महात्मा श्रीराम को उस आश्रम में रहते हुए शरद् ऋतु बीत गयी और प्रिय हेमन्त का आरम्भ हुआ। एक दिन प्रातः काल रघुकुलनन्दन श्रीराम स्नान करने के लिये परम रमणीय गोदावरी नदी के तट पर गये। उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी, जो बड़े ही विनीत और पराक्रमी थे, सीता के साथ-साथ हाथ में घड़ा लिये उनके पीछे-पीछे गये।
जाते-जाते वे श्रीरामचन्द्रजी से इस प्रकार बोले – प्रिय वचन बोलने वाले भैया श्रीराम ! यह वही हेमन्तकाल आ पहुँचा है, जो आपको अधिक प्रिय है और जिससे यह शुभ संवत्सर अलंकृत-सा प्रतीत होता है। इस ऋतु में अधिक ठण्डक या पाले के कारण लोगों का शरीर रूखा हो जाता है। पृथ्वी पर रबी की खेती लहलहाने लगती है। जल अधिक शीतल होने के कारण पीने के योग्य नहीं रहता और आग बड़ी प्रिय लगती है। नवसस्येष्टि’ कर्म के अनुष्ठान की इस बेला में नूतन अन्न ग्रहण करने के लिये की गयी आग्रयणकर्म रूप पूजाओं द्वारा देवताओं तथा पितरों को संतुष्ट करके उक्त आग्रयणकर्म का सम्पादन करने वाले सत्पुरुष निष्पाप हो गये हैं।
‘इस ऋतु में प्राय: सभी जनपदों के निवासियों की अन्नप्राप्तिविषयक कामनाएँ प्रचुर रूप से पूर्ण हो जाती हैं। गोरस की भी बहुतायत होती है तथा विजय की इच्छा रखने वाले भूपालगण युद्ध-यात्रा के लिये विचरते रहते हैं। सूर्यदेव इन दिनों यमसेवित दक्षिणदिशा का दृढ़तापूर्वक सेवन करने लगे हैं। इसलिये उत्तरदिशा सिंदूरविन्दु से वञ्चित हुई नारी की भाँति सुशोभित या प्रकाशित नहीं हो रही है।'
‘हिमालयपर्वत तो स्वभाव से ही घनीभूत हिम के खजाने से भरा-पूरा होता है, परंतु इस समय सूर्यदेव भी दक्षिणायन में चले जाने के कारण उससे दूर हो गये हैं; अत: अब अधिक हिम के संचय से सम्पन्न होकर हिमवान् गिरि स्पष्ट ही अपने नाम को सार्थक कर रहा है। मध्याह्नकाल में धूप का स्पर्श होने से हेमन्त के सुखमय दिन अत्यन्त सुख से इधर-उधर विचरने के योग्य होते हैं। इन दिनों सुसेव्य होने के कारण सूर्यदेव सौभाग्यशाली जान पड़ते हैं और सेवन के योग्य न होने के कारण छाँह तथा जल अभागे प्रतीत होते हैं।'
‘आज कल के दिन ऐसे हैं कि सूर्य की किरणों का स्पर्श कोमल (प्रिय) जान पड़ता है। कुहा से अधिक पड़ते हैं। सर्दी सबल होती है, कड़ाके का जाड़ा पड़ने लगता है। साथ ही ठण्डी हवा चलती रहती है। पाला पड़ने से पत्तों के झड़ जाने के कारण जंगल सूने दिखायी देते हैं और हिम के स्पर्श से कमल गल जाते हैं। इस हेमन्तकाल में रातें बड़ी होने लगती हैं। इनमें सरदी बहुत बढ़ जाती है। खुले आकाश में कोई नहीं सोते हैं। पौषमास की ये रातें हिमपात के कारण धूसर प्रतीत होती हैं।'
