उधर पुरुषसिंह श्रीराम हाथ जोड़े हुए ज्यों ही कैकेयी के महल से बाहर निकलने लगे, त्यों ही अन्त:पुर में रहने वाली राजमहिलाओं का महान् आर्तनाद प्रकट हुआ।वे कह रही थीं - हाय ! जो पिता के आज्ञा न देने पर भी समस्त अन्त: पुर के आवश्यक कार्यों में स्वतः संलग्न रहते थे, जो हम लोगों के सहारे और रक्षक थे, वे श्रीराम आज वन को चले जायेंगे। वे रघुनाथजी जन्म से ही अपनी माता कौशल्या के प्रति सदा जैसा बर्ताव करते थे, वैसा ही हमारे साथ भी करते थे।
'जो कठोर बात कह देने पर भी कुपित नहीं होते थे, दूसरों के मन में क्रोध उत्पन्न करनेवाली बातें नहीं बोलते थे तथा जो सभी रूठे हुए व्यक्तियों को मना लिया करते थे, वे ही श्रीराम आज यहाँ से वन को चले जायेंगे। बड़े खेद की बात है कि हमारे महाराज की बुद्धि मारी गयी। ये इस समय सम्पूर्ण जीव जगत का विनाश करने पर तुले हुए हैं, तभी तो ये समस्त प्राणियों के जीवनाधार श्रीराम का परित्याग कर रहे हैं।'
इस प्रकार समस्त स्त्रियां अपने राजा को कोसने लगीं और बछड़ों से बिछुड़ी हुई गौओं की तरह उच्च स्वर से क्रन्दन करने लगीं। अन्तःपुर का वह भयङ्कर आर्तनाद सुनकर महाराज दशरथ ने पुत्रशोक से संतप्त हो लज्जा के मारे बिछौने में ही अपने को छिपा लिया। इधर जितेन्द्रिय श्रीरामचन्द्रजी स्वजनों के दु:ख से अधिक खिन्न होकर हाथी के समान लंबी साँस खींचते हुए भाई लक्ष्मण के साथ माता के अन्तः पुर में गये। वहाँ उन्होंने उस घर के दरवाजे पर एक परम पूजित वृद्ध पुरुष को बैठा हुआ देखा और दूसरे भी बहुत-से मनुष्य वहाँ खड़े दिखायी दिये। वे सब-के-सब विजयी वीरों में श्रेष्ठ रघुनन्दन श्रीराम को देखते ही जय-जयकार करते हुए उनकी सेवा में उपस्थित हुए और उन्हें बधाई देने लगे।
पहली ड्योढ़ी पार करके जब वे दूसरी में पहुँचे, तब वहाँ उन्हें राजा के द्वारा सम्मानित बहुत-से वेदज्ञ ब्राह्मण दिखायी दिये। उन वृद्ध ब्राह्मणों को प्रणाम करके श्रीरामचन्द्रजी जब तीसरी ड्योढ़ी में पहुँचे, तब वहाँ उन्हें द्वाररक्षा के कार्य में लगी हुई बहुत-सी नववयस्का एवं वृद्ध अवस्थावाली स्त्रियाँ दिखायी दीं। उन्हें देखकर उन स्त्रियों को बड़ा हर्ष हुआ। श्रीराम को बधाई देकर उन स्त्रियों ने तत्काल महल के भीतर प्रवेश किया और तुरंत ही श्रीरामचन्द्रजी की माता को उनके आगमन का प्रिय समाचार सुनाया।
उस समय देवी कौशल्या पुत्र की मङ्गलकामना से रातभर जागकर सबेरे एकाग्रचित्त हो भगवान् विष्णु की पूजा कर रही थीं। वे रेशमी वस्त्र पहनकर बड़ी प्रसन्नता के साथ निरन्तर व्रतपरायण होकर मङ्गलकृत्य पूर्ण करने के पश्चात् मन्त्रोच्चारणपूर्वक उस समय अग्नि में आहुति दे रही थीं। उसी समय श्रीराम ने माता के शुभ अन्त:पुर में प्रवेश करके वहाँ माता को देखा। वे अग्नि में हवन करा रही थीं। रघुनन्दन ने देखा तो वहाँ देव - कार्य के लिये बहुत सी सामग्री संग्रह करके रखी हुई है। दही, अक्षत, घी, मोदक, हविष्य, धान का लावा, सफेद माला, खीर, खिचड़ी, समिधा और भरे हुए कलश – ये सब वहाँ दृष्टिगोचर हुए।
उत्तम कान्तिवाली माता कौशल्या सफेद रंग की रेशमी साड़ी पहने हुए थीं। वे व्रत के अनुष्ठान से दुर्बल हो गयी थीं और इष्टदेवता का तर्पण कर रही थीं। इस अवस्था में श्रीराम ने उन्हें देखा। माता का आनन्द बढ़ानेवाले प्रिय पुत्र को बहुत देर के बाद सामने उपस्थित देख कौशल्या देवी बड़े हर्ष में भरकर उसकी ओर चलीं, मानो कोई घोड़ी अपने बछेडे को देखकर बड़े हर्ष से उसके पास आयी हो। श्रीरघुनाथजी ने निकट आयी हुई माता के चरणों में प्रणाम किया और माता कौशल्या ने उन्हें दोनों भुजाओं से कसकर छाती से लगा लिया तथा बड़े प्यार से उनका मस्तक सूँघा।
