भाग-६३(63) वशिष्ठजी की आज्ञा से पाँच दूतों का अयोध्या से केकयदेश के राजगृह नगर में जाना, भरत की चिन्ता तथा भरत का मित्रों के समक्ष अपने देखे हुए भयंकर दु:स्वप्न का वर्णन करना

 


मार्कण्डेय आदि के ऐसे वचन सुनकर महर्षि वशिष्ठ ने मित्रों, मन्त्रियों और उन समस्त ब्राह्मणों को इस प्रकार उत्तर दिया - राजा दशरथ ने जिनको राज्य दिया है, वे भरत इस समय अपने भाई शत्रुघ्न के साथ मामा के यहाँ बड़े सुख और प्रसन्नता के साथ निवास करते हैं। उन दोनों वीर बन्धुओं को बुलाने के लिये शीघ्र ही तेज चलने वाले दूत घोड़ों पर सवार होकर यहाँ से जायँ, इसके सिवा हमलोग और क्या विचार कर सकते हैं? 

इस पर सबने वशिष्ठजी से कहा - 'हाँ, दूत अवश्य भेजे जायँ।' उनका वह कथन सुनकर वशिष्ठजी ने दूतों को सम्बोधित करके कहा - सिद्धार्थ! विजय! जयन्त! अशोक! और नन्दन ! तुम सब यहाँ आओ और तुम्हें जो काम करना है, उसे सुनो। मैं तुम सब लोगों से ही कहता हूँ। तुम लोग शीघ्रगामी घोड़ों पर सवार होकर तुरंत ही राजगृह नगर को जाओ और शोक का भाव न प्रकट करते हुए मेरी आज्ञा के अनुसार भरत से इस प्रकार कहो। 

‘कुमार! पुरोहितजी तथा समस्त मन्त्रियों ने आपसे कुशल - मङ्गल कहा है। अब आप यहाँ से शीघ्र ही चलिये। अयोध्या में आपसे अत्यन्त आवश्यक कार्य है।' 

‘भरत को श्रीरामचन्द्र के वनवास और पिता की मृत्यु का हाल मत बतलाना और इन परिस्थितियों के कारण रघुवंशियों के यहाँ जो कुहराम मचा हुआ है, इसकी चर्चा भी न करना। केकयराज तथा भरत को भेंट देने के लिये रेशमी वस्त्र और उत्तम आभूषण लेकर तुम लोग यहाँ से शीघ्र चल दो।' 

केकय देश को जानेवाले वे दूत रास्ते का खर्च ले अच्छे घोड़ों पर सवार हो अपने-अपने घर को गये। तदनन्तर यात्रासम्बन्धी शेष तैयारी पूरी करके वशिष्ठजी की आज्ञा ले सभी दूत तुरंत वहाँ से प्रस्थित हो गये। अपरताल नामक पर्वत के अन्तिम छोर अर्थात् दक्षिण भाग और प्रलम्बगिरि के उत्तर भाग में दोनों पर्वतों के बीच से बहने वाली मालिनी नदी के तट पर होते हुए वे दूत आगे बढ़े। हस्तिनापुर में गङ्गा को पार करके वे पश्चिम की ओर गये और पाञ्चालदेश में पहुँचकर कुरुजाङ्गल प्रदेश के बीच से होते हुए आगे बढ़ गये। 

मार्ग में सुन्दर फूलों से सुशोभित सरोवरों तथा निर्मल जल वाली नदियों का दर्शन करते हुए वे दूत कार्यवश तीव्र गति से आगे बढ़ते गये। तदनन्तर वे स्वच्छ जल से सुशोभित, पानी से भरी हुई और भाँति-भाँति के पक्षियों से सेवित दिव्य नदी शरदण्डा के तट पर पहुँचकर उसे वेगपूर्वक लाँघ गये। शरदण्डा के पश्चिमतट पर एक दिव्य वृक्ष था, जिस पर किसी देवता का आवास था; इसीलिये वहाँ जो याचना की जाती थी, वह सत्य (सफल) होती थी, अतः उसका नाम सत्योपयाचन हो गया था। उस वन्दनीय वृक्ष के निकट पहुँचकर दूतों ने उसकी परिक्रमा की और वहाँ से आगे जाकर उन्होंने कुलिङ्गा नामक पुरी में प्रवेश किया। 

वहाँ से तेजोऽभिभवन नामक गाँव को पार करते हुए वे अभिकाल नामक गाँव में पहुँचे और वहाँ से आगे बढ़ने पर उन्होंने राजा दशरथ के पिता- पितामहों द्वारा सेवित पुण्यसलिला इक्षुमती नदी को पार किया। वहाँ केवल अञ्जलि भर जल पीकर तपस्या करने वाले वेदों के पारगामी ब्राह्मणों का दर्शन करके वे दूत बालीक देश के मध्यभाग में स्थित सुदामा नामक पर्वत के पास जा पहुँचे। 

उस पर्वत के शिखर पर स्थित भगवान् विष्णु के चरणचिह्न का दर्शन करके वे विपाशा (व्यास) नदी और उसके तटवर्ती शाल्मली वृक्ष के निकट गये। वहाँ से आगे बढ़ने पर बहुत सी नदियों, बावड़ियों, पोखरों, छोटे तालाबों, सरोवरों तथा भाँति-भाँति के वनजन्तुओं - सिंह, व्याघ्र, मृग और हाथियों का दर्शन करते हुए वे दूत अत्यन्त विशाल मार्ग के द्वारा आगे बढ़ने लगे। वे अपने स्वामी की आज्ञा का शीघ्र पालन करने की इच्छा रखते थे। 

