श्रीरामचन्द्रजी के छोटे भाई लक्ष्मण ने आश्रम में प्रवेश करके अगस्त्यजी के शिष्य से भेंट की और उनसे यह बात कही - मुने! अयोध्या में जो दशरथ नाम से प्रसिद्ध राजा थे, उन्हीं के ज्येष्ठ पुत्र महाबली श्रीरामचन्द्रजी अपनी पत्नी सीता के साथ महर्षि का दर्शन करने के लिये आये हैं। मैं उनका छोटा भाई, हितैषी और अनुकूल चलने वाला भक्त हूँ। मेरा नाम लक्ष्मण है। सम्भव है यह नाम कभी आपके कानों में पड़ा हो। हम सब लोग पिता की आज्ञा से इस अत्यन्त भयंकर वन में आये हैं और भगवान् अगस्त्य मुनि का दर्शन करना चाहते हैं। आप उनसे यह समाचार निवेदन कीजिये।
लक्ष्मण की वह बात सुनकर उन तपोधन ने 'बहुत अच्छा' कहकर महर्षि को समाचार देने के लिये अग्निशाला में प्रवेश किया। अग्निशाला में प्रवेश करके अगस्त्य के उस प्रिय शिष्य ने जो अपनी तपस्या के प्रभाव से दूसरों के लिये दुर्जय थे, उन मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य के पास जा हाथ जोड़ लक्ष्मण के कथनानुसार उन्हें श्रीरामचन्द्रजी के आगमन का समाचार शीघ्रतापूर्वक यों सुनाया – महामुने! राजा दशरथ के ये दो पुत्र श्रीराम और लक्ष्मण आश्रम में पधारे हैं। श्रीराम अपनी धर्मपत्नी सीता के साथ हैं। वे दोनों शत्रुदमन वीर आपकी सेवा के उद्देश्य से आपका दर्शन करने के लिये आये हैं। अब इस विषय में जो कुछ कहना या करना हो, इसके लिये आप मुझे आज्ञा दें।
शिष्य से लक्ष्मण सहित श्रीराम और महाभागा विदेहनन्दिनी सीता के शुभागमन का समाचार सुनकर महर्षि ने इस प्रकार कहा - सौभाग्य की बात है कि आज चिरकाल के बाद श्रीरामचन्द्रजी स्वयं ही मुझसे मिलने के लिये आ गये। मेरे मन में भी बहुत दिनों से यह अभिलाषा थी कि वे एक बार मेरे आश्रम पर पधारते। जाओ, पत्नीसहित श्रीराम और लक्ष्मण को सत्कारपूर्वक आश्रम के भीतर मेरे समीप ले आओ। तुम अब तक उन्हें ले क्यों नहीं आये?
धर्मज्ञ महात्मा अगस्त्य मुनि के ऐसा कहने पर शिष्य ने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और कहा - बहुत अच्छा अभी ले आता हूँ।
इसके बाद वह शिष्य आश्रम से निकलकर शीघ्रतापूर्वक लक्ष्मण के पास गया और बोला - श्रीरामचन्द्रजी कौन हैं? वे स्वयं आश्रम में प्रवेश करें और मुनि का दर्शन करने के लिये चलें।
तब लक्ष्मण ने शिष्य के साथ आश्रम के द्वार पर जाकर उसे श्रीरामचन्द्रजी तथा जनककिशोरी श्रीसीता का दर्शन कराया। शिष्य ने बड़ी विनय के साथ महर्षि अगस्त्य की कही हुई बात वहाँ दुहरायी और जो सत्कार के योग्य थे, उन श्रीराम का यथोचित रीति से भलीभाँति सत्कार करके वह उन्हें आश्रममें ले गया।
