भाग-१०(10) महाराज दशरथ की चिन्ता, विलाप, कैकेयी को फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगने के लिये अनुरोध करना

 


कैकेयी का यह कठोर वचन सुनकर महाराज दशरथ को बड़ी चिन्ता हुई। वे एक मुहूर्त तक अत्यन्त संताप करते रहे। राजा सहम गए, उनसे कुछ कहते न बना मानो बाज वन में बटेर पर झपटा हो। राजा का रंग बिलकुल उड़ गया, मानो ताड़ के पेड़ को बिजली ने मारा हो (जैसे ताड़ के पेड़ पर बिजली गिरने से वह झुलसकर बदरंगा हो जाता है, वही हाल राजा का हुआ) उन्होंने सोचा - क्या दिन में ही यह मुझे स्वप्न दिखायी दे रहा है? अथवा मेरे चित्त का मोह है? या किसी भूत (ग्रह आदि) के आवेश से चित्त में विकलता आ गयी है? या आधि-व्याधि के कारण यह कोई मन का ही उपद्रव है। 

माथे पर हाथ रखकर, दोनों नेत्र बंद करके राजा ऐसे सोच करने लगे, मानो साक्षात्‌ सोच ही शरीर धारण कर सोच कर रहा हो। (वे सोचते हैं- हाय!) मेरा मनोरथ रूपी कल्पवृक्ष फूल चुका था, परन्तु फलते समय कैकेयी ने हथिनी की तरह उसे जड़ समेत उखाड़कर नष्ट कर डाला 

यही सोचते हुए उन्हें अपने भ्रम के कारण का पता नहीं लगा। उस समय राजा को मूर्च्छित कर देनेवाला महान् दु:ख प्राप्त हुआ। तत्पश्चात् होश में आने पर कैकेयी की बात को याद करके उन्हें पुनः संताप होने लगा। जैसे किसी बाघिन को देखकर मृग व्यथित हो जाता है, उसी प्रकार वे नरेश कैकेयी को देखकर पीड़ित एवं व्याकुल हो उठे। बिस्तर रहित खाली भूमि पर बैठे हुए राजा लंबी साँस खींचने लगे, मानो कोई महा विषैला सर्प किसी मण्डल में मन्त्रों द्वारा अवरुद्ध हो गया हो। राजा दशरथ रोष में भरकर 'अहो ! धिक्कार है' यह कहकर पुन: मूर्च्छित हो गये। शोक के कारण उनकी चेतना लुप्त सी हो गयी। 

बहुत देर के बाद जब उन्हें फिर चेत हुआ, तब वे नरेश अत्यन्त दुःखी होकर कैकेयी को अपने तेज से दग्ध-सी करते हुए क्रोधपूर्वक उससे बोले - दयाहीन दुराचारिणी कैकेयी! तू इस कुल का विनाश करनेवाली डाइन है। पापिनि! बता, मैंने अथवा श्रीराम ने तेरा क्या बिगाड़ा है ? श्रीरामचन्द्र तो तेरे साथ सदा सगी माता का-सा बर्ताव करते आये हैं; फिर तू किसलिये उनका इस तरह अनिष्ट करने पर उतारू हो गयी है। मालूम होता है मैंने अपने विनाश के लिये ही तुझे अपने घर में लाकर रखा था। मैं नहीं जानता था कि तू राजकन्या के रूप में तीखे विषवाली नागिन है। 

‘जब सारा जीव-जगत् श्रीराम के गुणों की प्रशंसा करता है, तब मैं किस अपराध के कारण अपने उस प्यारे पुत्र को त्याग दूँ? मैं कौशल्या और सुमित्रा को भी छोड़ सकता हूँ, राजलक्ष्मी का भी परित्याग कर सकता हूँ, परंतु अपने प्राणस्वरूप पितृभक्त श्रीराम को नहीं छोड़ सकता। अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम को देखते ही मेरे हृदय में परम प्रेम उमड़ आता है; परंतु जब मैं श्रीराम को नहीं देखता हूँ, तब मेरी चेतना नष्ट होने लगती है। सम्भव है सूर्य के बिना यह संसार टिक सके अथवा पानी के बिना खेती उपज सके, परंतु श्रीराम के बिना मेरे शरीर में प्राण नहीं रह सकते।' 