उन दूतों के वाहन (घोड़े) चलते-चलते थक गये थे। वह मार्ग बड़ी दूर का होने पर उपद्रव से रहित था। उसे तय करके सारे दूत शीघ्र ही बिना किसी कष्ट के श्रेष्ठ नगर गिरिव्रज में जा पहुँचे। अपने स्वामी (आज्ञा देने वाले वशिष्ठजी) का प्रिय और प्रजावर्ग की रक्षा करने तथा महाराज दशरथ के वंशपरम्परागत राज्य को भरतजी से स्वीकार कराने के लिये सादर तत्पर हुए वे दूत बड़ी उतावली के साथ चलकर रात में ही उस नगर में जा पहुँचे। 

जिस रात में दूतों ने उस नगर में प्रवेश किया था, उससे पहली रात में भरत ने भी एक अप्रिय स्वप्न देखा था। रात बीतकर प्राय: सवेरा हो चला था तभी उस अप्रिय स्वप्न को देखकर राजाधिराज दशरथ के पुत्र भरत मन-ही-मन बहुत संतप्त हुए। उन्हें चिन्तित जान उनके अनेक प्रियवादी मित्रों ने उनका मानसिक क्लेश दूर करने की इच्छा से एक गोष्ठी की और उसमें अनेक प्रकार की बातें करने लगे। कुछ लोग वीणा आदि बजाने लगे। दूसरे लोग उनके खेद की शान्ति के लिये नृत्य कराने लगे। दूसरे मित्रों ने नाना प्रकार के नाटकों का आयोजन किया, जिनमें हास्यरस की प्रधानता थी। 

किंतु रघुकुलभूषण महात्मा भरत उन प्रियवादी मित्रों की गोष्ठी में हास्यविनोद करने पर भी प्रसन्न नहीं हुए। तब सुहृदों से घिरकर बैठे हुए एक प्रिय मित्र ने मित्रों के बीच में विराजमान भरत से पूछा - 'सखे! तुम आज प्रसन्न क्यों नहीं होते हो?'

इस प्रकार पूछते हुए सुहृद को भरत ने इस प्रकार उत्तर दिया - मित्र ! जिस कारण से मेरे मन में यह दैन्य आया है, वह बताता हूँ, सुनो। मैंने आज स्वप्न में अपने पिताजी को देखा है। उनका मुख मलिन था; बाल खुले हुए थे और वे पर्वत की चोटी से एक ऐसे गंदे गढे में गिर पड़े थे, जिसमें गोबर भरा हुआ था। मैंने उस गोबर के कुण्ड में उन्हें तैरते देखा था। वे अञ्जलि में तेल लेकर पी रहे थे और बारम्बार हँसते हुए-से प्रतीत होते थे। 

'फिर उन्होंने तिल और भात खाया। इसके बाद उनके सारे शरीर में तेल लगाया गया और फिर वे सिर नीचे किये तेल में ही गोते लगाने लगे। स्वप्न में ही मैंने यह भी देखा है कि समुद्र सूख गया, चन्द्रमा पृथ्वी पर गिर पड़े हैं, सारी पृथ्वी उपद्रव से ग्रस्त और अन्धकार से आच्छादित सी हो गयी है । महाराज की सवारी के काम में आने वाले हाथी का दाँत टूक-टूक हो गया है और पहले से प्रज्वलित होती हुई आग सहसा बुझ गयी है।' 

‘मैंने यह भी देखा है कि पृथ्वी फट गयी है, नाना प्रकार के वृक्ष सूख गये हैं तथा पर्वत ढह गये हैं और उनसे धुआँ निकल रहा है। काले लोहे की चौकी पर महाराज दशरथ बैठे हैं। उन्होंने काला ही वस्त्र पहन रखा है और काले एवं पिङ्गलवर्ण की स्त्रियाँ उनके ऊपर प्रहार करती हैं। धर्मात्मा राजा दशरथ लाल रंग के फूलों की माला पहने और लाल चन्दन लगाये गधे जुते हुए रथ पर बैठकर बड़ी तेजी के साथ दक्षिण दिशा की ओर गये हैं।

‘लाल वस्त्र धारण करने वाली एक स्त्री, जो विकराल मुखवाली राक्षसी प्रतीत होती थी, महाराज को हँसती हुई- सी खींचकर लिये जा रही थी। यह दृश्य भी मेरे देखने में आया। इस प्रकार इस भयंकर रात्रि के समय मैंने यह स्वप्न देखा है। इसका फल यह होगा कि मैं, श्रीराम, राजा दशरथ अथवा लक्ष्मण – इनमें से किसी एक की अवश्य मृत्यु होगी।' 

‘जो मनुष्य स्वप्न में गधे जुते हुए रथ से यात्रा करता दिखायी देता है, उसकी चिता का धुआँ शीघ्र ही देखने में आता है। यही कारण है कि मैं दुःखी हो रहा हूँ और आप लोगों की बातों का आदर नहीं करता हूँ। मेरा गला सूखा-सा जा रहा है और मन अस्वस्थ -सा हो चला है। मैं भय का कोई कारण नहीं देखता तो भी भय को प्राप्त हो रहा हूँ। मेरा स्वर बदल गया है तथा मेरी कान्ति भी फीकी पड़ गयी है। मैं अपने आपसे घृणा-सी करने लगा हूँ, परंतु इसका कारण क्या है, यह मेरी समझ में नहीं आता।'

'जिनके विषय में मैंने पहले कभी सोचा तक नहीं था, ऐसे अनेक प्रकार के दुःस्वप्नों को देखकर तथा महाराज का दर्शन इस रूप में क्यों हुआ, जिसकी मेरे मन में कोई कल्पना नहीं थी – यह सोचकर मेरे हृदय से महान् भय दूर नहीं हो रहा है।' 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-६३(63) समाप्त !

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