भाग-५४(54) राजा दशरथ के अनुरोध से वशिष्ठजी का सूर्यवंश का परिचय देते हुए श्रीराम और लक्ष्मण के लिये सीता तथा ऊर्मिला को वरण करना


तदनन्तर जब सवेरा हुआ और राजा जनक महर्षियों के सहयोग से अपना यज्ञ - कार्य सम्पन्न कर चुके, तब वे वाक्य मर्मज्ञ नरेश अपने पुरोहित शतानन्दजी से इस प्रकार बोले – ब्रह्मन्! मेरे महातेजस्वी और पराक्रमी भाई कुशध्वज जो अत्यन्त धर्मात्मा हैं, इस समय इक्षुमती नदी का जल पीते हुए उसके किनारे बसी हुई कल्याणमयी सांकाश्या नगरी में निवास करते हैं। उसके चारों ओर के परकोटों की रक्षा के लिये शत्रुओं के निवारण में समर्थ बड़े-बड़े यन्त्र लगाये गये हैं। वह पुरी पुष्पक विमान के समान विस्तृत तथा पुण्य से उपलब्ध होने वाले स्वर्गलोक के सदृश सुन्दर है। 

'वहाँ रहनेवाले अपने भाई को इस शुभ अवसर पर मैं यहाँ उपस्थित देखना चाहता हूँ; क्योंकि मेरी दृष्टि में वे मेरे इस यज्ञ के संरक्षक हैं। महातेजस्वी कुशध्वज भी मेरे साथ श्रीसीता-राम के विवाह सम्बन्धी इस मंगल समारोह का सुख उठावेंगे।' 

राजा के इस प्रकार कहने पर शतानन्दजी के समीप कुछ धीर स्वभाव के पुरुष आये और राजा जनक ने उन्हें पूर्वोक्त आदेश सुनाया। राजा की आज्ञा से वे श्रेष्ठ दूत तेज चलने वाले घोड़ों पर सवार हो पुरुषसिंह कुशध्वज को बुला लाने के लिये चल दिये। मानो इन्द्र की आज्ञा से उनके दूत भगवान् विष्णु को बुलाने जा रहे हों। 

सांकाश्या में पहुँचकर उन्होंने कुशध्वज से भेंट की और मिथिला का यथार्थ समाचार एवं जनक का अभिप्राय भी निवेदन किया। उन महावेगशाली श्रेष्ठ दूतों के मुख से मिथिला का सारा वृत्तान्त सुनकर राजा कुशध्वज महाराज जनक की आज्ञा के अनुसार मिथिला में आये। वहाँ उन्होंने धर्मवत्सल महात्मा जनक का दर्शन किया। फिर शतानन्दजी तथा अत्यन्त धार्मिक जनक को प्रणाम करके वे राजा के योग्य परम दिव्य सिंहासन पर विराजमान हुए। 

सिंहासन पर बैठे हुए उन दोनों अमित तेजस्वी वीरबन्धुओं ने मन्त्रिप्रवर सुदामन को भेजा और कहा - मन्त्रिवर! आप शीघ्र ही अमित तेजस्वी इक्ष्वाकुकुलभूषण महाराज दशरथ के पास जाइये और पुत्रों तथा मन्त्रियों सहित उन दुर्जय नरेश को यहाँ बुला लाइये। 

आज्ञा पाकर मन्त्री सुदामन महाराज दशरथ के खेमे में जाकर रघुकुल की कीर्ति बढ़ाने वाले उन नरेश से मिले और मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम करने के पश्चात् इस प्रकार बोले - वीर अयोध्या नरेश! मिथिलापति विदेहराज जनक इस समय उपाध्याय और पुरोहित सहित आपका दर्शन करना चाहते हैं। 

मन्त्रिवर सुदामन की बात सुनकर राजा दशरथ ऋषियों और बन्धु बान्धवों के साथ उस स्थान पर गये जहाँ राजा जनक विद्यमान थे। 

मन्त्री, उपाध्याय और भाई-बन्धुओं सहित राजा दशरथ, जो बोलने की कला जानने वाले विद्वानों में श्रेष्ठ थे, विदेहराज जनक से इस प्रकार बोले - महाराज! आपको तो विदित ही होगा कि इक्ष्वाकुकुल के देवता ये महर्षि वशिष्ठजी हैं। हमारे यहाँ सभी कार्यों में ये भगवान् वशिष्ठ मुनि ही कर्तव्य का उपदेश करते हैं और इन्हीं की आज्ञा का पालन किया जाता है। यदि सम्पूर्ण महर्षियों सहित विश्वामित्रजी की आज्ञा हो तो ये धर्मात्मा वशिष्ठ ही पहले मेरी कुल परम्परा का क्रमश: परिचय देंगे।' 

यों कहकर जब राजा दशरथ चुप हो गये, तब वाक्यवेत्ता भगवान् वशिष्ठ मुनि पुरोहित सहित विदेहराज से इस प्रकार बोले – ब्रह्माजी की उत्पत्ति का कारण अव्यक्त है - ये स्वयम्भू हैं। नित्य, शाश्वत और अविनाशी हैं। उनसे मरीचि की उत्पत्ति हुई। मरीचि के पुत्र कश्यप हैं, कश्यप से विवस्वान (भगवन सूर्य) का और विवस्वान से वैवस्वत मनु का जन्म हुआ। मनु पहले प्रजापति थे, उनसे इक्ष्वाकु नामक पुत्र हुआ। उन इक्ष्वाकु को ही आप अयोध्या के प्रथम राजा समझें। 

