भाग-६(6) सरस्वती का मन्थरा की बुद्धि फेरना, कैकेयी-मन्थरा संवाद, श्रीराम के अभिषेक का समाचार पाकर खिन्न हुई मन्थरा का कैकेयी को उभाड़ना

 


इधर तो सब यह कह रहे हैं कि श्रीराम का राज्याभिषेक कब होगा, उधर कुचक्री देवता विघ्न मना रहे हैं। देवताओं को अवध के बधावे नहीं सुहाते, जैसे चोर को चाँदनी रात नहीं भाती। सरस्वतीजी को बुलाकर देवता विनय कर रहे हैं और बार-बार उनके पैरों को पकड़कर उन पर गिरते हैं। 

वे कहते हैं - हे माता! हमारी बड़ी विपत्ति को देखकर आज वही कीजिए जिससे श्री रामचन्द्रजी राज्य त्यागकर वन को चले जाएँ और देवताओं का सब कार्य सिद्ध हो। 

देवताओं की विनती सुनकर सरस्वतीजी खड़ी-खड़ी पछता रही हैं कि हाय! मैं कमलवन के लिए हेमंत ऋतु की रात हुई। उन्हें इस प्रकार पछताते देखकर देवता विनय करके कहने लगे - हे माता! इसमें आपको जरा भी दोष न लगेगा। श्री रघुनाथजी विषाद और हर्ष से रहित हैं। आप तो श्री रामजी के सब प्रभाव को जानती ही हैं। जीव अपने कर्मवश ही सुख-दुःख का भागी होता है। अतएव देवताओं के हित के लिए आप अयोध्या जाइए। 

बार-बार चरण पकड़कर देवताओं ने सरस्वती को संकोच में डाल दिया। तब वे यह विचारकर चलीं कि देवताओं की बुद्धि ओछी है। इनका निवास तो ऊँचा है, पर इनकी करनी नीची है। ये दूसरे का ऐश्वर्य नहीं देख सकते। परन्तु आगे के काम का विचार करके श्री रामजी के वन जाने से राक्षसों का वध होगा, जिससे सारा जगत सुखी हो जाएगा। ऐसा विचार कर सरस्वती हृदय में हर्षित होकर दशरथजी की पुरी अयोध्या में आईं, मानो दुःसह दुःख देने वाली कोई ग्रहदशा आई हो। 

रानी कैकेयी के पास एक दासी थी, जो उसके मायके से आयी हुई थी। वह सदा कैकेयी के ही साथ रहा करती थी । उसका जन्म कहाँ हुआ था? उसके देश और माता-पिता कौन थे? इसका पता किसी को नहीं था। अभिषेक से एक दिन पहले वह स्वेच्छा से ही कैकेयी के चन्द्रमा के समान कान्तिमान् महल की छत पर जा चढ़ी। 

उस दासी का नाम था - मन्थरा। उसे अपयश की पिटारी बनाकर सरस्वती उसकी बुद्धि को फेरकर चली गईं। उसने उस महल की छत से देखा - अयोध्या की सड़कों पर छिड़काव किया गया है और सारी पुरी में यत्र-तत्र खिले हुए कमल और उत्पल बिखेरे गये हैं। सब ओर बहुमूल्य पताकाएँ फहरा रही हैं। ध्वजाओं से इस पुरी की अपूर्व शोभा हो रही है। राजमार्गों पर चन्दनमिश्रित जल का छिड़काव किया गया है तथा अयोध्यापुरी के सब लोग उबटन लगाकर सिर के ऊपर से स्नान किये हुए हैं। 

श्रीराम के दिये हुए माल्य और मोदक हाथ में लिये श्रेष्ठ ब्राह्मण हर्षनाद कर रहे हैं, देवमन्दिरों के दरवाजे चूने और चन्दन आदि से लीपकर सफेद एवं सुन्दर बनाये गये हैं, सब प्रकार के बाजों की मनोहर ध्वनि हो रही है, अत्यन्त हर्ष में भरे हुए मनुष्यों से सारा नगर परिपूर्ण है और चारों ओर वेदपाठकों की ध्वनि गूंज रही है, श्रेष्ठ हाथी और घोड़े हर्ष से उत्फुल्ल दिखायी देते हैं तथा गाय-बैल प्रसन्न होकर रंभा रहे हैं। 