उस समय कौशल्या देवी ने अपने दुर्जय पुत्र श्रीरामचन्द्रजी से पुत्रस्नेह वश यह प्रिय एवं हितकर बात कही - पुत्र! तुम धर्मशील, वृद्ध एवं महात्मा राजर्षियों के समान आयु, कीर्ति और कुलोचित धर्म प्राप्त करो। रघुनन्दन! अब तुम जाकर अपने सत्यप्रतिज्ञ पिता राजा का दर्शन करो। वे धर्मात्मा नरेश आज ही तुम्हारा युवराज के पद पर अभिषेक करेंगे।
यह कहकर माता ने उन्हें बैठने के लिये आसन दिया और भोजन करने को कहा। भोजन के लिये निमन्त्रित होकर श्रीराम ने उस आसन का स्पर्श मात्र कर लिया। फिर वे अञ्जलि फैलाकर माता से कुछ कहने को उद्यत हुए। स्वभाव से ही विनयशील तथा माता के गौरव से भी उनके सामने नतमस्तक हो गये थे। उन्हें दण्डकारण्य को प्रस्थान करना था, अत: वे उसके लिये आज्ञा लेने का उपक्रम करने लगे।
उन्होंने कहा – माँ! निश्चय ही तुम्हें मालूम नहीं है, तुम्हारे ऊपर महान् भय उपस्थित हो गया है। इस समय मैं जो बात कहने जा रहा हूँ, उसे सुनकर तुम को, सीता को और लक्ष्मण को भी दुःख होगा; तथापि कहूँगा। अब तो मैं दण्डकारण्य में जाऊँगा, अत: ऐसे बहुमूल्य आसन की मुझे क्या आवश्यकता है? अब मेरे लिये यह कुश की चटाई पर बैठने का समय आया है।
'मैं राजभोग्य वस्तु का त्याग करके मुनि की भाँति कन्द, मूल और फलों से जीवन निर्वाह करता हुआ चौदह वर्षों तक निर्जन वन में निवास करूँगा। महाराज युवराज का पद भरत को दे रहे हैं और मुझे तपस्वी बनाकर दण्डकारण्य में भेज रहे हैं। अत: चौदह वर्षों तक निर्जन वन में रहूँगा और जंगल में सुलभ होने वाले वल्कल आदि को धारण करके फल- मूल के आहार से ही जीवन निर्वाह करता रहूँगा।'
यह अप्रिय बात सुनकर वन में फरसे से काटी हुई शालवृक्ष की शाखा के समान कौशल्या देवी सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ीं, मानो स्वर्ग से कोई देवाङ्गना भूतल पर आ गिरी हो। जिन्होंने जीवन में कभी दुःख नहीं देखा था जो दुःख भोगने के योग्य थीं ही नहीं, उन्हीं माता कौशल्या को कटी हुई कदली की भाँति अचेत अवस्था में भूमि पर पड़ी देख श्रीराम ने हाथ का सहारा देकर उठाया। जैसे कोई घोड़ी पहले बड़ा भारी बोझ ढो चुकी हो और थकावट दूर करने के लिये धरती पर लोट-पोटकर उठी हो, उसी तरह उठी हुई कौशल्याजी के समस्त अङ्गों में धूल लिपट गयी थी और वे अत्यन्त दीन दशा को पहुँच गयी थीं। उस अवस्था में श्रीराम ने अपने हाथ से उनके अगों की धूल पोंछी।
कौशल्याजी ने जीवन में पहले सदा सुख ही देखा था और उसी के योग्य थीं, परंतु उस समय वे दु:ख से कातर हो उठी थीं। उन्होंने लक्ष्मण के सुनते हुए अपने पास बैठे पुरुषसिंह श्रीराम से इस प्रकार कहा - पुत्र रघुनन्दन ! यदि तुम्हारा जन्म न हुआ होता तो मुझे इस एक ही बात का शोक रहता। आज जो मुझ पर इतना भारी दुःख आ पड़ा है, इसे वन्ध्या होने पर मुझे नहीं देखना पड़ता। बेटा! वन्ध्या को एक मानसिक शोक होता है। उसके मन में यह संताप बना रहता है कि मुझे कोई संतान नहीं है, इसके सिवा दूसरा कोई दुःख उसे नहीं होता।
'पुत्र राम ! पति के प्रभुत्वकाल में एक ज्येष्ठ पत्नी को जो कल्याण या सुख प्राप्त होना चाहिये, वह मुझे पहले कभी नहीं देखने को मिला। सोचती थी, पुत्र के राज्य में मैं सब सुख देख लूँगी और इसी आशा से मैं अब तक जीती रही। बड़ी रानी होकर भी मुझे अपनी बातों से हृदय को विदीर्ण कर देने वाली छोटी सौतों के बहुत से अप्रिय वचन सुनने पड़ेंगे। स्त्रियों के लिये इससे बढ़कर महान् दु:ख और क्या होगा; अतः मेरा शोक और विलाप जैसा है, उसका कभी अन्त नहीं है।'
