भाग-३८(38) राजा जनक द्वारा विश्वामित्र का सत्कार तथा उनका श्रीराम और लक्ष्मण के विषय में जिज्ञासा करना एवं परिचय पाना

 


श्री रामजी ने जब जनकपुर की शोभा देखी, तब वे छोटे भाई लक्ष्मण सहित अत्यन्त हर्षित हुए। वहाँ अनेकों बावलियाँ, कुएँ, नदी और तालाब हैं, जिनमें अमृत के समान जल है और मणियों की सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। मकरंद रस से मतवाले होकर भौंरे सुंदर गुंजार कर रहे हैं। रंग-बिरंगे बहुत से पक्षी मधुर शब्द कर रहे हैं। रंग-रंग के कमल खिले हैं। सदा सब ऋतुओं में सुख देने वाला शीतल, मंद, सुगंध पवन बह रहा है। 

पुष्प वाटिका (फुलवारी), बाग और वन, जिनमें बहुत से पक्षियों का निवास है, फूलते, फलते और सुंदर पत्तों से लदे हुए नगर के चारों ओर सुशोभित हैं। नगर की सुंदरता का वर्णन करते नहीं बनता। मन जहाँ जाता है, वहीं लुभा जाता (रम जाता) है। सुंदर बाजार है, मणियों से बने हुए विचित्र छज्जे हैं, मानो ब्रह्मा ने उन्हें अपने हाथों से बनाया है। कुबेर के समान श्रेष्ठ धनी व्यापारी सब प्रकार की अनेक वस्तुएँ लेकर (दुकानों में) बैठे हैं। सुंदर चौराहे और सुहावनी गलियाँ सदा सुगंध से सिंची रहती हैं। 

सबके घर मंगलमय हैं और उन पर चित्र कढ़े हुए हैं, जिन्हें मानो कामदेव रूपी चित्रकार ने अंकित किया है। नगर के (सभी) स्त्री-पुरुष सुंदर, पवित्र, साधु स्वभाव वाले, धर्मात्मा, ज्ञानी और गुणवान हैं। जहाँ जनकजी का अत्यन्त अनुपम सुंदर निवास स्थान (महल) है, वहाँ के विलास (ऐश्वर्य) को देखकर देवता भी थकित (स्तम्भित) हो जाते हैं मनुष्यों की तो बात ही क्या ! कोट (राजमहल के परकोटे) को देखकर चित्त चकित हो जाता है, ऐसा मालूम होता है मानो उसने समस्त लोकों की शोभा को रोक (घेर) रखा है। 

उज्ज्वल महलों में अनेक प्रकार के सुंदर रीति से बने हुए मणि जटित सोने की जरी के परदे लगे हैं। सीताजी के रहने के सुंदर महल की शोभा का वर्णन किया ही कैसे जा सकता है। राजमहल के सब दरवाजे फाटक सुंदर हैं, जिनमें वज्र के मजबूत अथवा हीरों के चमकते हुए किवाड़ लगे हैं। वहाँ (मातहत) राजाओं, नटों, मागधों और भाटों की भीड़ लगी रहती है। घोड़ों और हाथियों के लिए बहुत बड़ी-बड़ी घुड़सालें और गजशालाएँ (फीलखाने) बनी हुई हैं, जो सब समय घोड़े, हाथी और रथों से भरी रहती हैं। बहुत से शूरवीर, मंत्री और सेनापति हैं। उन सबके घर भी राजमहल सरीखे ही हैं। नगर के बाहर तालाब और नदी के निकट जहाँ-तहाँ बहुत से राजा लोग उतरे हुए (डेरा डाले हुए) हैं। 

तदनन्तर लक्ष्मण सहित श्रीराम विश्वामित्रजी को आगे करके महर्षि गौतम के आश्रम से ईशान कोण की ओर चले और मिथिला नरेश के यज्ञमण्डप में जा पहुँचे। वहाँ लक्ष्मण सहित श्रीराम ने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र से कहा - महाभाग ! महात्मा जनक के यज्ञ का समारोह तो बड़ा सुन्दर दिखायी दे रहा है। यहाँ नाना देशों के निवासी सहस्रों ब्राह्मण जुटे हुए हैं, जो वेदों के स्वाध्याय से शोभा पा रहे हैं। ऋषियों के बाड़े सैकड़ों छकड़ों से भरे दिखायी दे रहे हैं। ब्रह्मन् ! अब ऐसा कोई स्थान निश्चित कीजिये, जहाँ हमलोग भी ठहरें। 

