भाग-१४(14) सुमन्त्र का श्रीराम के महल में पहुँचकर महाराज का संदेश सुनाना

 

पुरातन वृत्तान्तों के ज्ञाता सूत सुमन्त्र मनुष्यों की भीड़ से भरे हुए उस अन्त: पुर के द्वार को लाँघकर महल की एकान्त कक्षा में जा पहुँचे, जहाँ भीड़ बिलकुल नहीं थी। वहाँ श्रीराम के चरणों में अनुराग रखने वाले एकाग्रचित्त एवं सावधान युवक प्रास और धनुष आदि लिये डटे हुए थे। उनके कानों में शुद्ध सुवर्ण के बने हुए कुण्डल झलमला रहे थे। उस ड्यौढ़ी में सुमन्त्र को गेरुआ वस्त्र पहने और हाथ में छड़ी लिये वस्त्राभूषणों से अलंकृत बहुत से वृद्ध पुरुष बड़ी सावधानी के साथ द्वार पर बैठे दिखायी दिये, जो अन्त:पुर की स्त्रियों के अध्यक्ष (संरक्षक) थे। 

सुमन्त्र को आते देख श्रीराम का प्रिय करने की इच्छा वाले वे सभी पुरुष सहसा वेगपूर्वक आसनों से उठकर खड़े हो गये। राजसेवा में अत्यन्त कुशल तथा विनीत हृदयवाले सूतपुत्र सुमन्त्र ने उनसे कहा – आप लोग श्रीरामचन्द्रजी से शीघ्र जाकर कहें, कि सुमन्त्र दरवाजे पर खड़े हैं। 

स्वामी का प्रिय करने की इच्छा वाले वे सब सेवक श्रीरामचन्द्रजी के पास जा पहुँचे। उस समय श्रीराम अपनी धर्मपत्नी सीता के साथ विराजमान थे। उन सेवकों ने शीघ्र ही उन्हें सुमन्त्र का संदेश सुना दिया। द्वाररक्षकों द्वारा दी हुई सूचना पाकर श्रीराम ने पिता की प्रसन्नता के लिये उनके अन्तरङ्ग सेवक सुमन्त्र को वहीं अन्तः पुर में बुलवा लिया। वहाँ पहुँचकर सुमन्त्र ने देखा श्रीरामचन्द्रजी वस्त्राभूषणों से अलंकृत हो कुबेर के समान जान पड़ते हैं और बिछौनों से युक्त सोने के पलंग पर विराजमान हैं। 

शत्रुओं को संताप देने वाले रघुनाथजी के श्रीअङ्गों में वाराह के रुधिर की भाँति लाल, पवित्र और सुगन्धित उत्तम चन्दन का लेप लगा हुआ है और देवी सीता उनके पास बैठकर अपने हाथ से चवर डुला रही हैं। सीता के अत्यन्त समीप बैठे हुए श्रीराम चित्रा से संयुक्त चन्द्रमा की भाँति शोभा पाते हैं। विनय के ज्ञाता वन्दी सुमन्त्र ने तपते हुए सूर्य की भाँति अपने नित्य प्रकाश से सम्पन्न रहकर अधिक प्रकाशित होने वाले वरदायक श्रीराम को विनीतभाव से प्रणाम किया। 

विहारकालिक शयन के लिये जो आसन था, उस पलंग पर बैठे हुए प्रसन्न मुख वाले राजकुमार श्रीराम का दर्शन करके राजा दशरथ द्वारा सम्मानित सुमन्त्र ने हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा – श्रीराम ! आपको पाकर महारानी कौशल्या सर्वश्रेष्ठ संतानवाली हो गयी हैं। इस समय रानी कैकेयी के साथ बैठे हुए आपके पिताजी आपको देखना चाहते हैं, अत: वहाँ चलिये, विलम्ब न कीजिये। 