उस समय श्रीराम ने लक्ष्मण और सीता के साथ आश्रम में प्रवेश किया। वह आश्रम शान्तभाव से रहने वाले हिरणों से भरा हुआ था। आश्रम की शोभा देखते हुए उन्होंने वहाँ ब्रह्माजी का स्थान और अग्निदेव का स्थान देखा। फिर क्रमश: भगवान् विष्णु, महेन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा, भग, कुबेर, धाता, विधाता, वायु, पाशधारी महात्मा वरुण, गायत्री, वसु, नागराज अनन्त, गरुड, कार्तिकेय तथा धर्मराज के पृथक्-पृथक् स्थान का निरीक्षण किया।
इतने ही में मुनिवर अगस्त्य भी शिष्यों से घिरे हुए अग्निशाला से बाहर निकले। वीर श्रीराम ने मुनियों के आगे-आगे आते हुए उद्दीप्त तेजस्वी अगस्त्यजी का दर्शन किया और अपनी शोभा का विस्तार करने वाले लक्ष्मण से इस प्रकार कहा – लक्ष्मण! भगवान् अगस्त्य मुनि आश्रम से बाहर निकल रहे हैं। ये तपस्या के निधि हैं। इनके विशिष्ट तेज के आधिक्य से ही मुझे पता चलता है कि ये अगस्त्यजी हैं।
सूर्यतुल्य तेजस्वी महर्षि अगस्त्य के विषय में ऐसा कहकर महाबाहु रघुनन्दन ने सामने से आते हुए उन मुनीश्वर के दोनों चरण पकड़ लिये। जिनमें योगियों का मन रमण करता है अथवा जो भक्तों को आनन्द प्रदान करने वाले हैं, वे धर्मात्मा श्रीराम उस समय विदेहकुमारी सीता और लक्ष्मण के साथ महर्षि के चरणों में प्रणाम करके हाथ जोड़कर खड़े हो गये।
महर्षि ने भगवान् श्रीराम को हृदय से लगाया और आसन तथा जल (पाद्य, अर्घ्य आदि) देकर उनका आतिथ्य-सत्कार किया। फिर कुशल- समाचार पूछकर उन्हें बैठने को कहा। अगस्त्यजी ने पहले अग्नि में आहुति दी, फिर वानप्रस्थधर्म के अनुसार अर्घ्य दे अतिथियों का भलीभाँति पूजन करके उनके लिये भोजन दिया।
धर्म के ज्ञाता मुनिवर अगस्त्यजी पहले स्वयं बैठे, फिर धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजी हाथ जोड़कर आसन पर विराजमान हुए। इसके बाद महर्षि ने उनसे कहा – ' काकुत्स्थ ! वानप्रस्थ को चाहिये कि वह पहले अग्नि को आहुति दे। तदनन्तर अर्घ्य देकर अतिथि का पूजन करे। जो तपस्वी इसके विपरीत आचरण करता है, उसे झूठी गवाही देनेवाले की भाँति परलोक में अपने ही शरीर का मांस खाना पड़ता है। आप सम्पूर्ण लोक के राजा, महारथी और धर्म का आचरण करने वाले हैं तथा मेरे प्रिय अतिथि के रूप में इस आश्रम पर पधारे हैं, अतएव आप हमलोगों के माननीय एवं पूजनीय हैं।
ऐसा कहकर महर्षि अगस्त्य ने फल, मूल, फूल तथा अन्य उपकरणों से इच्छानुसार भगवान् श्रीराम का पूजन किया। तत्पश्चात् अगस्त्यजी उनसे इस प्रकार बोले - पुरुषसिंह! यह महान् दिव्य धनुष विश्वकर्माजी ने बनाया है। इसमें सुवर्ण और हीरे जड़े हैं। यह भगवान् विष्णु का दिया हुआ है तथा यह जो सूर्य के समान देदीप्यमान अमोघ उत्तम बाण है, ब्रह्माजी का दिया हुआ है। इनके सिवा इन्द्र ने ये दो तरकस दिये हैं, जो तीखे तथा प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी बाणों से सदा भरे रहते हैं। कभी खाली नहीं होते। साथ ही यह तलवार भी है जिसकी मूठ में सोना जड़ा हुआ है। इसकी म्यान भी सोने की ही बनी हुई है।
