भाग-१०(10) सीता का श्रीराम से निरपराध प्राणियों को न मारने और अहिंसा-धर्म का पालन करने के लिये अनुरोध

 


सुतीक्ष्ण की आज्ञा लेकर वन की ओर प्रस्थित हुए अपने स्वामी रघुकुलनन्दन श्रीराम से सीता ने स्नेहभरी मनोहर वाणी में इस प्रकार कहा - आर्यपुत्र! यद्यपि आप महान् पुरुष हैं तथापि अत्यन्त सूक्ष्म विधि से विचार करने पर आप अधर्म को प्राप्त हो रहे हैं। जब कामजनित व्यसन से आप सर्वथा निवृत्त हैं, तब यहाँ इस अधर्म से भी बच सकते हैं। इस जगत में काम से उत्पन्न होने वाले तीन ही व्यसन होते हैं। मिथ्याभाषण बहुत बड़ा व्यसन है, किंतु उससे भी भारी दो व्यसन और हैं - परस्त्रीगमन और बिना वैर के ही दूसरों के प्रति क्रूरतापूर्ण बर्ताव। 

'रघुनन्दन ! इनमें से मिथ्याभाषणरूप व्यसन तो न आप में कभी हुआ है और न आगे होगा ही। परस्त्रीविषयक अभिलाषा तो आपको हो ही कैसे सकती है? नरेन्द्र ! धर्म का नाश करने वाली यह कुत्सित इच्छा न आपके मन में कभी हुई थी, न है और न भविष्य में कभी होने की सम्भावना ही है। आर्यपुत्र ! यह दोष तो आपके मन में भी कभी उदित नहीं हुआ है। ( फिर वाणी और क्रिया में कैसे आ सकता है?) आप सदा ही अपनी धर्मपत्नी में अनुरक्त रहनेवाले, धर्मनिष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ तथा पिता की आज्ञा का पालन करनेवाले हैं। आप में धर्म और सत्य दोनों की स्थिति है। आप में ही सब कुछ प्रतिष्ठित है।' 

'महाबाहो ! जो लोग जितेन्द्रिय हैं, वे सदा सत्य और धर्म को पूर्णरूप से धारण कर सकते हैं। शुभदर्शी महापुरुष ! आपकी जितेन्द्रियता को मैं अच्छी तरह जानती हूँ (इसीलिये मुझे विश्वास है कि आप में पूर्वोक्त दोनों दोष कदापि नहीं रह सकते)। परंतु दूसरों के प्राणों की हिंसारूप जो यह तीसरा भयंकर दोष है, उसे लोग मोहवश बिना वैरविरोध के भी किया करते हैं। वही दोष आपके सामने भी उपस्थित है।' 

'वीर! आपने दण्डकारण्यनिवासी ऋषियों की रक्षा के लिये युद्ध में राक्षसों का वध करने की प्रतिज्ञा की है। इसी के लिये आप भाई के साथ धनुष बाण लेकर दण्डकारण्य के नाम से विख्यात वन की ओर प्रस्थित हुए हैं। अत: आपको इस घोर कर्म के लिये प्रस्थित हुआ देख मेरा चित्त चिन्ता से व्याकुल हो उठा है। आपके प्रतिज्ञा- पालनरूप व्रत का विचार करके मैं सदा यही सोचती रहती हूँ कि कैसे आपका कल्याण हो?'

'वीर! मुझे इस समय आपका दण्डकारण्य में जाना अच्छा नहीं लगता है। इसका क्या कारण है - यह बता रही हूँ; आप मेरे मुँह से सुनिये। आप हाथ में धनुष-बाण लेकर अपने भाई के साथ वन में आये हैं। सम्भव है, समस्त वनचारी राक्षसों को देखकर कदाचित् आप उनके प्रति अपने बाणों का प्रयोग कर बैठें। जैसे आग के समीप रखे हुए ईंधन उसके तेजरूप बल को अत्यन्त उद्दीप्त कर देते हैं, उसी प्रकार जहाँ क्षत्रियों के पास धनुष हो तो वह उनके बल और प्रताप को उधित कर देता है।' 

‘महाबाहो! पूर्वकाल की बात है, किसी पवित्र वन में, जहाँ मृग और पक्षी बड़े आनन्द से रहते थे, एवं पवित्र तपस्वी निवास करते थे। एक सत्यवादी उन्हीं की तपस्या में विघ्न डालने के लिये शचीपति इन्द्र किसी योद्धा का रूप धारण करके हाथ में तलवार लिये एक दिन उनके आश्रम पर आये। उन्होंने मुनि के आश्रम में अपना उत्तम खड्ग रख दिया। पवित्र तपस्या में लगे हुए मुनि को धरोहर के रूप में वह खड्ग दे दिया।' 

