भाग-१५(15) श्रीराम का कैकेयी से पिता के चिन्तित होने का कारण पूछना और कैकेयी का कठोरता पूर्वक अपने माँगे हुए वरों का वृत्तान्त बताकर श्रीराम को वनवास के लिये प्रेरित करना

 


महल में जाकर श्रीराम ने पिता को कैकेयी के साथ एक सुन्दर आसन पर बैठे देखा। वे विषाद में डूबे हुए थे, उनका मुँह सूख गया था और वे बड़े दयनीय दिखायी देते थे। निकट पहुँचने पर श्रीराम ने विनीतभाव से पहले अपने पिता के चरणों में प्रणाम किया; उसके बाद बड़ी सावधानी के साथ उन्होंने कैकेयी के चरणों में भी मस्तक झुकाया। उस समय दीनदशा में पड़े हुए राजा दशरथ एक बार 'राम!' ऐसा कहकर चुप हो गये इससे आगे उनसे बोला नहीं गया। उनके नेत्रों में आँसू भर आये, अत: वे श्रीराम की ओर न तो देख सके और न उनसे कोई बात ही कर सके। 

राजा का वह अभूतपूर्व भयंकर रूप देखकर श्रीराम को भी भय हो गया, मानो उन्होंने पैर से किसी सर्प को छू दिया हो। राजा की इन्द्रियों में प्रसन्नता नहीं थी; वे शोक और संताप से दुर्बल हो रहे थे, बारंबार लंबी साँसें भरते थे तथा उनके चित्त में बड़ी व्यथा और व्याकुलता थी। वे ऐसे दिखते थे, मानो तरङ्गमालाओं से उपलक्षित अक्षोभ्य समुद्र क्षुब्ध हो उठा हो, सूर्य को राहु ने ग्रस लिया हो अथवा किसी महर्षि ने झूठ बोल दिया हो । राजा का वह शोक सम्भावना से परे था। इस शोक का क्या कारण है - यह सोचते हुए श्रीरामचन्द्रजी पूर्णिमा के समुद्र की भाँति अत्यन्त विक्षुब्ध हो उठे। 

पिता के हित में तत्पर रहनेवाले परम चतुर श्रीराम सोचने लगे कि आज ही ऐसी क्या बात हो गयी जिससे महाराज मुझसे प्रसन्न होकर बोलते नहीं हैं और दिन तो पिताजी कुपित होने पर भी मुझे देखते ही प्रसन्न हो जाते थे, आज मेरी ओर दृष्टिपात करके इन्हें क्लेश क्यों हो रहा है। यह सब सोचकर श्रीराम दीन-से हो गये, शोक से कातर हो उठे, विषाद के कारण उनके मुख की कान्ति फीकी पड़ गयी। 

वे कैकेयी को प्रणाम करके उसी से पूछने लगे - मां! मुझसे अनजान में कोई अपराध तो नहीं हो गया, जिससे पिताजी मुझपर नाराज हो गये हैं। तुम यह बात मुझे बताओ और तुम्हीं इन्हें मना दो। ये तो सदा मुझे प्यार करते थे, आज इनका मन अप्रसन्न क्यों हो गया? देखता हूँ, ये आज मुझसे बोलते तक नहीं हैं, इनके मुख पर विषाद छा रहा है और ये अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं। कोई शारीरिक व्याधि जनित संताप अथवा मानसिक अभिताप (चिन्ता) तो इन्हें पीड़ित नहीं कर रहा है? क्योंकि मनुष्य को सदा सुख ही सुख मिले - ऐसा सुयोग प्राय: दुर्लभ होता है। 

‘प्रियदर्शन कुमार भरत, महाबली शत्रुघ्न अथवा मेरी माताओं का तो कोई अमङ्गल नहीं हुआ है ? महाराज को असंतुष्ट करके अथवा इनकी आज्ञा न मानकर इन्हें कुपित कर देने पर मैं दो घड़ी भी जीवित रहना नहीं चाहूँगा। मनुष्य जिसके कारण इस जगत में अपना प्रादुर्भाव (जन्म) देखता है, उस प्रत्यक्ष देवता पिता के जीते जी वह उसके अनुकूल बर्ताव क्यों न करेगा?' 

‘कहीं तुमने तो अभिमान या रोष के कारण मेरे पिताजी से कोई कठोर बात नहीं कह डाली, जिससे इनका मन दुःखी हो गया है ? माँ! मैं सच्ची बात पूछता हूँ, बताओ, किस कारण से महाराज के मन में आज इतना विकार (संताप) है? इनकी ऐसी अवस्था तो पहले कभी नहीं देखी गयी थी।' 

महात्मा श्रीराम के इस प्रकार पूछने पर अत्यन्त निर्लज्ज कैकेयी बड़ी ढिठाई के साथ अपने मतलब की बात इस प्रकार बोली - राम! महाराज कुपित नहीं हैं और न इन्हें कोई कष्ट ही हुआ है। इनके मन में कोई बात है, जिसे तुम्हारे डर से ये कह नहीं पा रहे हैं। तुम इनके प्रिय हो, तुमसे कोई अप्रिय बात कहने के लिये इनकी जबान नहीं खुलती; किंतु इन्होंने जिस कार्य के लिये मेरे सामने प्रतिज्ञा की है, उसका तुम्हें अवश्य पालन करना चाहिये। 