सारे नगरनिवासी हर्षजनित रोमाञ्च से युक्त और आनन्दमग्न हैं तथा नगर में सब ओर श्रेणीबद्ध ऊँचे-ऊँचे ध्वज फहरा रहे हैं। अयोध्या की ऐसी शोभा को देखकर मन्थरा को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने पास ही कोठे पर राम की धाय को खड़ी देखा, उसके नेत्र प्रसन्नता से खिले हुए थे और शरीर पर पीले रंग की रेशमी साड़ी शोभा पा रही थी। 

उसे देखकर मन्थरा ने उससे पूछा – धाय! आज श्रीरामचन्द्रजी की माता अपने किसी अभीष्ट मनोरथ के साधन में तत्पर हो अत्यन्त हर्ष में भरकर लोगों को धन क्यों बाँट रही हैं? आज यहाँ के सभी मनुष्यों को इतनी अधिक प्रसन्नता क्यों है? इसका कारण मुझे बताओ! आज महाराज दशरथ अत्यन्त प्रसन्न होकर कौन-सा कर्म करायेंगे। 

श्रीराम की धाय तो हर्ष से फूली नहीं समाती थी, उसने कुब्जा के पूछने पर बड़े आनन्द के साथ उसे बताया - कुब्जे ! रघुनाथजी को बहुत बड़ी सम्पत्ति प्राप्त होने वाली है। कल महाराज दशरथ पुष्यनक्षत्र के योग में क्रोध को जीतने वाले, पापरहित, रघुकुलनन्दन श्रीराम को युवराज के पदपर अभिषिक्त करेंगे। 

धाय का यह वचन सुनकर कुब्जा मन-ही-मन कुढ़ गयी और उस कैलाश शिखर की भाँति उज्ज्वल एवं गगनचुम्बी प्रासाद से तुरंत ही नीचे उतर गयी। मन्थरा को इसमें कैकेयी का अनिष्ट दिखायी देता था, वह क्रोध से जल रही थी। 

उसने महल में लेटी हुई कैकेयी के पास जाकर इस प्रकार कहा - मूर्खे! उठ। क्या सो रही है? तुझ पर बड़ा भारी भय आ रहा है। अरी! तेरे ऊपर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा है, फिर भी तुझे अपनी इस दुरवस्था का बोध नहीं होता? तेरे प्रियतम तेरे सामने ऐसा आकार बनाये आते हैं मानो सारा सौभाग्य तुझे ही अर्पित कर देते हों, परंतु पीठ-पीछे वे तेरा अनिष्ट करते हैं। तू उन्हें अपने में अनुरक्त जानकर सौभाग्य की डींग हाँका करती है, परंतु जैसे ग्रीष्म ऋतु में नदी का प्रवाह सूखता चला जाता है, उसी प्रकार तेरा वह सौभाग्य अब अस्थिर हो गया है - तेरे हाथ से चला जाना चाहता है ! 

इष्ट में भी अनिष्ट का दर्शन कराने वाली रोष भरी कुब्जा के इस प्रकार कठोर वचन कहने पर कैकेयी के मनमें बड़ा दुःख हुआ। 

उस समय केकयराजकुमारी ने कुब्जा से पूछा -  मन्थरे ! कोई अमङ्गल की बात तो नहीं हो गयी; क्योंकि तेरे मुख पर विषाद छा रहा है और तू मुझे बहुत दुःखी दिखायी देती है। 

मन्थरा बातचीत करने में बड़ी कुशल थी, वह कैकेयी के मीठे वचन सुनकर और भी खिन्न हो गयी, उसके प्रति अपनी हितैषिता प्रकट करती हुई कुपित हो उठी और कैकेयी के मन में श्रीराम के प्रति भेदभाव और विषाद उत्पन्न करती हुई इस प्रकार बोली - देवी ! तुम्हारे सौभाग्य के महान् विनाश का कार्य आरम्भ हो गया है, जिसका कोई प्रतीकार नहीं है। कल महाराज दशरथ श्रीराम को युवराज के पद पर अभिषिक्त कर देंगे। 