‘हेमन्तकाल में चन्द्रमा का सौभाग्य सूर्यदेव में चला गया है (चन्द्रमा सरदी के कारण असेव्य और सूर्य मन्दरश्मि होने के कारण सेव्य हो गये हैं)। चन्द्रमण्डल हिमकणों से आच्छन्न होकर धूमिल जान पड़ता है; अत: चन्द्रदेव नि:श्वासवायु से मलिन हुए दर्पण की भाँति प्रकाशित नहीं हो रहे हैं। इन दिनों पूर्णिमा की चाँदनी रात भी तुहिन बिंदुओं से मलिन दिखायी देती है - प्रकाशित नहीं होती है।'
‘स्वभावसे ही जिसका स्पर्श शीतल है, वह पछुआ हवा इस समय हिमकणों से व्याप्त हो जाने के कारण दूनी सरदी लेकर बड़े वेग से बह रही है। जौ और गेहूँ के खेतों से युक्त ये बहुसंख्यक वन भाप से ढँके हुए हैं तथा क्रौञ्च और सारस इनमें कलरव कर रहे हैं। सूर्योदयकाल में इन वनों की बड़ी शोभा हो रही है। ये सुनहरे रंग के जड़हन धान खजूर के फूल के-से आकार वाली बालों से, जिनमें चावल भरे हुए हैं, कुछ लटक गये हैं। इन बालों के कारण इनकी बड़ी शोभा होती है।'
'कुहासे से ढकी और फैलती हुई किरणों से उपलक्षित होने वाले दूरोदित सूर्य चन्द्रमा के समान दिखायी देते हैं। इस समय अधिक लाल और कुछ-कुछ श्वेत, पीत वर्ण की धूप पृथ्वी पर फैलकर शोभा पा रही है। पूर्वाह्णकाल में तो कुछ इसका बल जान ही नहीं पड़ता है, परंतु मध्याह्नकाल में इसके स्पर्श से सुख का अनुभव होता है। ओस की बूँदें पड़ने से जहाँ की घासें कुछ-कुछ भीगी हुई जान पड़ती हैं, वह वनभूमि नवोदित सूर्य की धूप का प्रवेश होने से अद्भुत शोभा पा रही है।'
‘यह जंगली हाथी बहुत प्यासा हुआ है। यह सुखपूर्वक प्यास बुझाने के लिये अत्यन्त शीतल जल का स्पर्श तो करता है, किंतु उसकी ठंडक असह्य होने के कारण अपनी सूँड़ को तुरंत ही सिकोड़ लेता है। ये जलचर पक्षी जल के पास ही बैठे हैं; परंतु जैसे डरपोक मनुष्य युद्धभूमि में प्रवेश नहीं करते हैं, उसी प्रकार ये पानी में नहीं उतर रहे हैं। रात में ओसविन्दुओं और अन्धकार से आच्छादित तथा प्रातः काल कुहासे के अँधेरे से ढकी हुई ये पुष्पहीन श्रेणियाँ सोयी हुई-सी दिखायी देती हैं।'
‘इस समय नदियों के जल भाप से ढके हुए हैं। इनमें विचरने वाले सारस केवल अपने कलरवों से पहचाने जाते हैं तथा ये सरिताएँ भी ओस से भीगी हुई बालूवाले अपने तटों से ही प्रकाश में आती हैं (जल से नहीं )। हिम (बर्फ) पड़ने से और सूर्य की किरणों के मन्द होने से अधिक सर्दी के कारण इन दिनों पर्वत के शिखर पर पड़ा हुआ जल भी प्रायः स्वादिष्ट प्रतीत होता है। जो पुराने पड़ जाने के कारण जर्जर हो गये हैं, जिनकी कर्णिका और केसर जीर्ण-शीर्ण हो गये हैं, ऐसे दलों से उपलक्षित होने वाले कमलों के समूह पाला पड़ने से गल गये हैं। उनमें डंठलमात्र शेष रह गये हैं। इसीलिये उनकी शोभा नष्ट हो गयी है।'