‘अत: ऐसा वर माँगने से कोई लाभ नहीं। पापपूर्ण निश्चयवाली कैकेयी! तू इस निश्चय अथवा दुराग्रह को त्याग दे। यह लो, मैं तेरे पैरों पर अपना मस्तक रखता हूँ, मुझ पर प्रसन्न हो जा। पापिनि! तूने ऐसी परम क्रूरतापूर्ण बात किस लिये सोची है? यदि यह जानना चाहती है कि भरत मुझे प्रिय हैं या अप्रिय तो रघुनन्दन भरत के सम्बन्ध में तू पहले जो कुछ कह चुकी है, वह पूर्ण हो अर्थात् तेरे प्रथम वर के अनुसार मैं भरत का राज्याभिषेक स्वीकार करता हूँ।' 

‘तू पहले कहा करती थी कि 'श्रीराम मेरे बड़े बेटे हैं, वे धर्माचरण में भी सबसे बड़े हैं!' परंतु अब मालूम हुआ कि तू ऊपर-ऊपर से चिकनी-चुपड़ी बातें किया करती थी और वह बात तूने श्रीराम से अपनी सेवा कराने के लिये ही कही होगी। आज श्रीराम के अभिषेक की बात सुनकर तू शोक से संतप्त हो उठी है और मुझे भी बहुत संताप दे रही है; इससे जान पड़ता है कि इस सूने घर में तुझ पर भूत आदि का आवेश हो गया है, अत: तू परवश होकर ऐसी बातें कह रही है।' 

‘देवी! न्यायशील इक्ष्वाकुवंश में यह बड़ा भारी अन्याय आकर उपस्थित हुआ है, जहाँ तेरी बुद्धि इस प्रकार विकृत हो गयी है। विशाललोचने! आज से पहले तूने कभी कोई ऐसा आचरण नहीं किया है, जो अनुचित अथवा मेरे लिये अप्रिय हो; इसीलिये तेरी आज की बात पर भी मुझे विश्वास नहीं होता है। तेरे लिये तो श्रीराम भी महात्मा भरत के ही तुल्य हैं। बाले ! तू बहुत बार बातचीत के प्रसंग में स्वयं ही यह बात मुझसे कहती रही है। भीरु स्वभाववाली देवी! उन्हीं धर्मात्मा और यशस्वी श्रीराम का चौदह वर्षों के लिये वनवास तुझे कैसे अच्छा लगता है?' 

‘जो अत्यन्त सुकुमार और धर्म में दृढ़तापूर्वक मन लगाये रखने वाले हैं, उन्हीं श्रीराम को वनवास देना तुझे कैसे रुचिकर जान पड़ता है? अहो! तेरा हृदय बड़ा कठोर है। सुन्दर नेत्रोंवाली कैकेयी! जो सदा तेरी सेवा-शुश्रूषा में लगे रहते हैं, उन नयनाभिराम श्रीराम को देशनिकाला दे देने की इच्छा तुझे किसलिये हो रही है ? मैं देखता हूँ, भरत से अधिक श्रीराम ही सदा तेरी सेवा करते हैं। भरत उनसे अधिक तेरी सेवा में रहते हों, ऐसा मैंने कभी नहीं देखा है। नरश्रेष्ठ श्रीराम से बढ़कर दूसरा कौन है, जो गुरुजनों की सेवा करने, उन्हें गौरव देने, उनकी बातों को मान्यता देने और उनकी आज्ञा का तुरंत पालन करने में अधिक तत्परता दिखाता हो। मेरे यहाँ कई सहस्र स्त्रियाँ हैं और बहुत से उपजीवी भृत्यजन हैं, परंतु किसी के मुँह से श्रीराम के सम्बन्ध में सच्ची या झूठी किसी प्रकार की शिकायत नहीं सुनी जाती। 

