भाग-११(11) श्रीराम का ऋषियों की रक्षा के लिये राक्षसों के वध के निमित्त की हुई प्रतिज्ञा के पालन पर दृढ़ रहने का विचार प्रकट करना

 


अपने स्वामी के प्रति भक्ति रखने वाली विदेहकुमारी सीता की कही हुई यह बात सुनकर सदा धर्म में स्थित रहने वाले श्रीरामचन्द्रजी ने जानकी को इस प्रकार उत्तर दिया - देवी! धर्म को जानने वाली जनककिशोरी ! तुम्हारा मेरे ऊपर स्नेह है, इसलिये तुमने मेरे हित की बात कही है। क्षत्रियों के कुलधर्म का उपदेश करती हुई तुमने जो कुछ कहा है, वह तुम्हारे ही योग्य है। देवी! मैं तुम्हें क्या उत्तर दूँ, तुमने ही पहले यह बात कही है कि क्षत्रिय लोग इसलिये धनुष धारण करते हैं कि किसी को दुःखी होकर हाहाकार न करना पड़े (यदि कोई दुःख या संकट में पड़ा हो तो उसकी रक्षा की जाय)।  

‘सीते! दण्डकारण्य में रहकर कठोर व्रत का पालन करने वाले वे मुनि बहुत दु:खी हैं, इसीलिये मुझे शरणागतवत्सल जानकर वे स्वयं मेरे पास आये और शरणागत हुए। भीरु! सदा ही वन में रहकर फल- मूल का आहार करने वाले वे मुनि इन क्रूरकर्मा राक्षसों के कारण कभी सुख नहीं पाते हैं। मनुष्यों के मांस से जीवन निर्वाह करने वाले ये भयानक राक्षस उन्हें मारकर खा जाते हैं।' 

‘उन राक्षसों के ग्रास बने हुए वे दण्डकारण्यवासी द्विजश्रेष्ठ मुनि हमलोगों के पास आकर मुझसे बोले – 'प्रभो! हम पर अनुग्रह कीजिये।' उनके मुख से निकली हुई इस प्रकार रक्षा की पुकार सुनकर और उनकी आज्ञा-पालन रूपी सेवा का विचार मन में लेकर मैंने उनसे यह बात कही - ‘महर्षियो! आप-जैसे ब्राह्मणों की सेवा में मुझे स्वयं ही उपस्थित होना चाहिये था, परंतु आप स्वयं ही अपनी रक्षा के लिये मेरे पास आये, यह मेरे लिये अनुपम लज्जा की बात है; अतः आप प्रसन्न हों। बताइये, मैं आपलोगों की क्या सेवा करूँ?' यह बात मैंने उन ब्राह्मणों के सामने कही।' 

‘तब उन सभी ने मिलकर अपना मनोभाव इन वचनों में प्रकट किया - 'श्रीराम ! दण्डकारण्य में इच्छानुसार रूप धारण करने वाले बहुत-से राक्षस रहते हैं। उनसे हमें बड़ा कष्ट पहुँच रहा है, अत: वहाँ उनके भय से आप हमारी रक्षा करें। निष्पाप रघुनन्दन! अग्निहोत्र का समय आने पर तथा पर्व के अवसरों पर ये अत्यन्त दुर्धर्ष मांसभोजी राक्षस हमें धर दबाते हैं।' 

‘राक्षसों द्वारा आक्रान्त होने वाले हम तपस्वी तापस सदा अपने लिये कोई आश्रय ढूँढ़ते रहते हैं, अत: आप ही हमारे परम आश्रय हों। रघुनन्दन ! यद्यपि हम तपस्या के प्रभाव से इच्छानुसार इन राक्षसों का वध करने में समर्थ हैं तथापि चिरकाल से उपार्जित किये हुए तप को खण्डित करना नहीं चाहते हैं; क्योंकि तप में सदा ही बहुत-से विघ्न आते रहते हैं तथा इसका सम्पादन बहुत ही कठिन होता है। यही कारण है कि राक्षसों के ग्रास बन जाने पर भी हम उन्हें शाप नहीं देते हैं, इसलिये दण्डकारण्यवासी निशाचरों से पीड़ित हुए हम तापसों की भाईसहित आप रक्षा करें; क्योंकि इस वन में अब आप ही हमारे रक्षक हैं।' 

‘जनकनन्दिनि! दण्डकारण्य में ऋषियों की यह बात सुनकर मैंने पूर्णरूप से उनकी रक्षा करने की प्रतिज्ञा की है। मुनियों के सामने यह प्रतिज्ञा करके अब मैं जीते-जी इस प्रतिज्ञा को मिथ्या नहीं कर सकूँगा; क्योंकि सत्य का पालन मुझे सदा ही प्रिय है। सीते! मैं अपने प्राण छोड़ सकता हूँ, तुम्हारा और लक्ष्मण का भी परित्याग कर सकता हूँ, किंतु अपनी प्रतिज्ञा को, विशेषत: ब्राह्मणों के लिये की गयी प्रतिज्ञा को मैं कदापि नहीं तोड़ सकता। इसलिये ऋषियों की रक्षा करना मेरे लिये आवश्यक कर्तव्य है। 

'विदेहनन्दिनि ! ऋषियों के बिना कहे ही उनकी मुझे रक्षा करनी चाहिये थी; फिर जब उन्होंने स्वयं कहा और मैंने प्रतिज्ञा भी कर ली, तब अब उनकी रक्षा से कैसे मुँह मोड़ सकता हूँ। सीते! तुमने स्नेह और सौहार्दवश जो मुझसे ये बातें कही हैं, इससे मैं बहुत संतुष्ट हूँ; क्योंकि जो अपना प्रिय न हो, उसे कोई हितकर उपदेश नहीं देता। शोभने! तुम्हारा यह कथन तुम्हारे योग्य तो है ही, तुम्हारे कुल के भी सर्वथा अनुरूप है। तुम मेरी सहधर्मिणी हो और मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय हो।' 

महात्मा श्रीरामचन्द्रजी अपनी प्रिया मिथिलेशकुमारी सीता से ऐसा वचन कहकर हाथ में धनुष ले लक्ष्मण के साथ रमणीय तपोवनों में विचरण करने लगे। फिर श्री रघुनाथजी आगे वन में चले। श्रेष्ठ मुनियों के बहुत से समूह उनके साथ हो लिए। हड्डियों का ढेर देखकर श्री रघुनाथजी को बड़ी दया आई, उन्होंने मुनियों से पूछा। 

मुनियों ने कहा - हे स्वामी! आप सर्वदर्शी (सर्वज्ञ) और अंतर्यामी (सबके हृदय की जानने वाले) हैं। जानते हुए भी (अनजान की तरह) हमसे कैसे पूछ रहे हैं? राक्षसों के दलों ने सब मुनियों को खा डाला है। (ये सब उन्हीं की हड्डियों के ढेर हैं)। यह सुनते ही श्री रघुवीर के नेत्रों में जल छा गया (उनकी आँखों में करुणा के आँसू भर आए)। 

श्री रामजी ने भुजा उठाकर प्रण किया कि मैं पृथ्वी को राक्षसों से रहित कर दूँगा। फिर समस्त मुनियों के आश्रमों में जा-जाकर उनको (दर्शन एवं सम्भाषण का) सुख दिया। 

इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का भाग-११(11) समाप्त !


No comments:

Post a Comment

रामायण: एक परिचय

रामायण संस्कृत के रामायणम् का हिंदी रूपांतरण है जिसका शाब्दिक अर्थ है राम की जीवन यात्रा। रामायण और महाभारत दोनों सनातन संस्कृति के सबसे प्र...