सुमन्त्र के ऐसा कहने पर महातेजस्वी नरश्रेष्ठ श्रीराम ने सीताजी का सम्मान करते हुए प्रसन्नता पूर्वक उनसे इस प्रकार कहा - देवी! जान पड़ता है, पिताजी और माता कैकेयी दोनों मिलकर मेरे विषय में ही कुछ विचार कर रहे हैं। निश्चय ही मेरे अभिषेक के सम्बन्ध में ही कोई बात होती होगी। मेरे अभिषेक के विषय में राजा के अभिप्राय को लक्ष्य करके उनका प्रिय करने की इच्छा वाली परम उदार एवं समर्थ कजरारे नेत्रों वाली कैकेयी मेरे अभिषेक के लिये ही राजा को प्रेरित कर रही होंगी। 

'मेरी माता केकयराजकुमारी इस समाचार से बहुत प्रसन्न हुई होंगी। वे महाराज का हित चाहने वाली और उनकी अनुगामिनी हैं। साथ ही वे मेरा भी भला चाहती हैं। अत: वे महाराज को अभिषेक करने के लिये जल्दी करने को कह रही होंगी। सौभाग्य की बात है कि महाराज अपनी प्यारी रानी के साथ बैठे हैं और उन्होंने मेरे अभीष्ट अर्थ को सिद्ध करने वाले सुमन्त्र को ही दूत बनाकर भेजा है। जैसी वहाँ अन्तरङ्ग परिषद् बैठी है, वैसे ही दूत सुमन्त्रजी यहाँ पधारे हैं। अवश्य आज ही महाराज मुझे युवराज के पद पर अभिषिक्त करेंगे। अत: मैं प्रसन्नतापूर्वक यहाँ से शीघ्र जाकर महाराज का दर्शन करूंगा। तुम परिजनों के साथ यहाँ सुखपूर्वक बैठो और आनन्द करो।' 

पति द्वारा इस प्रकार सम्मानित होकर कजरारे नेत्रों वाली सीता देवी उनका मङ्गल - चिन्तन करती हुई स्वामी के साथ-साथ द्वार तक उन्हें पहुँचाने के लिये गयीं। 

उस समय वे बोलीं - आर्यपुत्र! ब्राह्मणों के साथ रहकर आपका युवराज पद पर अभिषेक करके महाराज दूसरे समय में राजसूय-यज्ञ में सम्राट के   पद पर आपका अभिषेक करने योग्य हैं। ठीक उसी तरह जैसे लोकस्रष्टा ब्रह्मा ने देवराज इन्द्र का अभिषेक किया था। आप राजसूय यज्ञ में दीक्षित हो तदनुकूल व्रत का पालन करने में तत्पर, श्रेष्ठ मृगचर्मधारी, पवित्र तथा हाथ में मृगका श्रृङ्ग धारण करनेवाले हों और इस रूप में आपका दर्शन करती हुई मैं आपकी सेवा में संलग्न रहूँ यही मेरी शुभ-कामना है। आपकी पूर्व दिशा में वज्रधारी इन्द्र, दक्षिण दिशा में यमराज, पश्चिम दिशा  में वरुण और उत्तर दिशा में कुबेर रक्षा करें। 

तदनन्तर सीता की अनुमति ले उत्सवकालिक मङ्गलकृत्य पूर्ण करके श्रीरामचन्द्रजी सुमन्त्र के साथ अपने महल से बाहर निकले। पर्वत की गुफा में शयन करने वाला सिंह जैसे पर्वत से निकलकर आता है, उसी प्रकार महल से निकलकर श्रीरामचन्द्रजी ने द्वार पर लक्ष्मण को उपस्थित देखा, जो विनीतभाव से हाथ जोड़े खड़े थे। 

तदनन्तर मध्यम कक्षा में आकर वे मित्रों से मिले। फिर प्रार्थी जनों को उपस्थित देख उन सबसे मिलकर उन्हें संतुष्ट करके पुरुषसिंह राजकुमार श्रीराम व्याघ्रचर्म से आवृत, शोभाशाली तथा अग्नि के समान तेजस्वी उत्तम रथ पर आरूढ़ हुए। उस रथ की घरघराहट मेघ की गम्भीर गर्जना के समान प्रतीत होती थी। उसमें स्थान की संकीर्णता नहीं थी । वह विस्तृत था और मणि एवं सुवर्ण से विभूषित था। उसकी कान्ति सुवर्णमय मेरुपर्वत के समान जान पड़ती थी। वह रथ अपनी प्रभा से लोगों की आँखों में चकाचौंध - सा पैदा कर देता था। 