‘पुरुषसिंह श्रीराम समस्त प्राणियों को शुद्ध हृदय से सान्त्वना देते हुए प्रिय आचरणों द्वारा राज्य की समस्त प्रजाओं को अपने वश में किये रहते हैं। वीर श्रीरामचन्द्र अपने सात्त्विक भाव से समस्त लोकों को, दान के द्वारा द्विजों को, सेवा से गुरुजनों को और धनुष- बाण द्वारा युद्धस्थल में शत्रु सैनिकों को जीतकर अपने अधीन कर लेते हैं। सत्य, दान, तप, त्याग, मित्रता, पवित्रता, सरलता, विद्या और गुरु-शुश्रूषा – ये सभी सद्गुण श्रीराम में स्थिर रूप से रहते हैं। देवी! महर्षियों के समान तेजस्वी उन सीधे-सादे देवतुल्य श्रीराम का तू क्यों अनिष्ट करना चाहती है?' 

‘श्रीराम सब लोगों से प्रिय बोलते हैं। उन्होंने कभी किसी को अप्रिय वचन कहा हो, ऐसा मुझे याद नहीं पड़ता। ऐसे सर्वप्रिय राम से मैं तेरे लिये अप्रिय बात कैसे कहूँगा? जिनमें क्षमा, तप, त्याग, सत्य, धर्म, कृतज्ञता और समस्त जीवों के प्रति दया भरी हुई है, उन श्रीराम के बिना मेरी क्या गति होगी? कैकेयी! मैं बूढ़ा हूँ। मौत के किनारे बैठा हूँ। मेरी अवस्था शोचनीय हो रही है और मैं दीनभाव से तेरे सामने गिड़गिड़ा रहा हूँ। तुझे मुझ पर दया करनी चाहिये। समुद्रपर्यन्त पृथ्वी पर जो कुछ मिल सकता है, वह सब मैं तुझे दे दूँगा, परंतु तू ऐसे दुराग्रह में न पड़, जो मुझे मौत के मुँह में ढकेलने वाला हो। केकयनन्दिनि! मैं हाथ जोड़ता हूँ और तेरे पैरों पड़ता हूँ। तू श्रीराम को शरण दे, जिससे यहाँ मुझे पाप न लगे।' 

महाराज दशरथ इस प्रकार दुःख से संतप्त होकर विलाप कर रहे थे। उनकी चेतना बार-बार लुप्त हो जाती थी। उनके मस्तिष्क में चक्कर आ रहा था और वे शोकमग्न हो उस शोकसागर से शीघ्र पार होने के लिये बारंबार अनुनय- विनय कर रहे थे, तो भी कैकेयी का हृदय नहीं पिघला। 

वह और भी भीषण रूप धारण करके अत्यन्त कठोर वाणी में उन्हें इस प्रकार उत्तर देने लगी - राजन् ! क्या भरत आपके पुत्र नहीं हैं? क्या मुझे आप दाम देकर खरीद लाए हैं? (क्या मैं आपकी विवाहिता पत्नी नहीं हूँ?) जो मेरा वचन सुनते ही आपको बाण सा लगा तो आप सोच-समझकर बात क्यों नहीं कहते? उत्तर दीजिए- हाँ कीजिए, नहीं तो नाहीं कर दीजिए। आप रघुवंश में सत्य प्रतिज्ञा वाले (प्रसिद्ध) हैं! आपने ही वर देने को कहा था, अब भले ही न दीजिए। सत्य को छोड़ दीजिए और जगत में अपयश लीजिए। सत्य की बड़ी सराहना करके वर देने को कहा था। समझा था कि यह चबेना ही माँग लेगी! 

'यदि दो वरदान देकर आप फिर उनके लिये पश्चात्ताप करते हैं तो वीर नरेश्वर ! इस भूमण्डल में आप अपनी धार्मिकता का ढिंढोरा कैसे पीट सकेंगे ? धर्म के ज्ञाता महाराज! जब बहुत-से राजर्षि एकत्र होकर आपके साथ मुझे दिये हुए वरदान के विषय में बातचीत करेंगे, उस समय वहाँ आप उन्हें क्या उत्तर देंगे ? यही कहेंगे न, कि जिसके प्रसाद से मैं जीवित हूँ, जिसने बहुत बड़े संकट से मेरी रक्षा की, उसी कैकेयी को वर देने के लिये की हुई प्रतिज्ञा मैंने झूठी कर दी।' 

