महर्षि वसिष्ठ जब इस प्रकार इक्ष्वाकुवंश का परिचय दे चुके, तब राजा जनक ने हाथ जोड़कर उनसे कहा - ‘मुनिश्रेष्ठ! आपका भला हो। अब हम भी अपने कुल का परिचय दे रहे हैं, सुनिये। महामते ! कुलीन पुरुष के लिये कन्यादान के समय अपने कुल का पूर्णरूपेण परिचय देना आवश्यक है; अत: आप सुनने की कृपा करें।
‘प्राचीन काल में निमि नामक एक परम धर्मात्मा राजा हुए हैं, जो सम्पूर्ण धैर्यशाली महापुरुषों में श्रेष्ठ तथा अपने पराक्रम से तीनों लोकों में विख्यात थे। उनके मिथि नामक एक पुत्र हुआ। मिथि के पुत्र का नाम जनक हुआ। ये ही हमारे कुल में पहले जनक हुए हैं इन्हीं के नाम पर हमारे वंश का प्रत्येक राजा 'जनक' कहलाता है। जनक से उदावसु का जन्म हुआ।'
‘उदावसु से धर्मात्मा नन्दिवर्धन उत्पन्न हुए। नन्दिवर्धन के शूरवीर पुत्र का नाम सुकेतु हुआ। सुकेतु के भी देवरात नामक पुत्र हुआ। देवरात महान् बलवान् और धर्मात्मा थे। राजर्षि देवरात के बृहद्रथ नाम से प्रसिद्ध एक पुत्र हुआ। बृहद्रथ के पुत्र महावीर हुए, जो शूर और प्रतापी थे। महावीर के सुधृति हुए, जो धैर्यवान् और सत्यपराक्रमी थे।'
'सुधृति के भी धर्मात्मा धृष्टकेतु हुए, जो परम धार्मिक थे। राजर्षि धृष्टकेतु का पुत्र हर्यश्व नाम से विख्यात हुआ। हर्यश्व के पुत्र मरु, मरु के पुत्र प्रतीन्धक तथा प्रतीन्धक के पुत्र धर्मात्मा राजा कीर्तिरथ हुए। कीर्तिरथ के पुत्र देवमीढ नाम से विख्यात हुए। देवमीढ के विबुध और विबुध के पुत्र महीधक हुए। महीध्रक के पुत्र महाबली राजा कीर्तिरात हुए । राजर्षि कीर्तिरात के महारोमा नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। महारोमा से धर्मात्मा स्वर्णरोमा का जन्म हुआ। राजर्षि स्वर्णरोमा से ह्रस्वरोमा उत्पन्न हुए।'
'धर्मज्ञ महात्मा राजा ह्रस्वरोमा के दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनमें ज्येष्ठ तो मैं ही हूँ और कनिष्ठ मेरा छोटा भाई वीर कुशध्वज है। मेरे पिता मुझ ज्येष्ठ पुत्र को राज्य पर अभिषिक्त करके कुशध्वज का सारा भार मुझे सौंपकर वन में चले गये। वृद्ध पिता के स्वर्गगामी हो जाने पर अपने देवतुल्य भाई कुशध्वज को स्नेह - दृष्टि से देखता हुआ मैं इस राज्य का भार धर्म के अनुसार वहन करने लगा।'
‘कुछ काल के अनन्तर पराक्रमी राजा सुधन्वा ने सांकाश्य नगर से आकर मिथिला को चारों ओर से घेर लिया। उसने मेरे पास दूत भेजकर कहलाया कि तुम शिवजी के परम उत्तम धनुष तथा अपनी कमलनयनी कन्या सीता को मुझे सौंप दो। महर्षे! मैंने उसकी माँग पूरी नहीं की। इसलिये मेरे साथ उसका युद्ध हुआ। उस संग्राम में सम्मुख युद्ध करता हुआ राजा सुधन्वा मेरे हाथ से मारा गया।'
'मुनिश्रेष्ठ! राजा सुधन्वा का वध करके मैंने सांकाश्य नगर के राज्य पर अपने शूरवीर भ्राता कुशध्वज को अभिषिक्त कर दिया। महामुने! ये मेरे छोटे भाई कुशध्वज हैं और मैं इनका बड़ा भाई हूँ। मुनिवर ! मैं बड़ी प्रसन्नता के साथ आपको दो बहुएँ प्रदान करता हूँ। आपका भला हो! मैं सीता को श्रीराम के लिये और ऊर्मिला को लक्ष्मण के लिये समर्पित करता हूँ।'
'पराक्रम ही जिसको पाने का शुल्क (शर्त) था, उस देवकन्या के समान सुन्दरी अपनी प्रथम पुत्री सीता को श्रीराम के लिये तथा दूसरी पुत्री ऊर्मिला को लक्ष्मण के लिये दे रहा हूँ। मैं इस बात को तीन बार दुहराता हूँ, इसमें संशय नहीं है। मुनिप्रवर! मैं परम प्रसन्न होकर आपको दो बहुएँ दे रहा हूँ।
वशिष्ठजी से ऐसा कहकर राजा जनक ने महाराज दशरथ से कहा - राजन्! अब आप श्रीराम और लक्ष्मण के मंगल के लिये इनसे गोदान करवाइये, आपका कल्याण हो। नान्दीमुख श्राद्ध का कार्य भी सम्पन्न कीजिये। इसके बाद विवाह का कार्य आरम्भ कीजियेगा। महाबाहो! प्रभो! आज मघा नक्षत्र है। राजन् ! आज के तीसरे दिन उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में वैवाहिक कार्य कीजियेगा। आज श्रीराम और लक्ष्मण के अभ्युदय के लिये गो, भूमि, तिल और सुवर्ण आदि का दान कराना चाहिये; क्योंकि वह भविष्य में सुख देनेवाला होता है।'

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