उसमें उत्तम घोड़े जुते हुए थे, जो अधिक पुष्ट होने के कारण हाथी के बच्चों के समान प्रतीत होते थे। जैसे सहस्र नेत्रधारी इन्द्र हरे रंग के घोड़ों से युक्त शीघ्रगामी रथ पर सवार होते हैं, उसी प्रकार श्रीराम अपने उस रथ पर आरूढ़ थे। अपनी सहज शोभा से प्रकाशित श्रीरघुनाथजी उस रथ पर आरूढ़ हो तुरंत वहाँ से चल दिये। वह तेजस्वी रथ आकाश में गरजने वाले मेघ की भाँति अपनी घर्घर ध्वनि से सम्पूर्ण दिशाओं को प्रतिध्वनित करता हुआ महान् मेघखण्ड से निकलने वाले चन्द्रमा के समान श्रीराम के उस भवन से बाहर निकला। 

श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण भी हाथ में विचित्र चवँर लिये उस रथ पर बैठ गये और पीछे से अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीराम की रक्षा करने लगे। फिर तो सब ओर से मनुष्यों की भारी भीड़ निकलने लगी। उस समय उस जन-समूहके चलने से सहसा भयंकर कोलाहल मच गया। श्रीराम के पीछे-पीछे अच्छे-अच्छे घोड़े और पर्वतों के समान विशालकाय श्रेष्ठ गजराज सैकड़ों और हजारों की संख्या में चलने लगे। उनके आगे-आगे कवच आदि से सुसज्जित तथा चन्दन और अगर से विभूषित हो खड्ग और धनुष धारण किये बहुत-से शूरवीर तथा मङ्गलाशंसी मनुष्य – वन्दी आदि चल रहे थे। 

तदनन्तर मार्ग में वाद्यों की ध्वनि, बन्दीजनों के स्तुतिपाठ के शब्द तथा शूरवीरों के सिंहनाद सुनायी देने लगे। महलों की खिड़कियों में बैठी हुई वस्त्राभूषणों से विभूषित वनिताएँ सब ओर से शत्रुदमन श्रीराम पर ढेर-के-ढेर सुन्दर पुष्प बिखेर रही थीं। इस अवस्था में श्रीराम आगे बढ़ते चले जा रहे थे। 

उस समय अट्टालिकाओं और भूतल पर खड़ी हुई सर्वाङ्गसुन्दरी युवतियाँ श्रीराम का प्रिय करने की इच्छा से श्रेष्ठ वचनों द्वारा उनकी स्तुति गाने लगीं - माता को आनन्द प्रदान करनेवाले रघुवीर ! आपकी यह यात्रा सफल होगी और आपको पैतृक राज्य प्राप्त होगा। इस अवस्था में आपको देखती हुई आपकी माता कौशल्या निश्चय ही आनन्दित हो रही होंगी। 

वे नारियाँ श्रीराम की हृदयवल्लभा सीमन्तिनी सीता को संसार की समस्त सौभाग्यवती स्त्रियों से श्रेष्ठ मानती हुई कहने लगीं - उन देवी सीता ने पूर्वकाल में निश्चय ही बड़ा भारी तप किया होगा, तभी उन्होंने चन्द्रमा से संयुक्त हुई रोहिणी की भाँति श्रीराम का संयोग प्राप्त किया है। 