‘तात! तुम्हारे निकट रहने पर भी मैं इस प्रकार सौतों से तिरस्कृत रही हूँ, फिर तुम्हारे परदेश चले जाने पर मेरी क्या दशा होगी? उस दशा में तो मेरा मरण ही निश्चित है। पति की ओर से मुझे सदा अत्यन्त तिरस्कार अथवा कड़ी फटकार ही मिली है, कभी प्यार और सम्मान नहीं प्राप्त हुआ है। मैं कैकेयी की दासियों के बराबर अथवा उनसे भी गयी - बीती समझी जाती हूँ। जो कोई मेरी सेवा में रहता या मेरा अनुसरण करता है, वह भी कैकेयी के पुत्र को देखकर चुप हो जाता है, मुझसे बात नहीं करता है।'
‘पुत्र! इस दुर्गति में पड़कर मैं सदा क्रोधी स्वभाव के कारण कटुवचन बोलने वाले उस कैकेयी के मुख को कैसे देख सकूँगी। रघुनन्दन! तुम्हारे उपनयनरूप द्वितीय जन्म लिये सत्रह वर्ष बीत गये (अर्थात् तुम अब सत्ताईस वर्षके हो गये)। अबतक मैं यही आशा लगाये चली आ रही थी कि अब मेरा दुःख दूर हो जायेगा।'
‘राघव! अब इस बुढ़ापे में इस तरह सौतों का तिरस्कार और उससे होनेवाले महान् अक्षय दुःख को मैं अधिक काल तक नहीं सह सकती। पूर्ण चन्द्रमा के समान तुम्हारे मनोहर मुख को देखे बिना मैं दु:खिनी दयनीय जीवनवृत्ति से रहकर कैसे निर्वाह करूँगी। बेटा! यदि तुझे इस देश से निकल ही जाना है तो मुझ भाग्यहीना ने बारंबार उपवास, देवताओं का ध्यान तथा बहुत-से परिश्रम जनक उपाय करके व्यर्थ ही तुम्हारा इतने कष्ट से पालन-पोषण किया है।'
'मैं समझती हूँ कि निश्चय ही यह मेरा हृदय बड़ा कठोर है, जो तुम्हारे बिछोह की बात सुनकर भी वर्षाकाल के नूतन जल प्रवाह से टकराये हुए महानदी के कगार की भाँति फट नहीं जाता है। निश्चय ही मेरे लिये कहीं मौत नहीं है, यमराज के घर में भी मेरे लिये जगह नहीं है, तभी तो जैसे किसी रोती हुई मृगी को सिंह जबरदस्ती उठा ले जाता है, उसी प्रकार यमराज मुझे आज ही उठा ले जाना नहीं चाहता है।'
'अवश्य ही मेरा कठोर हृदय लोहे का बना हुआ है, जो पृथ्वी पर पड़ने पर भी न तो फटता है और न टूक-टूक हो जाता है। इसी दु:ख से व्याप्त हुए इस शरीर के भी टुकड़े-टुकड़े नहीं हो जाते हैं। निश्चय ही, मृत्युकाल आये बिना किसी का मरण नहीं होता है। सबसे अधिक दु:ख की बात तो यह है कि पुत्र के सुख के लिये मेरे द्वारा किये गये व्रत, दान और संयम सब व्यर्थ हो गये। मैंने संतान की हित-कामना से जो तप किया है, वह भी ऊसर में बोये हुए बीज की भाँति निष्फल हो गया।'
‘यदि कोई मनुष्य भारी दुःख से पीड़ित हो असमय में भी अपनी इच्छा के अनुसार मृत्यु पा सके तो मैं तुम्हारे बिना अपने बछड़े से बिछुड़ी हुई गाय की भाँति आज ही यमराज की सभा में चली जाऊँ। चन्द्रमा के समान मनोहर मुख - कान्ति वाले श्रीराम ! यदि मेरी मृत्यु नहीं होती है तो तुम्हारे बिना यहाँ व्यर्थ कुत्सित जीवन क्यों बिताऊँ? बेटा! जैसे गौ दुर्बल होने पर भी अपने बछड़े के लोभ से उसके पीछे-पीछे चली जाती है, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारे साथ ही वन को चली चलूँगी।'
आने वाले भारी दु:ख को सहने में असमर्थ हो महान् संकट का विचार करके सत्य के ध्यान में बँधे हुए अपने पुत्र श्रीरघुनाथजी की ओर देखकर माता कौशल्या उस समय बहुत विलाप करने लगीं, मानो कोई किन्नरी अपने पुत्र को बन्धन में पड़ा हुआ देखकर बिलख रही हो।

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