भाग-३९(39) राजा जनक का विश्वामित्र और राम-लक्ष्मण का सत्कार करके उन्हें अपने यहाँ रखे हुए धनुष का परिचय देना

 


शतानन्दजी कहते हैं - श्रीराम! इस प्रकार उत्तम ब्राह्मणत्व प्राप्त करके धर्मात्मा विश्वामित्रजी ने भी मन्त्र जप करने वालों में श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि वशिष्ठ का पूजन किया। इस तरह अपना मनोरथ सफल करके तपस्या में लगे रहकर ही ये सम्पूर्ण पृथ्वी पर विचरने लगे। श्रीराम ! इस प्रकार कठोर तपस्या करके इन महात्मा ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया। रघुनन्दन! ये विश्वामित्रजी समस्त मुनियों में श्रेष्ठ हैं, ये तपस्या के मूर्तिमान् स्वरूप हैं, उत्तम धर्म के साक्षात् विग्रह हैं और पराक्रम की परम निधि हैं। 

ऐसा कहकर महातेजस्वी विप्रवर शतानन्दजी चुप हो गये। शतानन्दजी के मुख से यह कथा सुनकर महाराज जनक ने श्रीराम और लक्ष्मण के समीप विश्वामित्रजी से हाथ जोड़कर कहा - मुनिप्रवर कौशिक ! आप ककुत्स्थकुलनन्दन श्रीराम और लक्ष्मण के साथ मेरे यज्ञ में पधारे, इससे मैं धन्य हो गया। आपने मुझ पर बड़ी कृपा की। महामुने! ब्रह्मन् ! आपने दर्शन देकर मुझे पवित्र कर दिया।

‘आपके दर्शन से मुझे बड़ा लाभ हुआ, अनेक प्रकार के गुण उपलब्ध हुए। ब्रह्मन्! आज इस सभा में आकर मैंने महात्मा राम तथा अन्य सदस्यों के साथ आपके महान् तेज (प्रभाव ) का वर्णन सुना है, बहुत से गुण सुने हैं। ब्रह्मन् ! शतानन्दजी ने आपके महान् तप का वृत्तान्त विस्तारपूर्वक बताया है।' 

‘कुशिकनन्दन! आपकी तपस्या अप्रमेय है, आपका बल अनन्त है तथा आपके गुण भी सदा ही माप और संख्या से परे हैं। प्रभो! आपकी आश्चर्यमयी कथाओं के श्रवण से मुझे तृप्ति नहीं होती है; किंतु मुनिश्रेष्ठ! यज्ञ का समय हो गया है, सूर्यदेव ढलने लगे हैं। जप करनेवालों में श्रेष्ठ महातेजस्वी मुने! आपका स्वागत है। कल प्रातःकाल फिर मुझे दर्शन दें, इस समय मुझे जाने की आज्ञा प्रदान करें।' 

राजा के ऐसा कहने पर मुनिवर विश्वामित्रजी मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रीतियुक्त नरश्रेष्ठ राजा जनक की प्रशंसा करके शीघ्र ही उन्हें विदा कर दिया। उस समय मिथिला पति विदेहराज जनक ने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र से पूर्वोक्त बात कहकर अपने उपाध्याय और बन्धु-बान्धवों के साथ उनकी शीघ्र ही परिक्रमा की। फिर वहाँ से वे चल दिये। तत्पश्चात् धर्मात्मा विश्वामित्र भी महात्माओं से पूजित होकर श्रीराम और लक्ष्मण के साथ अपने विश्राम- स्थान पर लौट आये। 

तदनन्तर दूसरे दिन निर्मल प्रभात काल आने पर धर्मात्मा राजा जनक ने अपना नित्य नियम पूरा करके श्रीराम और लक्ष्मण सहित महात्मा विश्वामित्रजी को बुलाया और शास्त्रीय विधि के अनुसार मुनि तथा उन दोनों महामनस्वी राजकुमारों का पूजन करके इस प्रकार कहा - भगवन्! आपका स्वागत है। निष्पाप महर्षे! आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ; क्योंकि मैं आपका आज्ञापालक हूँ। 

महात्मा जनक के ऐसा कहने पर बोलने में कुशल धर्मात्मा मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र ने उनसे यह बात कही -  महाराज! राजा दशरथ के ये दोनों पुत्र विश्वविख्यात क्षत्रिय वीर हैं और आपके यहाँ जो यह श्रेष्ठ धनुष रखा है, उसे देखने की इच्छा रखते हैं। आपका कल्याण हो, वह धनुष इन्हें दिखा दीजिये। इससे इनकी इच्छा पूरी हो जायेगी। फिर ये दोनों राजकुमार उस धनुष के दर्शनमात्र से संतुष्ट हो इच्छानुसार अपनी राजधानी को लौट जायेंगे। 