इस प्रकार राजमार्ग पर रथ पर बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजी प्रासाद शिखरों पर बैठी हुई युवती स्त्रियों के द्वारा कही गयी ये प्यारी बातें सुन रहे थे। उस समय अयोध्या में आये हुए दूर-दूर के लोग अत्यन्त हर्ष से भरकर वहाँ श्रीरामचन्द्रजी के विषय में जो वार्तालाप और तरह-तरह की बातें करते थे, अपने विषय में कही गयी उन सभी बातों को श्रीरघुनाथजी सुनते जा रहे थे। 

वे कहते थे - इस समय ये श्रीरामचन्द्रजी महाराज दशरथ की कृपा से बहुत बड़ी सम्पत्ति के अधिकारी होने जा रहे हैं। अब हम सब लोगों की समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाएँगी, क्योंकि ये श्रीराम हमारे शासक होंगे। यदि यह सारा राज्य चिरकाल के लिये इनके हाथ में आ जाये तो इस जगत की समस्त जनता के लिये यह महान् लाभ होगा। इनके राजा होने पर कभी किसी का अप्रिय नहीं होगा और किसी को कोई दुःख भी नहीं देखना पड़ेगा। 

हिनहिनाते हुए घोड़ों, चिग्घाड़ते हुए हाथियों, जय जयकार करते हुए आगे-आगे चलने वाले वन्दियों, स्तुतिपाठ करनेवाले सूतों, वंश की विरुदावलि बखानने वाले मागधों तथा सर्वश्रेष्ठ गुणगायकों के तुमुल घोष के बीच उन बन्दी आदि से पूजित एवं प्रशंसित होते हुए श्रीरामचन्द्रजी कुबेर के समान चल रहे थे। यात्रा करते हुए श्रीराम ने उस विशाल राजमार्ग को देखा, जो हथिनियों, मतवाले हाथियों, रथों और घोड़ों से खचाखच भरा हुआ था। उसके प्रत्येक चौराहे पर मनुष्यों की भारी भीड़ इकट्ठी हो रही थी। उसके दोनों पार्श्वभागों में प्रचुर रत्नों से भरी हुई दुकानें थीं तथा विक्रय के योग्य और भी बहुत-से द्रव्यों के ढेर वहाँ दिखायी देते थे। वह राजमार्ग बहुत साफ-सुथरा था। 

इस प्रकार श्रीमान् रामचन्द्रजी अपने सुहृदों को आनन्द प्रदान करते हुए रथ पर बैठे राजमार्ग के बीच से चले जा रहे थे; उन्होंने देखा सारा नगर ध्वजा और पताकाओं से सुशोभित हो रहा है, चारों ओर बहुमूल्य अगुरु नामक धूप की सुगन्ध छा रही है और सब ओर असंख्य मनुष्यों की भीड़ दिखायी देती है। वह राजमार्ग श्वेत बादलों के समान उज्ज्वल भव्य भवनों से सुशोभित तथा अगुरु की सुगन्ध से व्याप्त हो रहा था। अच्छी श्रेणी के चन्दनों, अगुरु नामक धूपों, उत्तम गन्धद्रव्यों, अलसी या सन आदि के रेशों से बने हुए कपड़ों तथा रेशमी वस्त्रों के ढेर, अनबिंधे मोती और उत्तमोत्तम स्फटिक रत्न उस विस्तृत एवं उत्तम राजमार्ग की शोभा बढ़ा रहे थे। वह नाना प्रकार के पुष्पों तथा भाँति-भाँति के भक्ष्य पदार्थों से भरा हुआ था। उसके चौराहों की दही, अक्षत, हविष्य, लावा, धूप, अगर, चन्दन, नाना प्रकार के पुष्पहार और गन्धद्रव्यों से सदा पूजा की जाती थी। स्वर्ग लोक में बैठे हुए देवराज इन्द्र की भाँति रथारूढ़ श्रीराम ने उस राजमार्ग को देखा। वे अपने सुहृदों के मुख से कहे गये बहुत-से आशीर्वादों को सुनते और यथायोग्य उन सब लोगों का सम्मान करते हुए चले जा रहे थे। 