‘महाराज! आज ही वरदान देकर यदि आप फिर उससे विपरीत बात कहेंगे तो अपने कुल के राजाओं के माथे पर कलंक का टीका लगायेंगे। राजा शिबि ने बाज और कबूतर के झगड़े में (कबूतर के प्राण बचाने की प्रतिज्ञा को पूर्ण करने के लिये) बाज नामक पक्षी को अपने शरीर का मांस काटकर दे दिया था। इसी तरह राजा अलर्क ने एक अंधे ब्राह्मण को अपने दोनों नेत्रों का दान करके परम उत्तम गति प्राप्त की थी। समुद्र ने देवताओं के समक्ष अपनी नियत सीमा को न लाँघने की प्रतिज्ञा की थी, सो अब तक वह उसका उल्लङ्घन नहीं करता है। आप भी पूर्ववर्ती महापुरुषों के बर्ताव को सदा ध्यान में रखकर अपनी प्रतिज्ञा झूठी न करें।' 

'परंतु आप मेरी बात क्यों सुनेंगे? दुर्बुद्धि नरेश ! आप तो धर्म को तिलाञ्जलि देकर श्रीराम को राज्य पर अभिषिक्त करके रानी कौशल्या के साथ सदा मौज उड़ाना चाहते हैं। अब धर्म हो या अधर्म, झूठ हो या सच, जिस बात के लिये आपने मुझसे प्रतिज्ञा कर ली है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। यदि श्रीराम का राज्याभिषेक होगा तो मैं आपके सामने आपके देखते-देखते आज ही बहुत-सा विष पीकर मर जाऊँगी। यदि मैं एक दिन भी राम माता कौशल्या को राजमाता होने के नाते दूसरे लोगों से अपने को हाथ जोड़वाती देख लूँगी तो उस समय मैं अपने लिये मर जाना ही अच्छा समझँगी। नरेश्वर! मैं आपके सामने अपनी और भरत की शपथ खाकर कहती हूँ कि श्रीराम को इस देश से निकाल देने के सिवा दूसरे किसी वर से मुझे संतोष नहीं होगा।' 

इतना कहकर कैकेयी चुप हो गयी। राजा बहुत रोये - गिड़गिड़ाये; किंतु उसने उनकी किसी बात का उत्तर नहीं दिया। 'श्रीराम का वनवास हो और भरत का राज्याभिषेक' कैकेयी के मुख से यह परम अमङ्गलकारी वचन सुनकर राजा की सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठीं। वे एक मुहूर्त तक कैकेयी से कुछ न बोले। उस अप्रिय वचन बोलने वाली प्यारी रानी की ओर केवल एकटक दृष्टि से देखते रहे। मन को अप्रिय लगने वाली कैकेयी की वह वज्र के समान कठोर तथा दुःख - शोकमयी वाणी सुनकर राजा को बड़ा दु:ख हुआ। उनकी सुख शान्ति छिन गयी। देवी कैकेयी के उस घोर निश्चय और किये हुए शपथ की ओर ध्यान जाते ही वे 'हा राम !' कहकर लंबी साँस खींचते हुए कटे वृक्ष की भाँति गिर पड़े। उनकी चेतना लुप्त-सी हो गयी। वे उन्मादग्रस्त से प्रतीत होने लगे। उनकी प्रकृति विपरीत - सी हो गयी। वे रोगी-से जान पड़ते थे। इस प्रकार भूपाल दशरथ मन्त्र से जिसका तेज हर लिया गया हो उस सर्प के समान निश्चेष्ट हो गये। 

तदनन्तर उन्होंने दीन और आतुर वाणी में कैकेयी से इस प्रकार कहा – 'अरी ! तुझे अनर्थ ही अर्थ सा प्रतीत हो रहा है, किसने तुझे इसका उपदेश दिया है? जान पड़ता है, तेरा चित्त किसी भूत के आवेश से दूषित हो गया है। पिशाचग्रस्त नारी की भाँति मेरे सामने ऐसी बातें कहती हुई तू लज्जित क्यों नहीं होती? मुझे पहले इस बात का पता नहीं था कि तेरा यह कुलाङ्गनोचित शील इस तरह नष्ट हो गया है। 

