भाग-१६(16) श्रीराम की कैकेयी के साथ बातचीत और वन में जाना स्वीकार करके उनका माता कौशल्या के पास आज्ञा लेने के लिये जाना

 


वह अप्रिय तथा मृत्यु के समान कष्टदायक वचन सुनकर भी शत्रुसूदन श्रीराम व्यथित नहीं हुए । उन्होंने कैकेयी से इस प्रकार कहा - माँ! बहुत अच्छा! ऐसा ही हो। मैं महाराज की प्रतिज्ञा का पालन करने के लिये जटा और चीर धारण करके वन में रहने के निमित्त अवश्य यहाँ से चला जाऊँगा। परंतु मैं यह जानना चाहता हूँ कि आज दुर्जय तथा शत्रुओं का दमन करने वाले महाराज मुझसे पहले की तरह प्रसन्नता पूर्वक बोलते क्यों नहीं हैं? 

‘माता ! मैं तुम्हारे सामने ऐसी बात पूछ रहा हूँ, इसलिये तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिये। निश्चय चीर और जटा धारण करके मैं वन को चला जाऊँगा, तुम प्रसन्न रहो। राजा मेरे हितैषी, गुरु, पिता और कृतज्ञ हैं। इनकी आज्ञा होने पर मैं इनका कौन सा ऐसा प्रिय कार्य है, जिसे निःशङ्क होकर न कर सकूँ ? किंतु मेरे मन को एक ही हार्दिक दुःख अधिक जला रहा है कि स्वयं महाराज ने मुझसे भरत के अभिषेक की बात नहीं कही।' 

'मैं केवल तुम्हारे कहने से भी अपने भाई भरत के लिये इस राज्य को, प्यारे प्राणों को तथा सारी सम्पत्ति को भी प्रसन्नतापूर्वक स्वयं ही दे सकता हूँ। फिर यदि स्वयं महाराज मेरे पिताजी आज्ञा दें और वह भी तुम्हारा प्रिय कार्य करने के लिये, तो मैं प्रतिज्ञा का पालन करते हुए उस कार्य को क्यों नहीं करूँगा? तुम मेरी ओर से विश्वास दिलाकर इन लज्जाशील महाराज को आश्वासन दो। ये पृथ्वीनाथ पृथ्वी की ओर दृष्टि किये धीरे-धीरे आँसू क्यों बहा रहे हैं ? आज ही महाराज की आज्ञा से दूत शीघ्रगामी घोड़ों पर सवार होकर भरत को मामा के यहाँ से बुलाने के लिये चले जायें।  मैं अभी पिता की बात पर कोई विचार न करके चौदह वर्षों तक वन में रहने के लिये तुरंत दण्डकारण्य को चला ही जाता हूँ।' 

श्रीराम की वह बात सुनकर कैकेयी बहुत प्रसन्न हुई। उसे विश्वास हो गया कि ये वन को चले जायेंगे। अतः श्रीराम को जल्दी जाने की प्रेरणा देती हुई वह बोली - तुम ठीक कहते हो, ऐसा ही होना चाहिये। भरत को मामा के यहाँ से बुला लाने के लिये दूतलोग शीघ्रगामी घोड़ों पर सवार होकर अवश्य जायेंगे। परंतु राम! तुम वन में जाने के लिये स्वयं ही उत्सुक जान पड़ते हो; अत: तुम्हारा विलम्ब करना मैं ठीक नहीं समझती। जितना शीघ्र सम्भव हो, तुम्हें यहाँ से वन को चल देना चाहिये। नरश्रेष्ठ! राजा लज्जित होने के कारण जो स्वयं तुमसे नहीं कहते हैं, यह कोई विचारणीय बात नहीं है। अतः इसका दुःख तुम अपने मन से निकाल दो। श्रीराम ! तुम जबतक अत्यन्त उतावली के साथ इस नगर से वन को नहीं चले जाते, तबतक तुम्हारे पिता स्नान अथवा भोजन नहीं करेंगे।  

कैकेयी की यह बात सुनकर शोक में डूबे हुए राजा दशरथ लंबी साँस खींचकर बोले - धिक्कार है! हाय! बड़ा कष्ट हुआ ! इतना कहकर वे मूर्च्छित हो उस सुवर्णभूषित पलंग पर गिर पड़े। 

उस समय श्रीराम ने राजा को उठाकर बैठा दिया और कैकेयी से प्रेरित हो कोड़े की चोट खाये हुए घोड़े की भाँति वे शीघ्रतापूर्वक वन को जाने के लिये उतावले हो उठे। अनार्या कैकेयी के उस अप्रिय एवं दारुण वचन को सुनकर भी श्रीराम के मन में व्यथा नहीं हुई। 

वे कैकेयी से बोले – माता ! मैं धन का उपासक होकर संसार में नहीं रहना चाहता। तुम विश्वास रखो ! मैंने भी ऋषियों की ही भाँति निर्मल धर्म का आश्रय ले रखा है। पूज्य पिताजी का जो भी प्रिय कार्य मैं कर सकता हूँ, उसे प्राण देकर भी करूँगा। तुम उसे सर्वथा मेरे द्वारा हुआ ही समझो। पिता की सेवा अथवा उनकी आज्ञा का पालन करना, जैसा महत्त्वपूर्ण धर्म है, उससे बढ़कर संसार में दूसरा कोई धर्माचरण नहीं है। 

