नोट : महामुनि अगस्त्य के जन्म की कथा का विस्तृत वर्णन जानने के लिए अध्याय - २(2) वंश चरित्र के भाग - ४४(44) को पढ़ें।
श्रीराम ने वहाँ मार्ग में नीवार (जलकदम्ब), कटहल, साखू, अशोक, तिनिश, चिरिबिल्व, महुआ, बेल, तेंदू तथा और भी सैकड़ों जंगली वृक्ष देखे, जो फूलों से भरे थे तथा खिली हुई लताओं से परिवेष्टित हो बड़ी शोभा पा रहे थे। उनमें से कई वृक्षों को हाथियों ने अपनी सूड़ों से तोड़कर मसल डाला था और बहुत-से वृक्षों पर बैठे हुए वानर उनकी शोभा बढ़ाते थे। सैकड़ों मतवाले पक्षी उनकी डालियों पर चहक रहे थे।
उस समय कमलनयन श्रीराम अपने पीछे-पीछे आते हुए शोभावर्धक वीर लक्ष्मण से, जो उनके निकट ही थे, इस प्रकार बोले – यहाँ के वृक्षों के पत्ते जैसे सुने गये थे, वैसे ही चिकने दिखायी देते हैं तथा पशु और पक्षी क्षमाशील एवं शान्त हैं। इससे जान पड़ता है, उन भावितात्मा (शुद्ध अन्तःकरण वाले) महर्षि अगस्त्य का आश्रम यहाँ से अधिक दूर नहीं है। जो अपने कर्म से ही संसार में अगस्त्य के नाम से विख्यात हुए हैं, उन्हीं का यह आश्रम दिखायी देता है, जो थके- माँदे पथिकों की थकावट को दूर करनेवाला है।
‘इस आश्रम के वन यज्ञ-यागसम्बन्धी अधिक धूमों से व्याप्त हैं। चीरवस्त्रों की पंक्तियाँ इसकी शोभा बढ़ाती हैं। यहाँ के मृगों के झुंड सदा शान्त रहते हैं तथा इस आश्रम में नाना प्रकार के पक्षियों के कलरव गूंजते रहते हैं। जिन पुण्यकर्मा महर्षि अगस्त्य ने समस्त लोकों की हितकामना से मृत्युस्वरूप राक्षसों का वेगपूर्वक दमन करके इस दक्षिण दिशा को शरण लेने के योग्य बना दिया तथा जिनके प्रभाव से राक्षस इस दक्षिण दिशा को केवल दूर से भयभीत होकर देखते हैं, इसका उपभोग भी नहीं करते, उन्हीं का यह आश्रम है।'
'पुण्यकर्मा महर्षि अगस्त्य ने जब से इस दिशा में पदार्पण किया है, तब से यहाँ के निशाचर वैर रहित और शान्त हो गये हैं। भगवान् अगस्त्य की महिमा से इस आश्रम के आस-पास निर्वैरता आदि गुणों के सम्पादन में समर्थ तथा क्रूरकर्मा राक्षसों के लिये दुर्जय होने के कारण यह सम्पूर्ण दिशा नाम से भी तीनों लोकों में 'दक्षिणा' ही कहलायी, इसी नाम से विख्यात हुई तथा इसे 'अगस्त्य की दिशा' भी कहते हैं।'
‘एक बार जब पर्वतश्रेष्ठ विंध्याचल ने बढकर अतरिक्ष को भर दिया था, उस समय योगमार्ग में स्थिर रहने वाले मुनियों ने (अगस्त्य) से प्रार्थना की कि आप हमारे जाने का कोई बाधा रहित मार्ग बताइए। तव अगस्त्य ने मेधो की पक्तियों में उठे हुए गगनोन्नत विंध्याचल पर अपना पद रखा और हाथी के जैसे उस पर बैठकर उसे ऐसा दबाया कि वह पाताल में धँस गया।'
'पूर्वकाल में एक बार उत्तर दिशा नीचे झुक गई और दक्षिण दिशा ऊपर उठ गई । तब सर्प को धारण करने वाले शिवजी ने अगस्त्य को आज्ञा दी कि हे निश्चल तथा निर्दोष तपस्यावाले ! तुम दक्षिण दिशा में जाओ। उस आदेश के अनुसार वे गगनोन्नत मलय पर्वत ('पोदियमले' नामक पर्वत) पर आ पहुँचे और शिवजी के समान ही दक्षिण दिशा में रहकर भूमि के सतुलन को बनाये रखा।'