'यह समाचार पाकर मैं दुःख और शोक से व्याकुल हो अगाध भय के समुद्र में डूब गयी हूँ, चिन्ता की आग से मानो जृली जा रही हूँ और तुम्हारे हित की बात बताने के लिये यहाँ आयी हूँ। केकयनन्दिनि! यदि तुम पर कोई दुःख आया तो उससे मुझे भी बड़े भारी दुःख में पड़ना होगा। तुम्हारी उन्नति में ही मेरी भी उन्नति है, इसमें संशय नहीं है।' 

‘देवी! तुम राजाओं के कुल में उत्पन्न हुई हो और एक महाराज की महारानी हो, फिर भी राजधर्मों की उग्रता को कैसे नहीं समझ रही हो? तुम्हारे स्वामी धर्म की बातें तो बहुत करते हैं, परंतु हैं बड़े शठ। मुँह से चिकनी-चुपड़ी बातें करते हैं, परंतु हृदय के बड़े क्रूर हैं। तुम समझती हो कि वे सारी बातें शुद्ध भाव से ही कहते हैं, इसीलिये आज उनके द्वारा तुम बेतरह ठगी गयी।' 

'तुम्हारे पति तुम्हें व्यर्थ सान्त्वना देने के लिये यहाँ उपस्थित होते हैं, वे ही अब रानी कौशल्या को अर्थ से सम्पन्न करने जा रहे हैं। उनका हृदय इतना दूषित है कि भरत को तो उन्होंने तुम्हारे मायके भेज दिया और कल सवेरे ही अवध के निष्कण्टक राज्य पर वे श्रीराम का अभिषेक करेंगे। बाले! जैसे माता हित की कामना से पुत्र का पोषण करती है, उसी प्रकार 'पति' कहलाने वाले जिस व्यक्ति का तुमने पोषण किया है, वह वास्तव में शत्रु निकला। जैसे कोई अज्ञानवश सर्प को अपनी गोद में लेकर उसका लालन करे, उसी प्रकार तुमने उन सर्पवत् बर्ताव करनेवाले महाराज को अपने अंग में स्थान दिया है। 

'उपेक्षित शत्रु अथवा सर्प जैसा व्यव्हार कर सकता है, राजा दशरथ ने आज पुत्रसहित तुझ कैकेयी के प्रति वैसा ही व्यवहार किया है। बाले! तुम सदा सुख भोगने के योग्य हो, परंतु मन में पाप (दुर्भावना) रखकर ऊपर से झूठी सान्त्वना देनेवाले महाराज ने अपने राज्य पर श्रीराम को स्थापित करने का विचार करके आज सगे-सम्बन्धियों सहित तुमको मानो मौत के मुख में डाल दिया है।' 

‘केकयराजकुमारी! तुम दुःखजनक बात सुनकर भी मेरी ओर इस तरह देख रही हो, मानो तुम्हें प्रसन्नता हुई हो और मेरी बातों से तुम्हें विस्मय हो रहा हो, परंतु यह विस्मय छोड़ो और जिसे करने का समय आ गया है, अपने उस हितकर कार्य को शीघ्र करो तथा ऐसा करके अपनी, अपने पुत्र की और मेरी भी रक्षा करो।' 

मन्थरा की यह बात सुनकर सुन्दर मुख वाली कैकेयी सहसा शय्या से उठ बैठी। उसका हृदय हर्ष से भर गया। वह शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमण्डल की भाँति उद्दीप्त हो उठी। कैकेयी मन-ही-मन अत्यन्त संतुष्ट हुई। विस्मयविमुग्ध हो मुसकराते हुए उसने कुब्जा को पुरस्कार के रूप में एक बहुत सुन्दर दिव्य आभूषण प्रदान किया। 

कुब्जा को वह आभूषण देकर हर्ष से भरी हुई रमणीशिरोमणि कैकेयी ने पुनः मन्थरा से इस प्रकार कहा - 'मन्थरे! यह तूने मुझे बड़ा ही प्रिय समाचार सुनाया। तूने मेरे लिये जो यह प्रिय संवाद सुनाया, इसके लिये मैं तेरा और कौन- सा उपकार करूँ। मैं भी राम और भरत में कोई भेद नहीं समझती। अतः यह जानकर कि राजा श्रीराम का अभिषेक करनेवाले हैं, मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। 