‘उस शस्त्र को पाकर मुनि उस धरोहर की रक्षा में लग गये। वे अपने विश्वास की रक्षा के लिये वन में विचरते समय भी उसे साथ रखते थे। धरोहर की रक्षा में तत्पर रहने वाले वे मुनि फल- मूल लाने के लिये जहाँ-कहीं भी जाते, उस खड्ग को साथ लिये बिना नहीं जाते थे। तप ही जिनका धन था, उन मुनि ने प्रतिदिन शस्त्र ढोते रहने के कारण क्रमशः तपस्या का निश्चय छोड़कर अपनी बुद्ध को क्रूरतापूर्ण बना लिया। फिर तो अधर्म ने उन्हें आकृष्ट कर लिया। वे मुनि प्रमादवश रौद्र - कर्म में तत्पर हो गये और उस शस्त्र के सहवास उन्हें नरक में जाना पड़ा। 

‘इस प्रकार शस्त्र का संयोग होने के कारण पूर्वकाल में उन तपस्वी मुनि को ऐसी दुर्दशा भोगनी पड़ी। जैसे आग का संयोग ईंधनों को जलाने का कारण होता है, उसी प्रकार शस्त्रों का संयोग शस्त्रधारी के हृदय में विकार का उत्पादक कहा गया है। मेरे मन में आपके प्रति जो स्नेह और विशेष आदर है, उसके कारण मैं आपको उस प्राचीन घटना की याद दिलाती हूँ तथा यह शिक्षा भी देती हूँ कि आपको धनुष लेकर किसी तरह बिना वैर के ही दण्डकारण्यवासी राक्षसों के वध का विचार नहीं करना चाहिये।' 

'वीरवर! बिना अपराध के ही किसी को मारना संसार के लोग अच्छा नहीं समझेंगे। अपने मन और इन्द्रियों को वश में रखने वाले क्षत्रिय वीरों के लिये वन में धनुष धारण करने का इतना ही प्रयोजन है कि वे संकट में पड़े हुए प्राणियों की रक्षा करें। कहाँ शस्त्र धारण और कहाँ वनवास ! कहाँ क्षत्रिय का हिंसामय कठोर कर्म और कहाँ सब प्राणियों पर दया करना रूप तप - ये परस्पर विरुद्ध जान पड़ते हैं। अतः हम लोगों को देशधर्म का ही आदर करना चाहिये (इस समय हम तपोवनरूप देश में निवास करते हैं, अतः यहाँ के अहिंसामय धर्म का पालन करना ही हमारा कर्तव्य है )।' 

'केवल शस्त्र का सेवन करने से मनुष्य की बुद्धि कृपण पुरुषों के समान कलुषित हो जाती है; अतः आप अयोध्या में चलने पर ही पुनः क्षात्रधर्म का अनुष्ठान कीजियेगा। राज्य त्यागकर वन में आ जाने पर यदि आप मुनिवृत्ति से ही रहें तो इससे मेरी सास और श्वशुर को अक्षय प्रसन्नता होगी। धर्म से अर्थ प्राप्त होता है, धर्म से सुखका उदय होता है और धर्म से ही मनुष्य सब कुछ पा लेता है। इस संसार में धर्म ही सार है।' 

'चतुर मनुष्य भिन्न-भिन्न वानप्रस्थोचित नियमों के द्वारा अपने शरीर को क्षीण करके यत्नपूर्वक धर्म का सम्पादन करते हैं; क्योंकि सुखदायक साधन से सुख के हेतुभूत धर्म की प्राप्ति नहीं होती है।' 

'सौम्य ! प्रतिदिन शुद्धचित्त होकर तपोवन में धर्म का अनुष्ठान कीजिये। त्रिलोकी में जो कुछ भी है, आपको तो वह सब कुछ यथार्थरूप से विदित ही है। मैंने नारीजाति की स्वाभाविक चपलता के कारण ही आपकी सेवा में ये बातें निवेदन कर दी हैं। वास्तव में आपको धर्म का उपदेश करने में कौन समर्थ है? आप इस विषय में अपने छोटे भाई के साथ बुद्धिपूर्वक विचार कर लें। फिर आपको जो ठीक जँचे, उसे ही शीघ्रतापूर्वक करें। 

इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का भाग-१०(10) समाप्त !

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