मुनि के ऐसा कहने पर राजा जनक महामुनि विश्वामित्र से बोले – मुनिवर ! इस धनुष का वृत्तान्त सुनिये। जिस उद्देश्य से यह धनुष यहाँ रखा गया, वह सब बताता हूँ। भगवन्! निमि के ज्येष्ठ पुत्र राजा देवरात के नाम से विख्यात थे। उन्हीं महात्मा के हाथ में यह धनुष धरोहर के रूप में दिया गया था। कहते हैं, पूर्वकाल में दक्षयज्ञ - विध्वंस के समय तथा अपनी पत्नी सती के आत्मदाह से परम पराक्रमी भगवान् शङ्कर ने खेल-खेल में ही रोषपूर्वक इस धनुष को उठाकर यज्ञ-विध्वंस के पश्चात् देवताओं से कहा – देवगण! मैं यज्ञ में भाग प्राप्त करना चाहता था, किंतु तुम लोगों ने नहीं दिया। इसलिये इस धनुष से मैं तुम सब लोगों के परम पूजनीय श्रेष्ठ अंग – मस्तक काट डालूँगा। 

'मुनिश्रेष्ठ ! यह सुनकर सम्पूर्ण देवता उदास हो गये और स्तुति के द्वारा देवाधिदेव महादेवजी को प्रसन्न करने लगे। अन्त में उन पर भगवान् शिव प्रसन्न हो गये। प्रसन्न होकर उन्होंने उन सब महामनस्वी देवताओं को यह धनुष अर्पण कर दिया। वही यह देवाधिदेव महात्मा भगवान् शङ्कर का धनुष रत्न है, जो मेरे पूर्वज महाराज देवरात के पास धरोहर के रूप में रखा गया था।' 

'एक दिन मैं यज्ञ के लिये भूमि शोधन करते समय खेत में हल चला रहा था। उसी समय हल के अग्रभाग से जोती भूमि (हराई या सीता) से एक कन्या प्रकट हुई। सीता (हलद्वारा खींची गयी रेखा) से उत्पन्न होने के कारण उसका नाम सीता रखा गया। पृथ्वी से प्रकट हुई वह मेरी कन्या क्रमशः बढ़कर सयानी हुई। उन्ही दिनों एक बार मैं अपनी सहधर्मिणी रानी सुनयना के साथ सदा की भांति इस धनुष का विधिवत पूजन करने के लिए आया। आकर हम दोनों ने अपने मंत्रियों सहित वहां जो देखा उस पर हमे विश्वास नहीं हुआ।'

'जिस धनुष को बड़े-से-बड़ा शूरवीर भी उठाने में असमर्थ है तथा जिससे पहिये के रथ के सहारे एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाया जाता है उस धनुष को मेरी पुत्री सीता ने खेल ही खेल में इस प्रकार उठा रखा था जैसे कोई बालक अपने किसी खिलौने की सफाई के लिए उसे उठता है।     

इसके इस पराक्रम को देखकर अपनी इस अयोनिजा कन्या के विषय में मैंने यह निश्चय किया कि जो अपने पराक्रम से इस धनुष को चढ़ा देगा, उसी के साथ मैं इसका ब्याह करूँगा।' 

'इस तरह इसे वीर्यशुल्का (पराक्रमरूप शुल्कवाली) बनाकर अपने घर में रख छोड़ा है। मुनिश्रेष्ठ ! भूतल से प्रकट होकर दिनों-दिन बढ़ने वाली मेरी पुत्री सीता को लंकापति रावण और बाणासुर सहित कई राजाओं ने यहाँ आकर माँगा। परंतु भगवन्! कन्या॒ का वरण करने वाले उन सभी राजाओं को मैंने यह बता दिया कि मेरी कन्या वीर्यशुल्का है। उचित पराक्रम प्रकट करने पर ही कोई पुरुष उसके साथ विवाह करने का अधिकारी हो सकता है। यही कारण है कि मैंने आज तक किसी को अपनी कन्या नहीं दी।' 

'मुनिपुंगव! तब सभी राजा मिलकर मिथिला में आये और पूछने लगे कि राजकुमारी सीता को प्राप्त करने के लिये कौन-सा पराक्रम निश्चित किया गया है। मैंने पराक्रम की जिज्ञासा करनेवाले उन राजाओं के सामने यह शिवजी का धनुष रख दिया; परंतु वे लोग इसे उठाने या हिलाने में भी समर्थ न हो सके। महामुने! उन पराक्रमी नरेशों की शक्ति बहुत थोड़ी जानकर मैंने उन्हें कन्या देने से इनकार कर दिया। तपोधन! इसके बाद जो घटना घटी, उसे भी आप सुन लीजिये। 

