धस्थल में उनका रक्त पान करेगी।
खर की ऐसी आज्ञा पाकर वे चौदह राक्षस हवा के उड़ाये हुए बादलों के समान विवश हो शूर्पणखा के साथ पञ्चवटीको गये। तदनन्तर भयानक राक्षसी शूर्पणखा श्रीरामचन्द्रजी के आश्रम पर आयी। उसने सीता सहित उन दोनों भाइयों का उन राक्षसों को परिचय दिया। राक्षसों ने देखा महाबली श्रीराम सीता के साथ पर्णशाला में बैठे हैं और लक्ष्मण भी उनकी सेवा में उपस्थित हैं।
इधर श्रीमान् रघुनाथजी ने भी शूर्पणखा तथा उसके साथ आये हुए उन राक्षसों को भी देखा। देखकर वे उद्दीप्त तेजवाले अपने भाई लक्ष्मण से इस प्रकार बोले – सुमित्राकुमार! तुम थोड़ी देर तक सीता के पास खड़े हो जाओ। मैं इस राक्षसी के सहायक बनकर पीछे-पीछे आये हुए इन निशाचरों का यहाँ अभी वध कर डालूँगा।
अपने स्वरूप को समझने वाले श्रीरामचन्द्रजी की यह बात सुनकर लक्ष्मण ने इसकी भूरि-भूरि सराहना करते हुए 'तथास्तु' कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की।
तब धर्मात्मा रघुनाथजी ने अपने सुवर्णमण्डित विशाल धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और उन राक्षसों से कहा - हम दोनों भाई राजा दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण हैं तथा सीता के साथ इस दुर्गम दण्डकारण्य में आकर फल-मूल का आहार करते हुए इन्द्रियसंयमपूर्वक तपस्या में संलग्न हैं और ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। इस प्रकार दण्डकवन में निवास करने वाले हम दोनों भाइयों की तुम किसलिये हिंसा करना चाहते हो?
‘देखो, तुम सब-के-सब पापात्मा तथा ऋषियों का अपराध करनेवाले हो। उन ऋषि-मुनियों की आज्ञा से ही मैं धनुष-बाण लेकर महासमर में तुम्हारा वध करने के लिये यहाँ आया हूँ। निशाचरो! यदि तुम्हें युद्ध से संतोष प्राप्त होता हो तो यहाँ खड़े ही रहो, भाग मत जाना और यदि तुम्हें प्राणों का लोभ हो तो लौट जाओ (एक क्षण के लिये भी यहाँ न रुको)।'
श्रीराम की यह बात सुनकर वे चौदह राक्षस अत्यन्त कुपित हो उठे। ब्राह्मणों की हत्या करने वाले वे घोर निशाचर हाथों में शूल लिये क्रोध से लाल आँखें करके कठोर वाणी में हर्ष और उत्साह के साथ स्वभावत: लाल नेत्रों वाले मधुरभाषी श्रीराम से, जिनका पराक्रम वे देख चुके थे, यों बोले - अरे! तूने हमारे स्वामी महाकाय खर को क्रोध दिलाया है; अतः हमलोगों के हाथ से युद्ध में मारा जाकर तू स्वयं ही तत्काल अपने प्राणों से हाथ धो बैठेगा। हम बहुत-से हैं और तू अकेला, तेरी क्या शक्ति है कि तू हमारे सामने रणभूमि में खड़ा भी रह सके, फिर युद्ध करना तो दूर की बात है। हमारी भुजाओं द्वारा छोड़े गये इन परिघों, शूलों और पट्टिशों की मार खाकर तू अपने हाथ में दबाये हुए इस धनुष को, बल-पराक्रम के अभिमान को तथा अपने प्राणों को भी एक साथ ही त्याग देगा।
ऐसा कहकर क्रोध में भरे हुए वे चौदह राक्षस तरह-तरह के आयुध और तलवारें लिये श्रीराम पर ही टूट पड़े। उन राक्षसों ने दुर्जय वीर श्री राघवेन्द्र पर वे शूल चलाये, परंतु ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी ने उन समस्त चौदह शूलों को उतने ही सुवर्णभूषित बाणों द्वारा काट डाला। तत्पश्चात् महातेजस्वी रघुनाथजी ने अत्यन्त कुपित हो शान पर चढ़ाकर तेज किये गये सूर्यतुल्य तेजस्वी चौदह नाराच हाथ में लिये। फिर धनुष लेकर उस पर उन बाणों को रखा और कान तक खींचकर राक्षसों को लक्ष्य करके छोड़ दिया। मानो इन्द्र ने वज्रों का प्रहार किया हो।
वे बाण बड़े वेग से उन राक्षसों की छाती छेदकर रुधिर में डूबे हुए निकले और बाँबी से बाहर आये हुए सर्पों की भाँति तत्काल पृथ्वी पर गिर पड़े। उन नाराचों से हृदय विदीर्ण हो जाने के कारण वे राक्षस जड़ से कटे हुए वृक्षों की भाँति धराशायी हो गये। वे सब- के-सब खून से नहा गये थे। उनके शरीर विकृत हो गये थे। उस अवस्था में उनके प्राणपखेरू उड़ गये। उन सबको पृथ्वी पर पड़ा देख वह राक्षसी क्रोध से मूर्च्छित हो गयी और खर के पास जाकर पुन: आर्त भाव से गिर पड़ी। उसके कटे हुए कानों और नाकों का खून सूख गया था, इसलिये गोंदयुक्त लता के समान प्रतीत होती थी।
भाई के निकट शोक से पीड़ित हुई शूर्पणखा बड़े जोर से आर्तनाद करने और फूट-फूटकर रोने तथा आँसू बहाने लगी। उस समय उसके मुख की कान्ति फीकी पड़ गयी थी। रणभूमि में उन राक्षसों को मारा गया देख खर की बहिन शूर्पणखा पुन: वहाँ से भागी हुई आयी। उसने उन समस्त राक्षसों के वध का सारा समाचार भाई से कह सुनाया।
इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का भाग-२०(20)