‘मन्थरे! तू मुझसे प्रिय वस्तु पाने के योग्य है। मेरे लिये श्रीराम के अभिषेकसम्बन्धी इस समाचार से बढ़कर दूसरा कोई प्रिय एवं अमृत के समान मधुर वचन नहीं कहा जा सकता। ऐसी परम प्रिय बात तुमने कही है; अतः अब यह प्रिय संवाद सुनाने के बाद तू कोई श्रेष्ठ वर माँग ले, मैं उसे अवश्य दूँगी।'

यह सुनकर मन्थरा ने कैकेयी की निन्दा करके उसके दिये हुए आभूषण को उठाकर फेंक दिया और कोप तथा दु:ख से भरकर वह इस प्रकार बोली - रानी! तुम बड़ी नादान हो। अहो ! तुमने यह बेमौके हर्ष किसलिये प्रकट किया? तुम्हें शोक के स्थान पर प्रसन्नता कैसे हो रही है? अरी! तुम शोक के समुद्र में डूबी हुई हो, तो भी तुम्हें अपनी इस विपन्नावस्था का बोध नहीं हो रहा है। 

‘देवी! महान् संकट में पड़ने पर जहाँ तुम्हें शोक होना चाहिये, वहीं हर्ष हो रहा है। तुम्हारी यह अवस्था देखकर मुझे मन-ही-मन बड़ा क्लेश सहन करना पड़ता है। मैं दुःख से व्याकुल हुई जाती हूँ। मुझे तुम्हारी दुर्बुद्धि के लिये ही अधिक शोक होता है। अरी! सौत का बेटा शत्रु होता है। वह सौतेली माँ के लिये साक्षात् मृत्यु के समान है। भला, उसके अभ्युदय का अवसर आया देख कौन बुद्धिमती स्त्री अपने मन में हर्ष मानेगी।' 

‘यह राज्य भरत और राम दोनों के लिये साधारण भोग्यवस्तु है, इस पर दोनों का समान अधिकार है, इसलिये श्रीराम को भरत से ही भय है। यही सोचकर मैं विषाद में डूबी जाती हूँ; क्योंकि भयभीत से ही भय प्राप्त होता है अर्थात् आज जिसे भय है, वही राज्य प्राप्त कर लेने पर जब सबल हो जायेगा, तब अपने भय के हेतु को उखाड़ फेंकेगा।'  

‘महाबाहु लक्ष्मण सम्पूर्ण हृदय से श्रीरामचन्द्रजी के अनुगत हैं। जैसे लक्ष्मण श्रीराम के अनुगत हैं, उसी तरह शत्रुघ्न भी भरत का अनुसरण करने वाले हैं। भामिनि! उत्पत्ति के क्रम से श्रीराम के बाद भरत का ही पहले राज्य पर अधिकार हो सकता है अत: भरत से भय होना स्वाभाविक है। लक्ष्मण और शत्रुघ्न तो छोटे हैं; अत: उनके लिये राज्यप्राप्ति की सम्भावना दूर है।' 

'श्रीराम समस्त शास्त्रों के ज्ञाता हैं, विशेषतः क्षत्रिय चरित्र (राजनीति) के पण्डित हैं तथा समयोचित कर्तव्य का पालन करनेवाले हैं; अत: उनका तुम्हारे पुत्र के प्रति जो क्रूरतापूर्ण व्यवहार होगा, उसे सोचकर मैं भय से काँप उठती हूँ। वास्तव में कौशल्या ही सौभाग्यवती हैं, जिनके पुत्र का कल पुष्यनक्षत्र के योग में श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा युवराज के महान् पद पर अभिषेक होने जा रहा है।' 

