भाग-११(11) राजा का विलाप और कैकेयी से अनुनय-विनय

 


महाराज दशरथ उस अयोग्य और अनुचित अवस्था में पृथ्वी पर पड़े थे। उस समय वे पुण्य समाप्त होने पर देवलोक से भ्रष्ट हुए राजा ययाति के समान जान पड़ते थे। उनकी वैसी दशा देख अनर्थ की साक्षात् मूर्ति कैकेयी, जिसका प्रयोजन अभी तक सिद्ध नहीं हुआ था, जो लोकापवाद का भय छोड़ चुकी थी और श्रीराम से भरत के लिये भय देखती पुनः उसी वर के लिये राजा को सम्बोधित करके कहने लगी - महाराज! आप तो डींग मारा करते थे कि मैं बड़ा सत्यवादी और दृढ़प्रतिज्ञ हूँ, फिर आप मेरे इस वरदान को क्यों हजम कर जाना चाहते हैं? 

कैकेयी के ऐसा कहने पर राजा दशरथ दो घड़ी तक व्याकुलकी-सी अवस्था में रहे। तत्पश्चात् कुपित होकर उसे इस प्रकार उत्तर देने लगे - ओ नीच! तू मेरी 'शत्रु 'है। नरश्रेष्ठ श्रीराम के वन में चले जाने पर जब मेरी मृत्यु हो जायेगी, उस समय तू सफल मनोरथ होकर सुख से रहना। हाय! स्वर्ग में भी जब देवता मुझसे श्रीराम का कुशल समाचार पूछेंगे, उस समय मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा? यदि कहूँ, उन्हें वन में भेज दिया तो उसके बाद वे लोग जो मेरे प्रति धिक्कारपूर्ण बात कहेंगे, उसे कैसे सह सकूँगा? इसके लिये मुझे बड़ा खेद है। 

'कैकेयी का प्रिय करने की इच्छा से उसके माँगे हुए वरदान के अनुसार मैंने श्रीराम को वन में भेज दिया, यदि ऐसा कहूँ और इसे सत्य बताऊँ तो मेरी वह पहली बात असत्य हो जायेगी, जिसके द्वारा मैंने राम को राज्य देने का आश्वासन दिया है। मैं पहले पुत्रहीन था, फिर महान् परिश्रम करके मैंने जिन महातेजस्वी महापुरुष श्रीराम को पुत्र रूप में प्राप्त किया है, उनका मेरे द्वारा त्याग कैसे किया जा सकता है? जो शूरवीर, विद्वान्, क्रोध को जीतने वाले और क्षमापरायण हैं, उन कमलनयन श्रीराम को मैं देश निकाला कैसे दे सकता हूँ?'

'जिनकी अङ्गकान्ति नीलकमल के समान श्याम है, भुजाएँ विशाल और बल महान् हैं, उन नयनाभिराम श्रीराम को मैं दण्डकवन में कैसे भेज सकूँगा ? 

'जो सदा सुख भोगने के ही योग्य हैं, कदापि दुःख भोगने के योग्य नहीं हैं, उन बुद्धिमान् श्रीराम को दुःख उठाते मैं कैसे देख सकता हूँ ?जो दु:ख भोगने के योग्य नहीं हैं, उन श्रीराम को यह वनवास का दु:ख दिये बिना ही यदि मैं इस संसार से विदा हो जाता तो मुझे बड़ा सुख मिलता। ओ पापपूर्ण विचार रखने वाली पाषाण हृदया कैकेयी ! सत्यपराक्रमी श्रीराम मुझे बहुत प्रिय हैं, तू मुझसे उनका विछोह क्यों करा रही है? अरी! ऐसा करने से निश्चय ही संसार में तेरी वह अपकीर्ति फैलेगी, जिसकी कहीं तुलना नहीं है। 

इस प्रकार विलाप करते-करते राजा दशरथ का चित्त अत्यन्त व्याकुल हो उठा। इतने में ही सूर्यदेव अस्ताचल को चले गये और प्रदोष काल आ पहुँचा। वह तीन पहरों वाली रात यद्यपि चन्द्रमण्डल की चारुचन्द्रिका से आलोकित हो रही थी, तो भी उस समय आर्त होकर विलाप करते हुए राजा दशरथ के लिये प्रकाश या उल्लास न दे सकी। 

बूढ़े राजा दशरथ निरन्तर गरम उच्छवास लेते हुए आकाश की ओर दृष्टि लगाये आर्त की भाँति दुःखपूर्ण विलाप करने लगे - नक्षत्रमालाओं से अलंकृत कल्याणमयी रात्रिदेवी ! मैं नहीं चाहता कि तुम्हारे द्वारा प्रभात - काल लाया जाये। मुझ पर दया करो। मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़ता हूँ। अथवा शीघ्र बीत जाओ; क्योंकि जिसके कारण मुझे भारी संकट प्राप्त हुआ है, उस निर्दय और क्रूर कैकेयी को अब मैं नहीं देखना चाहता। 

कैकेयी से ऐसा कहकर राजधर्म के ज्ञाता राजा दशरथ ने पुन: हाथ जोड़कर उसे मनाने या प्रसन्न करने की चेष्टा आरम्भ की - कल्याणमयी देवी! जो सदाचारी, दीन, तेरे आश्रित, गतायु (मरणासन्न) और विशेषत: राजा है - ऐसे मुझ दशरथ पर कृपा कर। सुन्दर कटिप्रदेश वाली केकयनन्दिनि ! मैंने जो यह श्रीराम को राज्य देने की बात कही है, वह किसी सूने घर में नहीं, भरी सभा में घोषित की है, अतः बाले ! तू बड़ी सहृदय है; इसलिये मुझ पर भलीभाँति कृपा कर जिससे सभासदों द्वारा मेरा उपहास न हो। 

‘देवी! प्रसन्न हो जा। कजरारे नेत्रप्रान्त वाली प्रिये! मेरे श्रीराम तेरे ही दिये हुए इस अक्षय राज्य को प्राप्त करें, इससे तुझे उत्तम यश की प्राप्ति होगी। पृथुल नितम्बवाली देवी! सुमुखि ! सुलोचने! यह प्रस्ताव मुझको, श्रीराम को, समस्त प्रजावर्ग को, गुरुजनों को तथा भरत को भी प्रिय होगा, अत: इसे पूर्ण कर।' 

राजा के हृदय का भाव अत्यन्त शुद्ध था, उनके आँसू भरे नेत्र लाल हो गये थे और वे दीनभाव से विचित्र करुणा जनक विलाप कर रहे थे, किंतु मन में दूषित विचार रखने वाली निष्ठुर कैकेयी ने पति के उस विलाप को सुनकर भी उनकी आज्ञा का पालन नहीं किया। इतनी अनुनय-विनय के बाद भी जब प्रिया कैकेयी किसी तरह संतुष्ट न हो सकी और बराबर प्रतिकूल बात ही मुँह से निकालती गयी, तब पुत्र के वनवास की बात सोचकर राजा पुनः दुःख के मारे मूर्च्छित हो गये और सुध-बुध खोकर पृथ्वी पर गिर पड़े। 

इस प्रकार व्यथित होकर भयंकर उच्छवास लेते हुए मनस्वी राजा दशरथ की वह रात धीरे-धीरे बीत गयी । प्रातः काल राजा को जगाने के लिये मनोहर वाद्यों के साथ मङ्गल गान होने लगा, परंतु उन राज शिरोमणि ने तत्काल नाही भेजकर वह सब बंद करा दिया। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-११(11) समाप्त !

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