‘श्रीराम! पूर्वकाल में भगवान् विष्णु ने इसी धनुष से युद्ध में बड़े-बड़े असुरों का संहार करके देवताओं की उद्दीप्त लक्ष्मी को उनके अधिकार से लौटाया था। मानद ! आप यह धनुष, ये दोनों तरकस, ये बाण और यह तलवार (राक्षसों पर) विजय पाने के लिये ग्रहण कीजिये। ठीक उसी तरह, जैसे वज्रधारी इन्द्र वज्र ग्रहण करते हैं।'
ऐसा कहकर महान् तेजस्वी अगस्त्य ने वे सभी श्रेष्ठ आयुध श्रीरामचन्द्रजी को सौंप दिये। तत्पश्चात् वे फिर बोले - श्रीराम! आपका कल्याण हो। मैं आप पर बहुत प्रसन्न हूँ। लक्ष्मण ! मैं तुम पर भी बहुत संतुष्ट हूँ। आप दोनों भाई मुझे प्रणाम करने के लिये जो सीता के साथ यहाँ तक आये, इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। रास्ता चलने के परिश्रम से आपलोगों को बहुत थकावट हुई है। इसके कारण जो कष्ट हुआ है, वह आप दोनों को पीड़ा दे रहा होगा। मिथिलेशकुमारी जानकी भी अपनी थकावट दूर करने के लिये अधिक उत्कण्ठित है, यह बात स्पष्ट ही जान पड़ती है। यह सुकुमारी है और इससे पहले इसे ऐसे दुःखों का सामना नहीं करना पड़ा है। वन में अनेक प्रकार के कष्ट होते हैं, फिर भी यह पतिप्रेम से प्रेरित होकर यहाँ आयी है।
'श्रीराम ! जिस प्रकार सीता का यहाँ मन लगे- जैसे भी यह प्रसन्न रहे, वही कार्य आप करें। वन में आपके साथ आकर इसने दुष्कर कार्य किया है। रघुनन्दन ! सृष्टिकाल से लेकर अब तक स्त्रियों का प्रायः यही स्वभाव रहता आया है कि यदि पति सम अवस्था में है अर्थात् धनधान्य से सम्पन्न, स्वस्थ एवं सुखी है, तब तो वे उसमें अनुराग रखती हैं, परंतु यदि वह विषम अवस्था में पड़ जाता है - दरिद्र एवं रोगी हो जाता है, तब उसे त्याग देती हैं।'
'स्त्रियाँ विद्युत की चपलता, शस्त्रों की तीक्ष्णता तथा गरुड एवं वायु की तीव्र गति का अनुसरण करती हैं। आपकी यह धर्मपत्नी सीता इन सब दोषों से रहित है। स्पृहणीय एवं पतिव्रताओं में उसी तरह अग्रगण्य है, जैसे देवियों में अरुन्धती। शत्रुदमन श्रीराम! आज से इस देश की शोभा बढ़ गयी, जहाँ सुमित्राकुमार लक्ष्मण और विदेहह्नन्दिनी सीता के साथ आप निवास करेंगे।'
मुनि के ऐसा कहने पर श्रीरामचन्द्रजी ने प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी उन महर्षि से दोनों हाथ जोड़कर यह विनययुक्त बात कही - भाई और पत्नीसहित जिसके अर्थात् मेरे गुणों से हमारे गुरुदेव मुनिवर अगस्त्यजी यदि संतुष्ट हो रहे हैं, तब तो मैं धन्य हूँ, मुझ पर मुनीश्वर का महान् अनुग्रह है।परंतु मुने! अब आप मुझे ऐसा कोई स्थान बताइये जहाँ बहुत से वन हों, जल की भी सुविधा हो तथा जहाँ आश्रम बनाकर मैं सुखपूर्वक सानन्द निवास कर सकूँ।