‘वे भूमण्डल का निष्कण्टक राज्य पाकर प्रसन्न होंगी; क्योंकि वे राजा की विश्वासपात्र हैं और तुम दासी की भाँति हाथ जोड़कर उनकी सेवा में उपस्थित होओगी। इस प्रकार हमलोगों के साथ तुम भी कौशल्या की दासी बनोगी और तुम्हारे पुत्र भरत को भी श्रीरामचन्द्रजी की चाकरी करनी पड़ेगी।' श्रीरामचन्द्रजी के अन्त: पुर की परम सुन्दरी स्त्रियाँ - सीतादेवी और उनकी सखियाँ निश्चय ही बहुत प्रसन्न होंगी और भरत के प्रभुत्व का नाश होने से तुम्हारी बहुएँ शोकमग्न हो जायेगी। 

मन्थरा को अत्यन्त अप्रसन्नता के कारण इस प्रकार बहकी-बहकी बातें करती देख देवी कैकेयी ने श्रीराम के गुणों की ही प्रशंसा करते हुए कहा - कुब्जे! श्रीराम धर्म के ज्ञाता, गुणवान्, जितेन्द्रिय, कृतज्ञ, सत्यवादी और पवित्र होने के साथ ही महाराज के ज्येष्ठ पुत्र हैं; अत: युवराज होने के योग्य वे ही हैं। वे दीर्घजीवी होकर अपने भाइयों और भृत्यों का पिता की भाँति पालन करेंगे। कुब्जे ! उनके अभिषेक की बात सुनकर तू इतनी जल क्यों रही है ?

'श्रीराम की राज्यप्राप्ति के सौ वर्ष बाद नरश्रेष्ठ भरत को भी निश्चय ही अपने पिता - पितामहों का राज्य मिलेगा। मन्थरे! ऐसे अभ्युदय की प्राप्ति के समय, जब कि भविष्य में कल्याण ही कल्याण दिखायी दे रहा है, तू इस प्रकार जलती हुई-सी संतप्त क्यों हो रही है? मेरे लिये जैसे भरत आदर के पात्र हैं, वैसे ही बल्कि उनसे भी बढ़कर श्रीराम हैं; क्योंकि वे कौशल्या से भी बढ़कर मेरी बहुत सेवा किया करते हैं। यदि श्रीराम को राज्य मिल रहा है तो उसे भरत को मिला हुआ समझ; क्योंकि श्रीरामचन्द्र अपने भाइयों को भी अपने ही समान समझते हैं। 

कैकेयी की यह बात सुनकर मन्थरा को बड़ा दुःख हुआ। वह लंबी और गरम साँस खींचकर कैकेयीसे बोली - रानी! तुम मूर्खतावश अनर्थ को ही अर्थ समझ रही हो। तुम्हें अपनी स्थिति का पता नहीं है। तुम दुःख के उस महासागर में डूब रही हो, जो शोक (इष्ट से वियोग की चिन्ता) और व्यसन (अनिष्ट की प्राप्ति के दु:ख ) से महान् विस्तार को प्राप्त हो रहा है। केकयराजकुमारी! जब श्रीरामचन्द्र राजा हो जायेंगे, तब उनके बाद उनका जो पुत्र होगा, उसी को राज्य मिलेगा। भरत तो राजपरम्परा से अलग हो जायेंगे। 

'भामिनि ! राजा के सभी पुत्र राज्यसिंहासन पर नहीं बैठते हैं; यदि सबको बिठा दिया जाये तो बड़ा भारी अनर्थ हो जाये। परमसुन्दरी केकयनन्दिनि ! इसीलिये राजा लोग राजकाज का भार ज्येष्ठ पुत्र पर ही रखते हैं। यदि ज्येष्ठ पुत्र गुणवान् न हो तो दूसरे गुणवान् पुत्रों को भी राज्य सौंप देते हैं। पुत्रवत्सले! तुम्हारा पुत्र राज्य के अधिकार से तो बहुत दूर हटा ही दिया जायेगा, वह अनाथ की भाँति समस्त सुखों से भी वञ्चित हो जायेगा।' 

‘इसलिये मैं तुम्हारे ही हित की बात सुझाने के लिये यहाँ आयी हूँ; परंतु तुम मेरा अभिप्राय तो समझती नहीं, उलटे सौत का अभ्युदय सुनकर मुझे पारितोषिक देने चली हो। याद रखो, यदि श्रीराम को निष्कण्टक राज्य मिल गया तो वे भरत को अवश्य ही इस देश से बाहर निकाल देंगे अथवा उन्हें परलोक में भी पहुँचा सकते हैं।' 