उनके हितैषी सुहृद् कहते थे - रघुनन्दन ! तुम्हारे पितामह और परपितामह (दादे और परदादे) जिसपर चलते आये हैं, आज उसी मार्ग को ग्रहण करके युवराज - पद पर अभिषिक्त हो आप हम सब लोगों का निरन्तर पालन करें। 

फिर वे आपस में कहने लगे - भाइयो! श्रीराम के पिता तथा समस्त पितामहों द्वारा जिस प्रकार हम लोगों का पालन-पोषण हुआ है, श्रीराम के राजा होने पर हम उससे भी अधिक सुखी रहेंगे। यदि हम राज्य पर प्रतिष्ठित हुए श्रीराम को पिता के घर से निकलते हुए देख लें यदि राजा राम का दर्शन कर लें तो अब हमें इहलोक के भोग और परमार्थस्वरूप मोक्ष लेकर क्या करना है। अमित तेजस्वी श्रीराम का यदि राज्य पर अभिषेक हो जाये तो वह हमारे लिये जैसा प्रियतर कार्य होगा, उससे बढ़कर दूसरा कोई परम प्रिय कार्य नहीं होगा। 

सुहृदों के मुँह से निकली हुई ये तथा और भी कई तरह की अपनी प्रशंसा से सम्बन्ध रखने वाली सुन्दर बातें सुनते हुए श्रीरामचन्द्रजी राजपथ पर बढ़े चले जा रहे थे। जो श्रीराम की ओर एक बार देख लेता, वह उन्हें देखता ही रह जाता था। श्रीरघुनाथजी के दूर चले जाने पर भी कोई उन पुरुषोत्तम की ओर से अपना मन या दृष्टि नहीं हटा पाता था। उस समय जो श्रीराम को नहीं देखता और जिसे श्रीराम नहीं देख लेते थे, वह समस्त लोकों में निन्दित समझा जाता था तथा स्वयं उसकी अन्तरात्मा भी उसे धिक्कारती थी। 

धर्मात्मा श्रीराम चारों वर्णों के सभी मनुष्यों पर उनकी अवस्था के अनुरूप दया करते थे, इसलिये वे सभी उनके भक्त थे। राजकुमार श्रीराम चौराहों, देवमार्गों, चैत्यवृक्षों तथा देवमन्दिरों को अपने दाहिने छोड़ते हुए आगे बढ़ रहे थे।राजा दशरथ का भवन मेघसमूहों के समान शोभा पाने वाले, सुन्दर अनेक रूप-रंग वाले कैलाश शिखर के समान उज्जवल प्रासादशिखरों (अट्टालिकाओं) से सुशोभित था । उसमें रत्नों की जाली से विभूषित तथा विमानाकार क्रीडागृह भी बने हुए थे, जो अपनी श्वेत आभा से प्रकाशित होते थे। वे अपनी ऊँचाई से आकाश को भी लाँघते हुए-से प्रतीत होते थे; ऐसे गृहों से युक्त वह श्रेष्ठ भवन इस भूतल पर इन्द्रसदन के समान शोभा पाता था। उस राजभवन के पास पहुँचकर अपनी शोभा से प्रकाशित होने वाले राजकुमार श्रीराम ने पिता के महल में प्रवेश किया। 

उन्होंने धनुर्धर वीरों द्वारा सुरक्षित महल की तीन ड्योढ़ियों को तो घोड़े जुते हुए रथ से ही पार किया, फिर दो ड्योढ़ियों में वे पुरुषोत्तम राम पैदल ही गये। इस प्रकार सारी ड्योढ़ियों को पार करके दशरथनन्दन श्रीराम साथ आये हुए सब लोगों को लौटाकर स्वयं अन्तः पुर में गये। जब राजकुमार श्रीराम पिता के पास जाने के लिये अन्तः पुर में प्रविष्ट हुए, तब आनन्दमग्न हुए सब लोग बाहर खड़े होकर उनके पुनः निकलने की प्रतीक्षा करने लगे, ठीक उसी तरह जैसे सरिताओं का स्वामी समुद्र चन्द्रोदय की प्रतीक्षा करता रहता है। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-१४(14) समाप्त !

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