'यद्यपि पूज्य पिताजी ने स्वयं मुझसे नहीं कहा है, तथापि मैं तुम्हारे ही कहने से चौदह वर्षों तक इस भूतल पर निर्जन वन में निवास करूँगा। 

‘माँ! तुम्हारा मुझ पर पूरा अधिकार है। मैं तुम्हारी प्रत्येक आज्ञा का पालन कर सकता हूँ; फिर भी तुमने स्वयं मुझसे न कहकर इस कार्य के लिये महाराज से कहा – इनको कष्ट दिया। इससे जान पड़ता है कि तुम मुझमें कोई गुण नहीं देखती हो। अच्छा! अब मैं माता कौशल्या से आज्ञा ले लूँ और सीता को भी समझा-बुझा लूँ, इसके बाद आज ही विशाल दण्डकवन की यात्रा करूँगा। तुम ऐसा प्रयत्न करना, जिससे भरत इस राज्य का पालन और पिताजी की सेवा करते रहें; क्योंकि यही सनातन धर्म है।' 

श्रीराम का यह वचन सुनकर पिता को बहुत दु:ख हुआ। वे शोक के आवेग से कुछ बोल न सके, केवल फूट-फूटकर रोने लगे। महातेजस्वी श्रीराम उस समय अचेत पड़े हुए पिता महाराज दशरथ तथा अनार्या कैकेयी के भी चरणों में प्रणाम करके उस भवन से निकले। पिता दशरथ और माता कैकेयी की परिक्रमा करके उस अन्तःपुर से बाहर निकलकर श्रीराम अपने सुहृदों से मिले। सुमित्रा का आनन्द बढ़ानेवाले लक्ष्मण उस अन्याय को देखकर अत्यन्त कुपित हो उठे थे, तथापि दोनों नेत्रों में आँसू भरकर वे चुपचाप श्रीरामचन्द्रजी के पीछे-पीछे चले गये। 

श्रीरामचन्द्रजी के मन में अब वन जाने की आकांक्षा का उदय हो गया था, अतः अभिषेक के लिये एकत्र की हुई सामग्रियों की प्रदक्षिणा करते हुए वे धीरे-धीरे आगे बढ़ गये। उनकी ओर उन्होंने दृष्टिपात नहीं किया। श्रीराम अविनाशी कान्ति से युक्त थे, इसलिये उस समय राज्य का न मिलना उन लोककमनीय श्रीराम की महती शोभा में कोई अन्तर न डाल सका; जैसे चन्द्रमा का क्षीण होना उसकी सहज शोभा का अपकर्ष नहीं कर पाता है। वे वन में जाने को उत्सुक थे और सारी पृथ्वी का राज्य छोड़ रहे थे; फिर भी उनके चित्त में सर्वलोकातीत जीवन्मुक्त महात्मा की भाँति कोई विकार नहीं देखा गया। 

श्रीराम ने अपने ऊपर सुन्दर छत्र लगाने की मनाही कर दी। डुलाये जानेवाले सुसज्जित चँवर भी रोक दिये। वे रथको लौटाकर स्वजनों तथा पुरवासी मनुष्यों को भी विदा करके आत्मीय जनों के दु:ख से होने वाले दु:ख को मन में ही दबाकर इन्द्रियों को काबू में करके यह अप्रिय समाचार सुनाने के लिये माता कौशल्या के महल में गये। उस समय उन्होंने मन को पूर्णत: वश में कर रखा था। जो शोभाशाली मनुष्य सदा सत्यवादी श्रीमान् राम के निकट रहा करते थे, उन्होंने भी उनके मुख पर कोई विकार नहीं देखा। 

मन को वश में रखने वाले महाबाहु श्रीराम ने अपनी स्वाभाविक प्रसन्नता उसी तरह नहीं छोड़ी थी, जैसे शरद्- काल का उद्दीप्त किरणों वाला चन्द्रमा अपने सहज तेज का परित्याग नहीं करता है। महायशस्वी धर्मात्मा श्रीराम मधुर वाणी से सब लोगों का सम्मान करते हुए अपनी माता के समीप गये। उस समय गुणों में श्रीराम की ही समानता करने वाले महापराक्रमी भ्राता सुमित्रा कुमार लक्ष्मण भी अपने मानसिक दुःख को मन में ही धारण किये हुए श्रीराम के पीछे-पीछे गये। अत्यन्त आनन्द से भरे हुए उस भवन में प्रवेश करके लौकिक दृष्टि से अपने अभीष्ट अर्थ का विनाश हुआ देखकर भी हितैषी सुहृदों के प्राणों पर संकट आ जाने की आशङ्का से श्रीराम ने यहाँ अपने मुख पर कोई विकार नहीं प्रकट होने दिया। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-१६(16) समाप्त !

No comments:

Post a Comment

रामायण: एक परिचय

रामायण संस्कृत के रामायणम् का हिंदी रूपांतरण है जिसका शाब्दिक अर्थ है राम की जीवन यात्रा। रामायण और महाभारत दोनों सनातन संस्कृति के सबसे प्र...