श्रीराम का यह कथन सुनकर मुनिश्रेष्ठ धर्मात्मा अगस्त्य ने दो घड़ी तक कुछ सोच-विचार किया। तदनन्तर वे यह शुभ वचन बोले - तात! यहाँ से दो योजन की दूरी पर पञ्चवटी नाम से विख्यात एक बहुत ही सुन्दर स्थान है, जहाँ बहुत-से मृग रहते हैं तथा फल-मूल और जल की अधिक सुविधा है। वहीं जाकर लक्ष्मण के साथ आप आश्रम बनाइये और पिता की यथोक्त आज्ञा का पालन करते हुए वहाँ सुखपूर्वक निवास कीजिये।
‘अनघ! आपका और राजा दशरथ का यह सारा वृत्तान्त मुझे अपनी तपस्या के प्रभाव से तथा आपके प्रति स्नेह होने के कारण अच्छी तरह विदित है। आपने तपोवन में मेरे साथ रहने की और वनवास का शेष समय यहीं बिताने की अभिलाषा प्रकट करके भी जो यहाँ से अन्यत्र रहने योग्य स्थान के विषय में मुझसे पूछा है, इसमें आपका हार्दिक अभिप्राय क्या है? यह मैंने अपने तपोबल से जान लिया है। आपने ऋषियों की रक्षा के लिये राक्षसों के वध की प्रतिज्ञा की है। इस प्रतिज्ञा का निर्वाह अन्यत्र रहने से ही हो सकता है; क्योंकि यहाँ राक्षसों का आना-जाना नहीं होता।'
‘इसीलिये मैं आपसे कहता हूँ कि पञ्चवटी में जाइये। वहाँ की वनस्थली बड़ी ही रमणीय है। वहाँ मिथिलेशकुमारी सीता आनन्दपूर्वक सब ओर विचरेंगी। रघुनन्दन ! वह स्पृहणीय स्थान यहाँ से अधिक दूर नहीं है। गोदावरी के पास (उसी के तट पर) है, अत: मैथिली का मन वहाँ खूब लगेगा। महाबाहो ! वह स्थान प्रचुर फल - मूलों से सम्पन्न, भाँति-भाँति के विहङ्गमों से सेवित, एकान्त, पवित्र और रमणीय है।'
'श्रीराम! आप भी सदाचारी और ऋषियों की रक्षा करने में समर्थ हैं। अत: वहाँ रहकर तपस्वी मुनियों का पालन कीजियेगा। वीर! यह जो महुओं का विशाल वन दिखायी देता है, इसके उत्तर से होकर जाना चाहिये। उस मार्ग से जाते हुए आपको आगे एक बरगद का वृक्ष मिलेगा। उससे आगे कुछ दूर तक ऊँचा मैदान है, उसे पार करने के बाद एक पर्वत दिखायी देगा। उस पर्वत से थोड़ी ही दूर पर पञ्चवटी नाम से प्रसिद्ध सुन्दर वन है, जो सदा फूलों से सुशोभित रहता है।'
महर्षि अगस्त्य के ऐसा कहने पर लक्ष्मण सहित श्रीराम ने उनका सत्कार करके उन सत्यवादी महर्षि से वहाँ जाने की आज्ञा माँगी। उनकी आज्ञा पाकर उन दोनों भाइयों ने उनके चरणों की वन्दना की और सीता के साथ वे पञ्चवटी नामक आश्रम की ओर चले। राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण ने पीठ पर तरकस बाँध हाथ में धनुष ले लिये। वे दोनों भाई समराङ्गणों में कातरता दिखाने वाले नहीं थे। वे दोनों बन्धु महर्षि के बताये हुए मार्ग से बड़ी सावधानी के साथ पञ्चवटी की ओर प्रस्थित हुए।

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