भाग-१३(13) सुतीक्ष्ण के आश्रम में कुछ काल तक रहकर उनकी आज्ञा से अगस्त्य के भाई तथा अगस्त्य के आश्रम पर जाना

 


शत्रुओं का दमन करने वाले श्रीराम सुतीक्ष्ण के आश्रम में आकर वहाँ रहने वाले मुनियों द्वारा भलीभाँति सम्मानित हो वहाँ भी कुछ कालतक रहे। उस आश्रम में रहते हुए श्रीराम ने एक दिन महामुनि सुतीक्ष्ण के पास बैठकर विनीतभाव से कहा –  भगवन्! मैंने प्रतिदिन बातचीत करने वाले लोगों के मुँहसे सुना है कि इस वन में कहीं मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजी निवास करते हैं; किंतु इस वन की विशालता के कारण मैं उस स्थान को नहीं जानता हूँ। उन बुद्धिमान् महर्षि का सुन्दर आश्रम कहाँ है? मैं लक्ष्मण और सीता के साथ भगवान् अगस्त्य को प्रसन्न करने के लिये उन मुनीश्वर को प्रणाम करने के उद्देश्य से उनके आश्रम पर जाऊँ – यह महान् मनोरथ मेरे हृदय में चक्कर लगा रहा है। मैं चाहता हूँ कि स्वयं भी मुनिवर अगस्त्य की सेवा करूँ।

धर्मात्मा श्रीराम का यह वचन सुनकर सुतीक्ष्ण मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन दशरथनन्दन से इस प्रकार बोले - ‘रघुनन्दन! ! मैं भी लक्ष्मण सहित आपसे यही कहना चाहता था कि आप सीता के साथ महर्षि अगस्त्य के पास चलें। सौभाग्य की बात है कि इस समय आप स्वयं ही मुझसे वहाँ जाने के विषय में पूछ रहे हैं। श्रीराम! महामुनि अगस्त्य जहाँ रहते हैं, उस आश्रम का पता मैं अभी आपको बताये देता हूँ। तात ! इस आश्रम से चार योजन दक्षिण चले जाइये। वहाँ आपको अगस्त्य के भाई का बहुत बड़ा एवं सुन्दर आश्रम मिलेगा। 

'वहाँ के वन की भूमि प्राय: समतल है तथा पिप्पली का वन उस आश्रम की शोभा बढ़ाता है। वहाँ फूलों और फलों की बहुतायत है। नाना प्रकार के पक्षियों के कलरवों से गूँजते हुए उस रमणीय आश्रम के पास भाँति-भाँति के कमलमण्डित सरोवर हैं, जो स्वच्छ जल से भरे हुए हैं। हंस और कारण्डव आदि पक्षी उन में सब ओर फैले हुए हैं तथा चक्रवाक उनकी शोभा बढ़ाते हैं।' 

'श्रीराम ! आप एक रात उस आश्रम में ठहरकर प्रात: काल उस वनखण्ड के किनारे दक्षिण दिशा की ओर जायें। इस प्रकार एक योजन आगे जाने पर अनेकानेक वृक्षों से सुशोभित वन के रमणीय भाग में अगस्त्य मुनि का आश्रम मिलेगा। वहाँ विदेहनन्दिनी सीता और लक्ष्मण आपके साथ सानन्द विचरण करेंगे: क्योंकि बहुसंख्यक वृक्षों से सुशोभित वह वनप्रान्त बड़ा ही रमणीय है। महामते! यदि आपने महामुनि अगस्त्य के दर्शन का निश्चित विचार कर लिया है तो आज ही वहाँ की यात्रा करने का भी निश्चय करें।' 

मुनिका यह वचन सुनकर भाई सहित श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें प्रणाम किया और सीता तथा लक्ष्मण के साथ अगस्त्यजी के आश्रम की ओर चल दिये। मार्ग में मिले हुए विचित्र-विचित्र वनों, मेघमाला के समान पर्वतमालाओं, सरोवरों और सरिताओं को देखते हुए वे आगे बढ़ते गये। 

इस प्रकार सुतीक्ष्ण के बताये हुए मार्ग से सुखपूर्वक चलते-चलते श्रीरामचन्द्रजी ने अत्यन्त हर्ष में भरकर लक्ष्मण से यह बात कही - सुमित्रानन्दन! निश्चय ही यह पुण्यकर्मों का अनुष्ठान करने वाले महात्मा अगस्त्यमुनि के भाई का आश्रम दिखायी दे रहा है। क्योंकि सुतीक्ष्णजी ने जैसा बतलाया था, उसके अनुसार इस वन के मार्ग में फूलों और फलों के भार से झुके हुए सहस्रों परिचित वृक्ष शोभा पा रहे हैं। इस वन में पकी हुई पीपलियों की यह गन्ध वायु से प्रेरित होकर सहसा इधर आयी है, जिससे कटु रस का उदय हो रहा है। 