‘मुनिप्रवर! मेरे इनकार करने पर ये सब राजा अत्यन्त कुपित हो उठे और अपने पराक्रम के विषय में संशयापन्न हो मिथिला को चारों ओर से घेरकर खड़े हो गये। मेरे द्वारा अपना तिरस्कार हुआ मानकर उन श्रेष्ठ नरेशों ने अत्यन्त रुष्ट हो मिथिलापुरी को सब ओर से पीड़ा देना प्रारम्भ कर दिया। मुनिश्रेष्ठ! पूरे एक वर्ष तक वे घेरा डाले रहे। इस बीच में युद्ध के सारे साधन क्षीण हो गये। इससे मुझे बड़ा दु:ख हुआ। तब मैंने तपस्या के द्वारा समस्त देवताओं को प्रसन्न करने की चेष्टा की। देवता बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने मुझे चतुरंगिणी सेना प्रदान की।' 

‘फिर तो हमारे सैनिकों की मार खाकर वे सभी पापाचारी राजा, जो बलहीन थे अथवा जिनके बलवान् होने में संदेह था, मन्त्रियों सहित भागकर विभिन्न दिशाओं में चले गये। इसके उपरांत मैंने यह निश्चय किया कि अपनी पुत्री सीता के उचित वर के चुनाव के लिए एक स्वयंवर का आयोजन करूँ। जिसमे मेरे द्वारा निमंत्रित वे सभी शौर्य और पराक्रमशाली राजा मिथिला में पधारकर इस धनुष को उठाकर उसपर प्रत्यंचा चढ़ाये।'  

‘मुनिश्रेष्ठ! यही वह परम प्रकाशमान धनुष है। उत्तम व्रत का पालन करनेवाले महर्षे! मैं उसे श्रीराम और लक्ष्मण को भी दिखाऊँगा। 

जनककी यह बात सुनकर महामुनि विश्वामित्र बोले - राजन्! आप श्रीराम को अपना धनुष दिखाइये। 

तब राजा जनक ने मन्त्रियों को आज्ञा दी - चन्दन और मालाओं से सुशोभित वह दिव्य धनुष यहाँ ले आओ। 

राजा जनक की आज्ञा पाकर वे अमित तेजस्वी मन्त्री नगर में गये और उस धनुष को आगे करके पुरी से बाहर निकले। वह धनुष आठ पहियों वाली लोहे की बहुत बड़ी संदूक में रखा गया था। उसे मोटे-ताजे पाँच हजार महामनस्वी वीर किसी तरह ठेलकर वहाँ तक ला सके। 

लोहे की वह संदूक, जिसमें धनुष रखा गया था, लाकर उन मन्त्रियों ने देवोपम राजा जनक से कहा- राजन्! मिथिलापते! राजेन्द्र ! यह समस्त राजाओं द्वारा सम्मानित श्रेष्ठ धनुष है। यदि आप इन दोनों राजकुमारों को दिखाना चाहते हैं तो दिखाइये। 

उनकी बात सुनकर राजा जनक ने हाथ जोड़कर महात्मा विश्वामित्र तथा दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण से कहा - ब्रह्मन्! यही वह श्रेष्ठ धनुष है, जिसका जनक वंशी नरेशों ने सदा ही पूजन किया है तथा जो इसे उठाने में समर्थ न हो सके, उन महापराक्रमी नरेशों ने भी इसका पूर्वकाल में सम्मान किया है। इसे समस्त देवता, असुर, राक्षस, गन्धर्व, बड़े-बड़े यक्ष, किन्नर और महानाग भी नहीं चढ़ा सके हैं। फिर इस धनुष को खींचने, चढ़ाने, इस पर बाण संधान करने, इसकी प्रत्यञ्चा पर टङ्कार देने तथा इसे उठाकर इधर-उधर हिलाने में मनुष्यों की कहाँ शक्ति है ? मुनिप्रवर! यह श्रेष्ठ धनुष यहाँ लाया गया है। महाभाग ! आप इसे इन दोनों राजकुमारों को दिखाइये।  

श्रीराम सहित विश्वामित्र ने जनक का वह कथन सुनकर रघुनन्दन से कहा - वत्स राम! इस धनुष को देखो। 

महर्षि की आज्ञा से श्रीराम ने जिसमें वह धनुष था उस संदूक को खोलकर उस धनुष को देखा तथा लक्ष्मण सहित उसे इस प्रकार नमन किया मानो साक्षात् महादेव को। इस प्रकार धनुष के दर्शन कर विश्वामित्र सहित श्रीराम और लक्ष्मण अपने स्थान को चले गए जहाँ वे रुके थे।  

इति श्रीमद् राम कथा बालकाण्ड अध्याय-५ का भाग-३९(39) समाप्त !

No comments:

Post a Comment

रामायण: एक परिचय

रामायण संस्कृत के रामायणम् का हिंदी रूपांतरण है जिसका शाब्दिक अर्थ है राम की जीवन यात्रा। रामायण और महाभारत दोनों सनातन संस्कृति के सबसे प्र...