‘ये महात्मा अगस्त्यजी सम्पूर्ण लोकों के द्वारा पूजित तथा सदा सज्जनों के हित में लगे रहने वाले हैं। अपने पास आये हुए हमलोगों को वे अपने आशीर्वाद से कल्याण के भागी बनायँगे। सेवा करने में समर्थ सौम्य लक्ष्मण ! यहाँ रहकर मैं उन महामुनि अगस्त्य की आराधना करूँगा और वनवास के शेष दिन यहीं रहकर बिताऊँगा। देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि यहाँ नियमित आहार करते हुए सदा अगस्त्य मुनि की उपासना करते हैं।'
'ये ऐसे प्रभावशाली मुनि हैं कि इनके आश्रम में कोई झूठ बोलने वाला, क्रूर, शठ, नृशंस अथवा पापाचारी मनुष्य जीवित नहीं रह सकता। यहाँ धर्म की आराधना करने के लिये देवता, यक्ष, नाग और पक्षी नियमित आहार करते हुए निवास करते हैं। इस आश्रम पर अपने शरीरों को त्याग कर अनेकानेक सिद्ध, महात्मा, महर्षि नूतन शरीरों के साथ सूर्यतुल्य तेजस्वी विमानों द्वारा स्वर्गलोक को प्राप्त हुए हैं। यहाँ सत्कर्मपरायण प्राणियों द्वारा आराधित हुए देवता उन्हें यक्षत्व, अमरत्व तथा नाना प्रकार के राज्य प्रदान करते हैं।
'वे अगस्त्य ऐसे हैं कि पूर्वकाल मे जब देवताओ ने, समुद्र मे असुरो के छिप जाने पर उनसे प्रार्थना की कि हे तपस्वी । हम पर कृपा करो, तब उन्होने सारे समुद्र को एक चुल्लू मे भरकर पी लिया था और जब उन (देवो ने ) प्रार्थना की कि समुद्र को उगलने की कृपा करें, तब उसे उगल दिया था। उस वामनाकार मुनि ने स्वच्छ समुद्र के जल को पीकर उसे उगल दिया था।
'अगस्त्य मुनि ने लोगों को जल संकट से बचाने के लिए ब्रह्मा जी से वरदान पाकर देवी कावेरी को अपने कमंडल में ले लिया। जब अगस्त्य दक्षिण में थे, तब भगवान गणेश ने कौवे (काक) का रूप धारण किया और ऋषि के कमंडल को ब्रह्मगिरि पर्वत (तलकावेरी) पर गिरा दिया। कमंडल से निकला जल पवित्र नदी कावेरी के रूप में प्रवाहित होने लगा।'
नोट : तलकावेरी (कर्नाटक) को कावेरी नदी का उद्गम स्थल माना जाता है, जहाँ हर साल अक्टूबर में विशेष पूजा होती है।
'कांतिमय परशु तथा सुन्दर ललाट मे अग्नि उगलने वाले नेत्रो से शोभित, अग्नि-सदृश तेज-स्वरूप भगवान् (शिव) के द्वारा उपदिष्ट तमिल (व्याकरण) को उन्होने लोक-परपरा, काव्य-रूढि एव अपनी बुद्धि के द्वारा यथाविधि सुसंस्कृत करके परिश्रम से अध्ययन किये जाने वाले चार वेदो से भी श्रेष्ठ बना दिया।'
'यह कथा प्रसिद्ध है कि अगस्त्य शिवजी द्वारा प्राप्त व्याकरण को लेकर दक्षिण में 'पोदियमले' पर आकर रहे थे। वहाँ पेरगतियम - (वृहद् अगस्तीयम् ) और शिरुभगतियम (लघु अगस्तीयम् ) नामक दो ग्रन्थ रचकर अपने बारह शिष्यो को सिखाया, जिनमे तोलगाम्पियर मुख्य थे। इन्ही तोलगाणिवर ने आगे चलकर तमिल भाषा का एक वृहद् व्याकरण लिखा, जो अब तमिल साहित्य में उपलब्ध प्राचीनतम ग्रन्थ हे।'
नोट : अगस्त्य का व्याकरण अब उपलब्ध नहीं है, किंतु उनके व्याकरण उद्धरथ अन्य ग्रन्थों में मिलते हैं।
‘सुमित्रानन्दन्! अब हमलोग आश्रम पर आ पहुँचे। तुम पहले प्रवेश करो और महर्षियों को सीता के साथ मेरे आगमन की सूचना दो।'

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