‘जहाँ-तहाँ लकड़ियों के ढेर लगे दिखायी देते हैं और वैदूर्यमणि के समान रंगवाले कुश कटे हुए दृष्टिगोचर होते हैं। यह देखो, जंगल के बीच में आश्रम की अग्नि का धुआँ उठता दिखायी दे रहा है, जिसका अग्रभाग काले मेघों के ऊपरी भाग - सा प्रतीत होता है। यहाँ के एकान्त एवं पवित्र तीर्थों में स्नान करके आये हुए ब्राह्मण स्वयं चुनकर लाये हुए फूलों से देवताओं के लिये पुष्पोपहार अर्पित करते हैं।' 

'सौम्य ! मैंने सुतीक्ष्णजी का कथन जैसा सुना था, उसके अनुसार यह निश्चय ही अगस्त्यजी के भाई का आश्रम होगा। इन्हीं के भाई पुण्यकर्मा अगस्त्यजी ने समस्त लोकों के हित की कामना से मृत्युस्वरूप वातापि और इल्वल का वेगपूर्वक दमन करके इस दक्षिण दिशा को शरण लेने के योग्य बना दिया।' 

‘एक समय की बात है, यहाँ क्रूर स्वभाव वाला वातापि और इल्वल - ये दोनों भाई एक साथ रहते थे। ये दोनों महान् असुर ब्राह्मणों की हत्या करनेवाले थे। निर्दयी इल्वल ब्राह्मण का रूप धारण करके संस्कृत बोलता हुआ जाता और श्राद्ध के लिये ब्राह्मणों को निमन्त्रण दे आता था। फिर मेष (जीवशाक) का रूप धारण करने वाले अपने भाई वातापि का संस्कार करके श्राद्धकल्पोक्त विधि से ब्राह्मणों को खिला देता था। वे ब्राह्मण जब भोजन कर लेते, तब इल्वल उच्च स्वर से बोलता- 'वातापे! निकलो।' 

‘भाई की बात सुनकर वातापि भेड़े के समान 'में - में' करता हुआ उन ब्राह्मणों के पेट फाड़-फाड़ कर निकल आता था। इस प्रकार इच्छानुसार रूप धारण करने वाले उन मांसभक्षी असुरों ने प्रतिदिन मिलकर सहस्रों ब्राह्मणों का विनाश कर डाला। उस समय देवताओं की प्रार्थना से महर्षि अगस्त्य ने श्राद्ध में शाकरूपधारी उस महान् असुर को जान-बूझकर भक्षण किया। तदनन्तर श्राद्धकर्म सम्पन्न हो गया। ऐसा कहकर ब्राह्मणों के हाथ में अवनेजन का जल दे इल्वल ने भाई को सम्बोधित करके कहा, 'निकलो।' 

‘इस प्रकार भाई को पुकारते हुए उस ब्राह्मणघाती असुर से बुद्धिमान् मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य ने हँसकर कहा - 'जिस जीवशाकरूपधारी तेरे भाई राक्षस को मैंने खाकर पचा लिया, वह तो यमलोक में जा पहुँचा है। अब उसमें निकलने की शक्ति कहाँ है।' भाई की मृत्यु को सूचित करने वाले मुनि के इस वचन को सुनकर उस निशाचर ने क्रोधपूर्वक उन्हें मार डालने का उद्योग आरम्भ किया।' 

‘उसने ज्यों ही द्विजराज अगस्त्य पर धावा किया, त्यों ही उद्दीप्त तेज वाले उन मुनि ने अपनी अग्नितुल्य दृष्टि से उस राक्षस को दग्ध कर डाला। इस प्रकार उसकी मृत्यु हो गयी। ब्राह्मणों पर कृपा करके जिन्होंने यह दुष्कर कर्म किया था, उन्हीं महर्षि अगस्त्य के भाई का यह आश्रम है, जो सरोवर और वन से सुशोभित हो रहा है।' 

श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण के साथ इस प्रकार बातचीत कर रहे थे। इतने में ही सूर्यदेव अस्त हो गये और संध्या का समय हो गया। तब भाई के साथ विधिपूर्वक सायं संध्योपासना करके श्रीराम ने आश्रम में प्रवेश किया और उन महर्षि के चरणों में मस्तक झुकाया। मुनि ने उनका यथावत् आदर-सत्कार किया। सीता और लक्ष्मणसहित श्रीराम वहाँ फल- मूल खाकर एक रात उस आश्रम में रहे। 

वह रात बीतने पर जब सूर्योदय हुआ, तब श्रीरामचन्द्रजी ने अगस्त्य के भाई से विदा माँगते हुए कहा - ‘भगवन्! मैं आपके चरणों में प्रणाम करता हूँ। यहाँ रातभर बड़े सुख से रहा हूँ। अब आपके बड़े भाई मुनिवर अगस्त्य का दर्शन करने के लिये जाऊँगा। इसके लिये आपसे आज्ञा चाहता हूँ।' 

तब महर्षि ने कहा, ‘बहुत अच्छा, जाइये।' इस प्रकार महर्षि से आज्ञा पाकर भगवान् श्रीराम सुतीक्ष्ण के बताये हुए मार्ग से वन की शोभा देखते हुए आगे चले। 

इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का भाग-१३(13) समाप्त !

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