‘छोटी अवस्था में ही तुमने भरत को मामा के घर भेज दिया। निकट रहने से सौहार्द उत्पन्न होता है। यह बात स्थावर योनियों में भी देखी जाती है लता और वृक्ष आदि एक-दूसरेके निकट होने पर परस्पर आलिङ्गन - पाश में बद्ध हो जाते हैं। यदि भरत यहाँ होते तो राजा का उनमें भी समान रूप से स्नेह बढ़ता; अतः वे उन्हें भी आधा राज्य दे देते। 

‘भरत के अनुरोध से शत्रुघ्न भी उनके साथ ही चले गये यदि वे यहाँ होते तो भरत का काम बिगड़ने नहीं पाता। क्योंकि जैसे लक्ष्मण राम के अनुगामी हैं, उसी प्रकार शत्रुघ्न भरत का अनुसरण करनेवाले हैं। सुना जाता है, जंगल की लकड़ी बेचकर जीविका चलाने वाले कुछ लोगों ने किसी वृक्ष को काटने का निश्चय किया, परंतु वह वृक्ष कँटीली झाड़ियों से घिरा हुआ था; इसलिये वे उसे काट नहीं सके। इस प्रकार उन कँटीली झाड़ियों ने निकट रहने के कारण उस वृक्ष को महान् भय से बचा लिया। 

'सुमित्राकुमार लक्ष्मण श्रीराम की रक्षा करते हैं और श्रीराम उनकी। उन दोनों का उत्तम भ्रातृ-प्रेम दोनों अश्विनीकुमारों की भाँति तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। इसलिये श्रीराम लक्ष्मण का तो किञ्चित् भी अनिष्ट नहीं करेंगे, परंतु भरत का अनिष्ट किये बिना वे रह नहीं सकते; इसमें संशय नहीं है। अत: श्रीरामचन्द्र महाराज के महल से ही सीधे वन को चले जाएँ मुझे तो यही अच्छा जान पड़ता है और इसी में तुम्हारा परम हित है। 

‘यदि भरत धर्मानुसार अपने पिता का राज्य प्राप्त कर लेंगे तो तुम्हारा और तुम्हारे पक्ष के अन्य सब लोगों का भी कल्याण होगा। सौतेला भाई होने के कारण जो श्रीराम का सहज शत्रु है, वह सुख भोगने के योग्य तुम्हारा बालक भरत राज्य और धन से वञ्चित हो राज्य पाकर समृद्धिशाली बने हुए श्रीराम के वश में पड़कर कैसे जीवित रहेगा। जैसे वन में सिंह हाथियों के यूथपति पर आक्रमण करता है और वह भागा फिरता है, उसी प्रकार राजा राम भरत का तिरस्कार करेंगे; अत: उस तिरस्कार से तुम भरत की रक्षा करो।' 

'तुमने पहले पति का अत्यन्त प्रेम प्राप्त होने के कारण घमंड में आकर जिनका अनादर किया था, वे ही तुम्हारी सौत श्रीराम माता कौशल्या पुत्र की राज्यप्राप्ति से परम सौभाग्यशालिनी हो उठी हैं; अब वे तुमसे अपने वैर का बदला क्यों नहीं लेंगी। भामिनि! जब श्रीराम अनेक समुद्रों और पर्वतों से युक्त समस्त भूमण्डल का राज्य प्राप्त कर लेंगे, तब तुम अपने पुत्र भरत के साथ ही दीन-हीन होकर अशुभ पराभव का पात्र बन जाओगी।' 

‘याद रखो, जब श्रीराम इस पृथ्वी पर अधिकार प्राप्त कर लेंगे, तब निश्चय ही तुम्हारे पुत्र भरत नष्टप्राय हो जायेंगे। अतः ऐसा कोई उपाय सोचो, जिससे तुम्हारे पुत्र को तो राज्य मिले और शत्रुभूत श्रीराम का वनवास हो जाये।' 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-६(6) समाप्त !

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