‘इन्होंने पहले तो मेरा सत्कार करते हुए मुझे मुँह माँगा वरदान दे दिया और अब ये दूसरे गँवार मनुष्यों की भाँति उसके लिये पश्चात्ताप करते हैं। ये प्रजानाथ पहले ‘मैं दूँगा' - ऐसी प्रतिज्ञा करके मुझे वर दे चुके हैं और अब उसके निवारण के लिये व्यर्थ प्रयत्न कर रहे हैं, पानी निकल जाने पर उसे रोकने के लिये बाँध बाँधने की निरर्थक चेष्टा करते हैं।' 

‘राम! सत्य ही धर्म की जड़ है, यह सत्पुरुषों का भी निश्चय है। कहीं ऐसा न हो कि ये महाराज तुम्हारे कारण मुझपर कुपित होकर अपने उस सत्य को ही छोड़ बैठें। जैसे भी इनके सत्य का पालन हो, वैसा तुम्हें करना चाहिये। यदि राजा जिस बात को कहना चाहते हैं, वह शुभ हो या अशुभ, तुम सर्वथा उसका पालन करो तो मैं सारी बात पुनः तुमसे कहूँगी। यदि राजा की कही हुई बात तुम्हारे कानों में पड़कर वहीं नष्ट न हो जाये – यदि तुम उनकी प्रत्येक आज्ञा का पालन कर सको तो मैं तुमसे सब कुछ खोलकर बता दूँगी, ये स्वयं तुमसे कुछ नहीं कहेंगे।' 

कैकेयी की कही हुई यह बात सुनकर श्रीराम के मन में बड़ी व्यथा हुई। उन्होंने राजा के समीप ही देवी कैकेयी से इस प्रकार कहा - अहो ! धिक्कार है! माता! तुम्हें मेरे प्रति ऐसी बात मुंह से नहीं निकालनी चाहिये। मैं महाराज के कहने से आग में भी कूद सकता हूँ, तीव्र विष का भी भक्षण कर सकता हूँ और समुद्र में भी गिर सकता हूँ! महाराज मेरे गुरु, पिता और हितैषी हैं, मैं उनकी आज्ञा पाकर क्या नहीं कर सकता? इसलिये माँ! राजा को जो अभीष्ट है, वह बात मुझे बताओ! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ, उसे पूर्ण करूँगा। राम दो तरह की बात नहीं करता है। 

श्रीराम सरल स्वभाव से युक्त और सत्यवादी थे, उनकी बात सुनकर अनार्या कैकेयी ने अत्यन्त दारुण वचन कहना आरम्भ किया – रघुनन्दन ! पहले की बात है, देवासुरसंग्राम में तुम्हारे पिता शत्रुओं के बाणों से बिंध गये थे, उस महासमर में मैंने इनकी रक्षा की थी, उससे प्रसन्न होकर इन्होंने मुझे दो वर दिये थे। राघव! उन्हीं में से एक वर के द्वारा तो मैंने महाराज से यह याचना की है कि भरत का राज्याभिषेक हो और दूसरा वर यह माँगा है कि तुम्हें आज ही दण्डकारण्य में भेज दिया जाये। 

'नरश्रेष्ठ! यदि तुम अपने पिता को सत्यप्रतिज्ञ बनाना चाहते हो और अपने को भी सत्यवादी सिद्ध करने की इच्छा रखते हो तो मेरी यह बात सुनो। तुम पिता की आज्ञा के अधीन रहो, जैसी इन्होंने प्रतिज्ञा की है, उसके अनुसार तुम्हें चौदह वर्षों के लिये वन में प्रवेश करना चाहिये। रघुनन्दन! राजा ने तुम्हारे लिये जो यह अभिषेक का सामान जुटाया है, उस सबके द्वारा यहाँ भरत का अभिषेक किया जाये और तुम इस अभिषेक को त्यागकर चौदह वर्षों तक दण्डकारण्य में रहते हुए जटा और चीर धारण करो।'  

'कोशलनरेश की इस वसुधा का, जो नाना प्रकार के रत्नों से भरी-पूरी और घोड़े तथा रथों से व्याप्त है, भरत शासन करें। बस इतनी ही बात है, ऐसा करने से तुम्हारे वियोग का कष्ट सहन करना पड़ेगा, यह सोचकर महाराज करुणा में डूब रहे हैं। इसी शोक से इनका मुख सूख गया है और इन्हें तुम्हारी ओर देखने का साहस नहीं होता। रघुनन्दन राम! तुम राजा की इस आज्ञा का पालन करो और इनके महान् सत्य की रक्षा करके इन नरेश को संकट से उबार लो।' 

कैकेयी के इस प्रकार कठोर वचन कहने पर भी श्रीराम के हृदय में शोक नहीं हुआ, परंतु महानुभाव राजा दशरथ पुत्र भावी वियोग जनित दुःख से संतप्त एवं व्यथित हो उठे। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-१५(15) समाप्त !

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