‘पुरुषसिंह श्रीराम! इस समय धर्मात्मा भरत आपके लिये बहुत दुःखी हैं और आप में भक्ति रखते हुए नगर में ही तपस्या कर रहे हैं। वे राज्य, मान तथा नाना प्रकार के बहुसंख्यक भोगों का परित्याग करके तपस्या में संलग्न हैं एवं नियमित आहार करते हुए इस शीतल महीतल पर बिना विस्तर के ही शयन करते हैं। निश्चय ही भरत भी इसी बेला में स्नान के लिये उद्यत हो मन्त्री एवं प्रजाजनों के साथ प्रतिदिन सरयू नदी के तट पर जाते होंगे।'
‘अत्यन्त सुख में पले हुए सुकुमार भरत जाड़े का कष्ट सहते हुए रात के पिछले पहर में कैसे सरयूजी के जल में डुबकी लगाते होंगे। जिनके नेत्र कमलदल के समान शोभा पाते हैं, जिनकी अङ्गकान्ति श्याम है और जिनके उदर का कुछ पता ही नहीं लगता है, ऐसे महान् धर्मज्ञ, सत्यवादी, लज्जाशील, जितेन्द्रिय, प्रिय वचन बोलने वाले, मृदुल स्वभाव वाले महाबाहु शत्रुदमन श्रीमान् भरत ने नाना प्रकार के सुखों को त्यागकर सर्वथा आपका ही आश्रय ग्रहण किया है।'
'आपके भाई महात्मा भरत ने निश्चय ही स्वर्ग लोक पर विजय प्राप्त कर ली है; क्योंकि वे भी तपस्या में स्थित होकर आपके वनवासी जीवन का अनुसरण कर रहे हैं। मनुष्य प्रायः माता के गुणों का ही अनुवर्तन करते हैं पिता के नहीं; इस लौकिक उक्ति को भरत ने अपने बर्ताव से मिथ्या प्रमाणित कर दिया है। महाराज दशरथ जिसके पति हैं और भरत जैसा साधु जिसका पुत्र है, वह माता कैकेयी वैसी क्रूरतापूर्ण दृष्टि वाली कैसे हो गयी?'
धर्मपरायण लक्ष्मण जब स्नेहवश इस प्रकार कह रहे थे, उस समय श्रीरामचन्द्रजी से माता कैकेयी की निन्दा नहीं सही गयी। उन्होंने लक्ष्मण से कहा – तात! तुम्हें मझली माता कैकेयी की कभी निन्दा नहीं करनी चाहिये। (यदि कुछ कहना हो तो) पहले की भाँति इक्ष्वाकुवंश के स्वामी भरत की ही चर्चा करो। यद्यपि मेरी बुद्धि दृढ़तापूर्वक व्रत का पालन करते हुए वन में रहने का अटल निश्चय कर चुकी है, तथापि भरत के स्नेह से संतप्त होकर पुन: चञ्चल हो उठती है। मुझे भरत की वे परम प्रिय, मधुर, मन को भाने वाली और अमृत के समान हृदय को आह्लाद प्रदान करने वाली बातें याद आ रही हैं। रघुकुलनन्दन लक्ष्मण! कब वह दिन आयेगा, जब मैं तुम्हारे साथ चलकर महात्मा भरत और वीरवर शत्रुघ्न से मिलूँगा।
इस प्रकार विलाप करते हुए ककुत्स्थकुलभूषण भगवान् श्रीराम ने लक्ष्मण और सीता के साथ गोदावरी नदी के तट पर जाकर स्नान किया। वहाँ स्नान करके उन्होंने गोदावरी के जल से देवताओं और पितरों का तर्पण किया। तदनन्तर जब सूर्योदय हुआ, तब वे तीनों निष्पाप व्यक्ति भगवान् सूर्य का उपस्थान करके अन्य देवताओं की भी स्तुति करने लगे।
सीता और लक्ष्मण के साथ स्नान करके भगवान् श्रीराम उसी प्रकार शोभा पाने लगे, जैसे पर्वतराजपुत्री उमा और नन्दी के साथ गङ्गाजी में अवगाहन करके भगवान् रुद्र सुशोभित होते हैं।
इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का भाग-१८(18) समाप्त !

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