‘बालावस्था में जो तेरा शील था, उसे इस समय मैं विपरीत सा देख रहा हूँ। तुझे किस बात का भय हो गया है जो इस तरह का वर माँगती है ? भरत राज्यसिंहासन पर बैठें और श्रीराम वन में रहें - यही तू माँग रही है। यह बड़ा असत्य तथा ओछा विचार है। तू अब भी इससे विरत हो जा। क्रूर स्वभाव और पापपूर्ण विचारवाली नीच दुराचारिणि ! यदि अपने पति का, सारे जगत का और भरत का भी प्रिय करना चाहती है तो इस दूषित संकल्प को त्याग दे। तू मुझ में या श्रीराम में कौन-सा दुःखदायक या अप्रिय बर्ताव देख रही है  कि ऐसा नीच कर्म करने पर उतारू हो गयी है; श्रीराम के बिना भरत किसी तरह राज्य लेना स्वीकार नहीं करेंगे।' 

‘क्योंकि मेरी समझ में धर्मपालन की दृष्टि से भरत श्रीराम से भी बढ़े- चढ़े हैं। श्रीराम से यह कह देने पर कि तुम वन को जाओ; जब उनके मुख की कान्ति राहुग्रस्त चन्द्रमा की भाँति फीकी पड़ जायेगी, उस समय मैं कैसे उनके उस उदास मुख की ओर देख सकूँगा ? मैंने श्रीराम के अभिषेक का निश्चय सुहृदों के साथ विचार करके किया है, मेरी यह बुद्धि शुभ कर्म में प्रवृत्त हुई है; अब मैं इसे शत्रुओं द्वारा पराजित हुई सेना की भाँति पलटी हुई कैसे देखूँगा? नाना दिशाओं से आये हुए राजालोग मुझे लक्ष्य करके खेदपूर्वक कहेंगे कि इस मूढ इक्ष्वाकुवंशी राजा ने कैसे दीर्घकाल तक इस राज्य का पालन किया है?' 

'जब बहुत-से बहुश्रुत गुणवान् एवं वृद्ध पुरुष आकर मुझसे पूछेंगे कि श्रीराम कहाँ हैं? तब मैं उनसे कैसे यह कहूँगा कि कैकेयी के दबाव देने पर मैंने अपने बेटे को घर से निकाल दिया। यदि कहूँ कि श्रीराम को वनवास देकर मैंने सत्य का पालन किया है तो इसके पहले जो उन्हें राज्य देने की बात कह चुका हूँ, वह असत्य हो जायेगी। यदि राम वन को चले गये तो कौशल्या मुझे क्या कहेगी? उसका ऐसा महान् अपकार करके मैं उसे क्या उत्तर दूँग। हाय ! जिसका पुत्र मुझे सबसे अधिक प्रिय है, वह प्रिय वचन बोलने वाली कौशल्या जब-जब दासी, सखी, पत्नी, बहिन और माता की भाँति मेरा प्रिय करने की इच्छा से मेरी सेवा में उपस्थित होती थी, तब-तब उस सत्कार पाने योग्य देवी का भी मैंने तेरे ही कारण कभी सत्कार नहीं किया।' 

‘तेरे साथ जो मैंने इतना अच्छा बर्ताव किया, वह याद आकर इस समय मुझे उसी प्रकार संताप दे रहा है, जैसे अपथ्य (हानिकारक) व्यञ्जनों से युक्त खाया हुआ अन्न किसी रोगी को कष्ट देता है। श्रीराम के अभिषेक का निवारण और उनका वन की ओर प्रस्थान देखकर निश्चय ही सुमित्रा भयभीत हो जायेगी, फिर वह कैसे मेरा विश्वास करेगी ? हाय! बेचारी सीता को एक ही साथ दो दु:खद एवं अप्रिय समाचार सुनने पड़ेंगे - श्रीराम का वनवास और मेरी मृत्यु।' 