‘इक्ष्वाकु के पुत्र का नाम कुक्षि था। वे बड़े तेजस्वी थे। कुक्षि से विकुक्षि नामक कान्तिमान् पुत्र का जन्म हुआ। विकुक्षि के पुत्र महातेजस्वी और प्रतापी बाण हुए। बाण के पुत्र का नाम अनरण्य था। वे भी बड़े तेजस्वी और प्रतापी थे। अनरण्य से पृथु और पृथु से त्रिशंकु (राजा सत्यव्रत) का जन्म हुआ। त्रिशंकु के पुत्र महायशस्वी राजा हरिश्चंद्र थे।' 

‘हरिश्चंद्र से महातेजस्वी महारथी रोहित और रोहित से धुन्धुमार तथा धुन्धुमार से युवनाश्व का जन्म हुआ। युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए, जो समस्त भूमण्डल के स्वामी थे। मान्धाता से सुसन्धि नामक कान्तिमान् पुत्र का जन्म हुआ। सुसन्धि के भी दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि और प्रसेनजित्। ध्रुवसन्धि से भरत नामक यशस्वी पुत्र का जन्म हुआ। भरत से महातेजस्वी असित की उत्पत्ति हुई। राजा असित के साथ हैहय, तालजङ्घ और शशबिन्दु — इन तीन राजवंशों के लोग शत्रुता रखने लगे थे।'  

'युद्ध में इन तीनों शत्रुओं का सामना करते हुए राजा असित प्रवासी हो गये। वे अपनी दो रानियों के साथ हिमालय पर आकर रहने लगे। राजा असित के पास बहुत थोड़ी सेना शेष रह गयी थी। वे हिमालय पर ही मृत्यु को प्राप्त हो गये। उस समय उनकी दोनों रानियाँ गर्भवती थीं, ऐसा सुना गया है। उनमें से एक रानी ने अपनी सौतका गर्भ नष्ट करने के लिये उसे विषयुक्त भोजन दे दिया।' 

'उस समय उस रमणीय एवं श्रेष्ठ पर्वत पर भृगुकुल में उत्पन्न हुए महामुनि च्यवन तपस्या में लगे हुए थे। हिमालय पर ही उनका आश्रम था। उन दोनों रानियों में से एक (जिसे जहर दिया गया था) कालिन्दी नाम से प्रसिद्ध थी। विकसित कमल दल के समान नेत्रोंवाली महाभागा कालिन्दी एक उत्तम पुत्र पाने की इच्छा रखती थी। उसने देवतुल्य तेजस्वी भृगुनन्दन च्यवन के पास जाकर उन्हें प्रणाम किया।' 

उस समय ब्रह्मर्षि च्यवन ने पुत्र की अभिलाषा रखने वाली कालिन्दी से पुत्र जन्म के विषय में कहा - महाभागे ! तुम्हारे उदर में एक महान् बलवान्, महातेजस्वी और महापराक्रमी उत्तम पुत्र है, वह कान्तिमान् बालक थोड़े ही दिनों में गरल (जहर) के साथ उत्पन्न होगा। अतः कमल लोचने! तुम पुत्र के लिये चिन्ता न करो। 

'वह विधवा राजकुमारी कालिन्दी बड़ी पतिव्रता थी। महर्षि च्यवन को नमस्कार करके वह देवी अपने आश्रम पर लौट आयी। फिर समय आने पर उसने एक पुत्र को जन्म दिया। उसकी सौत ने उसके गर्भ को नष्ट कर देने के लिये जो गरल (विष) दिया था, उसके साथ ही उत्पन्न होने के कारण वह राजकुमार 'सगर' नाम से विख्यात हुआ।' 

‘सगर के पुत्र असमंज और असमंज के पुत्र अंशुमान् हुए। अंशुमान के पुत्र दिलीप और दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए। भगीरथ से ककुत्स्थ और ककुत्स्थ से रघुका जन्म हुआ। रघु के तेजस्वी पुत्र प्रवृद्ध हुए, जो शाप से राक्षस हो गये थे। वे ही कल्माषपाद नाम से भी प्रसिद्ध हुए थे। उनसे शङ्खण नामक पुत्र का जन्म हुआ था। शङ्खण के पुत्र सुदर्शन और सुदर्शन के अग्निवर्ण हुए।' 

‘अग्निवर्ण के शीघ्रग और शीघ्रग के पुत्र मरु थे। मरु से प्रशुश्रुक और प्रशुश्रुक से अम्बरीष की उत्पत्ति हुई। अम्बरीष के पुत्र राजा नहुष हुए। नहुष के ययाति और ययाति के पुत्र नाभाग थे। नाभाग के अज हुए। अज से दशरथ का जन्म हुआ। इन्हीं महाराज दशरथ से ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण उत्पन्न हुए हैं।' 

‘इक्ष्वाकुकुल में उत्पन्न हुए राजाओं का वंश आदिकाल से ही शुद्ध रहा है। ये सब-के-सब परम धर्मात्मा, वीर और सत्यवादी होते आये हैं। नरश्रेष्ठ! नरेश्वर! इसी इक्ष्वाकुकुल में उत्पन्न हुए श्रीराम और लक्ष्मण के लिये मैं आपकी दो कन्याओं का वरण करता हूँ। श्रीराम के लिए सीता और लक्ष्मण के लिए उर्मिला। ये आपकी कन्याओं के योग्य हैं और आपकी कन्याएँ इनके योग्य। अत: आप इन्हें कन्यादान करें।  

इति श्रीमद् राम कथा बालकाण्ड अध्याय-५ का भाग-५४(54) समाप्त !

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