'जब वह श्रीराम के लिये शोक करने लगेगी, उस समय मेरे प्राणों का नाश कर डालेगी उसका शोक देखकर मेरे प्राण इस शरीर में नहीं रह सकेंगे। उसकी दशा हिमालय के पार्श्वभाग में अपने स्वामी किन्नर से बिछुड़ी हुई किन्नरी के समान हो जायेगी। मैं श्रीराम को विशाल वन में निवास करते और मिथिलेशकुमारी सीता को रोती देख अधिक कालतक जीवित रहना नहीं चाहता। ऐसी दशा में तू निश्चय ही विधवा होकर बेटे के साथ अयोध्या का राज्य करना। ओह! मैं तुझे अत्यन्त सती-साध्वी समझता था, परंतु तू बड़ी दुष्टा निकली; ठीक उसी तरह जैसे कोई मनुष्य देखने में सुन्दर मदिरा को पीकर पीछे उसके द्वारा किये गये विकार से यह समझ पाता है कि इसमें विष मिला हुआ था।'

‘अब तक जो तू सान्त्वनापूर्ण मीठे वचन बोलकर मुझे आश्वासन देती हुई बातें किया करती थी, वे तेरी कही हुई सारी बातें झूठी थीं। जैसे व्याध हिरण को मधुर संगीत से आकृष्ट करके उसे मार डालता है, उसी प्रकार तू भी पहले मुझे लुभाकर अब मेरे प्राण ले रही है। श्रेष्ठ पुरुष निश्चय ही मुझे नीच और एक नारी के मोह में पड़कर बेटे को बेच देनेवाला कहकर मदिरापान (शराबी) ब्राह्मण की भाँति मेरी राह बाट और गली-कूचों में निन्दा करेंगे।  अहो! कितना दुःख है! कितना कष्ट है!! जहाँ मुझे तेरी ये बातें सहन करनी पड़ती हैं। मानो यह मेरे पूर्वजन्म के किये हुए पाप का ही अशुभ फल है, जो मुझ पर ऐसा महान् दुःख आ पड़ा।' 

'पापिनि! मुझ पापी ने बहुत दिनों से तेरी रक्षा की और अज्ञानवश तुझे गले लगाया; किंतु तू आज मेरे गले में पड़ी हुई फाँसी की रस्सी बन गयी। जैसे बालक एकान्त में खेलता-खेलता काले नाग को हाथ में पकड़ ले, उसी प्रकार मैंने एकान्त में तेरे साथ क्रीड़ा करते हुए तेरा आलिङ्गन किया है; परंतु उस समय मुझे यह न सूझा कि तू ही एक दिन मेरी मृत्यु का कारण बनेगी। हाय! मुझ दुरात्मा ने जीते-जी ही अपने महात्मा पुत्र को पितृहीन बना दिया। मुझे यह सारा संसार निश्चय ही धिक्कारेगा – गालियाँ देगा, जो उचित ही होगा। लोग मेरी निन्दा करते हुए कहेंगे कि राजा दशरथ बड़ा ही मूर्ख और कामी है, जो एक स्त्री को संतुष्ट करने के लिये अपने प्यारे पुत्र को वन में भेज रहा है।' 

‘हाय! अब तक तो श्रीराम वेदों का अध्ययन करने, ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करने तथा अनेकानेक गुरुजनों की सेवा में संलग्न रहने के कारण दुबले होते चले आये हैं। अब जब इनके लिये सुखभोग का समय आया है, तब ये वन में जाकर महान् कष्ट में पड़ेंगे। अपने पुत्र श्रीराम से यदि मैं कह दूँ कि तुम वन को चले जाओ तो वे तुरंत 'बहुत अच्छा' कहकर मेरी आज्ञा को स्वीकार कर लेंगे। मेरे पुत्र राम दूसरी कोई बात कहकर मुझे प्रतिकूल उत्तर नहीं दे सकते। यदि मेरे वन जाने की आज्ञा दे देने पर भी श्रीरामचन्द्र उसके विपरीत करते - वन में नहीं जाते तो वही मेरे लिये प्रिय कार्य होगा; किंतु मेरा बेटा ऐसा नहीं कर सकता।' 

'यदि रघुनन्दन राम वन को चले गये तो सब लोगों के धिक्कार पात्र बने हुए मुझ अक्षम्य अपराधी को मृत्यु अवश्य यमलोक में पहुँचा देगी। यदि नरश्रेष्ठ श्रीराम के वन में चले जाने पर मेरी मृत्यु हो गयी तो शेष जो मेरे प्रियजन (कौशल्या आदि) यहाँ रहेंगे, उन पर तू कौन-सा अत्याचार करेगी ? देवी कौशल्या को यदि मुझसे, श्रीराम से तथा शेष दोनों पुत्र लक्ष्मण और शत्रुघ्न से विछोह हो जायेगा तो वह इतने बड़े दु:ख को सहन नहीं कर सकेगी; अत: मेरे ही पीछे वह भी परलोक सिधार जायेगी। सुमित्रा का भी यही हाल होगा। कैकेयी! इस प्रकार कौशल्या को, सुमित्रा को और तीनों पुत्रों के साथ मुझे भी नरक-तुल्य महान् शोक में डालकर तू स्वयं सुखी होना।' 

‘अनेकानेक गुणों से सत्कृत, शाश्वत तथा क्षोभरहित यह इक्ष्वाकुकुल जब मुझसे और श्रीराम से परित्यक्त होकर शोक से व्याकुल हो जायेगा, तब उस अवस्था में तू इसका पालन करेगी। यदि भरत को भी श्रीराम का यह वन में भेजा जाना प्रिय लगता हो तो मेरी मृत्यु के बाद वे मेरे शरीर का दाहसंस्कार न करें। पुरुषशिरोमणि श्रीराम के वन-गमन के पश्चात् मेरी मृत्यु हो जाने पर अब विधवा होकर तू बेटे के साथ अयोध्या का राज्य करेगी। राजकुमारी! तू मेरे दुर्भाग्य से मेरे घर में आकर बस गयी। तेरे कारण संसार में पापाचारी की भाँति मुझे निश्चय ही अनुपम अपयश, तिरस्कार और समस्त प्राणियों से अवहेलना प्राप्त होगी।' 

'मेरे पुत्र सामर्थ्यशाली राम बारंबार रथों, हाथियों और घोड़ों से यात्रा किया करते थे। वे ही अब उस विशाल वन में पैदल कैसे चलेंगे? भोजन के समय जिनके लिये कुण्डलधारी रसोइये प्रसन्न होकर पहले मैं बनाऊँगा' ऐसा कहते हुए खाने- पीने की वस्तुएँ तैयार करते थे, वे ही मेरे पुत्र रामचन्द्र वन में तीखे और कड़वे फलों का आहार करते हुए किस तरह निर्वाह करेंगे। जो सदा बहुमूल्य वस्त्र पहना करते थे और जिनका चिरकाल से सुख में ही समय बीता है, वे ही श्रीराम वन में गेरुए वस्त्र पहनकर कैसे रह सकेंगे? श्रीराम का वन गमन और भरत का अभिषेक ऐसा कठोर वाक्य तूने किसकी प्रेरणा से अपने मुँह से निकाला है।' 

‘स्त्रियों को धिक्कार है; क्योंकि वे शठ और स्वार्थपरायण होती हैं; परंतु मैं सारी स्त्रियों के लिये ऐसा नहीं कह सकता, केवल भरत की माता की ही निन्दा करता हूँ। अनर्थ में ही अर्थबुद्धि रखनेवाली क्रूर कैकेयी ! तू मुझे संताप देने के लिये ही इस घर में बसायी गयी है। अरी ! मेरे कारण तु अपना कौन-सा अप्रिय होता देख रही है? अथवा सबका निरन्तर हित करनेवाले श्रीराम में ही तुझे कौन-सी बुराई दिखायी देती है। श्रीराम को संकट के समुद्र में डूबा हुआ देखकर तो पिता अपने पुत्रों को त्याग देंगे। अनुरागिणी स्त्रियाँ भी अपने पतियों को त्याग देंगी। इस प्रकार यह सारा जगत् ही कुपित - विपरीत व्यवहार करनेवाला हो जायेगा।' 

'देवकुमार के समान कमनीय रूप वाले अपने पुत्र श्रीराम को जब वस्त्र और आभूषणों से विभूषित होकर सामने आते देखता हूँ तो नेत्रों से उनकी शोभा निहारकर निहाल हो जाता हूँ। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता है मानो मैं फिर युवा हो गया। कदाचित् सूर्य के बिना भी संसार का काम चल जाये, वज्रधारी इन्द्र के वर्षा न करने पर भी प्राणियों का जीवन सुरक्षित रह जाये, परंतु राम को यहाँ से वन की ओर जाते देखकर कोई भी जीवित नहीं रह सकता- मेरी ऐसी धारणा है। अरी! तू मेरा विनाश चाहनेवाली, अहित करनेवाली और शत्रुरूप है। जैसे कोई अपनी ही मृत्यु को घर में स्थान दे दे, उसी प्रकार मैंने तुझे घर में बसा लिया है। खेद की बात है कि मैंने मोहवश तुझ महाविषैली नागिन को चिरकाल से अपने अंग में धारण कर रखा है; इसीलिये आज मैं मारा गया।' 

‘मुझसे, श्रीराम और लक्ष्मण से हीन होकर भरत समस्त बान्धवों का विनाश करके तेरे साथ इस नगर तथा राष्ट्र का शासन करें तथा तू मेरे शत्रुओं का हर्ष बढ़ाने वाली हो। क्रूरतापूर्ण बर्ताव करनेवाली कैकेयी! तू संकट में पड़े हुए पर प्रहार कर रही है। अरी! जब तू दुराग्रहपूर्वक आज ऐसी कठोर बातें मुँह से निकालती है, उस समय तेरे दाँतों के हजारों टुकड़े होकर मुँह से नीचे क्यों नहीं गिर जाते ? श्रीराम कभी किसी से कोई अहितकारक या अप्रिय वचन नहीं करते हैं। वे कटुवचन बोलना जानते ही नहीं हैं। उनका अपने गुणों के कारण सदा-सर्वदा सम्मान होता है। उन्हीं मनोहर वचन बोलने वाले श्रीराम में तू दोष कैसे बता रही है? क्योंकि वनवास उसी को दिया जाता है, जिसके बहुत से दोष सिद्ध हो चुके हों। 

‘ओ केकयराज के कुल की जीती-जागती कलङ्क ! तू चाहे ग्लानि में डूब जा अथवा आग में जलकर खाक हो जा या विष खाकर प्राण दे दे अथवा पृथ्वी में हजारों दरारें बनाकर उसी में समा जा; परंतु मेरा अहित करने वाली तेरी यह अत्यन्त कठोर बात मैं कदापि नहीं मानूँगा। तू छुरे के समान घात करनेवाली है। बातें तो मीठी-मीठी करती है, परंतु वे सदा झूठी और सद्भावना से रहित होती हैं। तेरे हृदय का भाव अत्यन्त दूषित है तथा तू अपने कुल का भी नाश करनेवाली है। इतना ही नहीं, तू प्राणों सहित मेरे हृदय को भी जलाकर भस्म कर डालना चाहती है; इसीलिये मेरे मन को नहीं भाती है। तुझ पापिनी का जीवित रहना मैं नहीं सह सकता।' 

'देवी! अपने बेटे श्रीराम के बिना मेरा जीवन नहीं रह सकता, फिर कहाँ से सुख हो सकता है? आत्मज्ञ पुरुषों को भी अपने पुत्र से बिछोह हो जाने पर कैसे चैन मिल सकता है? अत: तू मेरा अहित न कर। मैं तेरे पैर छूता हूँ, तू मुझ पर प्रसन्न हो जा।' 

इस प्रकार महाराज दशरथ मर्यादा का उल्लङ्घन करनेवाली उस हठीली स्त्री के वश में पड़कर अनाथ की भाँति विलाप कर रहे थे। वे देवी कैकेयी के फैलाये हुए दोनों चरणों को छूना चाहते थे; परंतु उन्हें न पाकर बीच में ही मूर्च्छित होकर गिर पड़े। ठीक उसी तरह, जैसे कोई रोगी किसी वस्तु को छूना चाहता है; किंतु दुर्बलता के कारण वहाँ तक न पहुँचकर बीच में ही अचेत होकर गिर जाता है। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-१०(10) समाप्त !

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