श्रीरामचन्द्रजी का यह वचन सुनकर महामुनि विश्वामित्र ने एकान्त स्थान में डेरा डाला, जहाँ पानी का सुभीता था। अनिन्द्य (उत्तम) आचार-विचार वाले नृपश्रेष्ठ महाराज जनक ने जब सुना कि विश्वामित्रजी पधारे हैं, तब वे तुरंत अपने पुरोहित शतानन्द को आगे करके अर्घ्य लिये विनीतभाव से उनका स्वागत करने को चल दिये। 

उनके साथ अर्घ्य लिये महात्मा ऋत्विज् भी शीघ्रतापूर्वक चले। राजा ने विनीतभाव से सहसा आगे बढ़कर महर्षि की अगवानी की तथा धर्मशास्त्र के अनुसार विश्वामित्र को धर्मयुक्त अर्घ्य समर्पित किया। महात्मा राजा जनक की वह पूजा ग्रहण करके मुनि ने उनका कुशल- समाचार पूछा तथा उनके यज्ञ की निर्बाध स्थिति के विषय में जिज्ञासा की। राजा के साथ जो मुनि, उपाध्याय और पुरोहित आये थे, उनसे भी कुशल-मंगल पूछकर विश्वामित्रजी बड़े हर्ष साथ उन सभी महर्षियों से यथायोग्य मिले। 

इसके बाद राजा जनक ने मुनिवर विश्वामित्र से हाथ जोड़कर कहा – भगवन्! आप इन मुनीश्वरों के साथ आसन पर विराजमान होइये। यह बात सुनकर महामुनि विश्वामित्र आसन पर बैठ गये। फिर पुरोहित, ऋत्विज् तथा मन्त्रियों सहित राजा भी सब ओर यथायोग्य आसनों पर विराजमान हो गये। 

तत्पश्चात् राजा जनक ने विश्वामित्रजी की ओर देखकर कहा - भगवन्! आज देवताओं ने मेरे यज्ञ की आयोजना सफल कर दी। आज पूज्य चरणों के दर्शन से मैंने यज्ञ का फल पा लिया। ब्रह्मन् ! आप मुनियों में श्रेष्ठ हैं। आपने इतने महर्षियों के साथ मेरे यज्ञमण्डप में पदार्पण किया, इससे मैं धन्य हो गया। यह मेरे ऊपर आपका बहुत बड़ा अनुग्रह है।ब्रह्मर्षे! मनीषी ऋत्विजों का कहना है कि मेरी यज्ञदीक्षा के बारह दिन ही शेष रह गये हैं। अत: कुशिकनन्दन! बारह दिनों के बाद यहाँ भाग ग्रहण करने के लिये आये हुए देवताओं का दर्शन कीजियेगा। 

सुकुमार किशोर अवस्था वाले श्याम और गौर वर्ण के दोनों कुमार नेत्रों को सुख देने वाले और सारे विश्व के चित्त को चुराने वाले हैं। जब रघुनाथजी आए तब सभी उनके रूप एवं तेज से प्रभावित होकर उठकर खड़े हो गए। विश्वामित्रजी ने उनको अपने पास बैठा लिया। दोनों भाइयों को देखकर सभी सुखी हुए। सबके नेत्रों में जल भर आया आनंद और प्रेम के आँसू उमड़ पड़े और शरीर रोमांचित हो उठे। रामजी की मधुर मनोहर मूर्ति को देखकर विदेह (जनक) विशेष रूप से विदेह (देह की सुध-बुध से रहित) हो गए

मन को प्रेम में मग्न जान राजा जनक ने विवेक का आश्रय लेकर धीरज धारण किया और मुनि के चरणों में सिर नवाकर गद्‍गद्‍ (प्रेमभरी) गंभीर वाणी से कहा - हे नाथ! कहिए, ये दोनों सुंदर बालक मुनिकुल के आभूषण हैं या किसी राजवंश के पालक? अथवा जिसका वेदों ने 'नेति' कहकर गान किया है कहीं वह ब्रह्म तो युगल रूप धरकर नहीं आया है? मेरा मन जो स्वभाव से ही वैराग्य रूप बना हुआ है, इन्हें देखकर इस तरह मुग्ध हो रहा है, जैसे चन्द्रमा को देखकर चकोर। हे प्रभो! इसलिए मैं आपसे सत्य (निश्छल) भाव से पूछता हूँ। हे नाथ! बताइए, छिपाव न कीजिए। इनको देखते ही अत्यन्त प्रेम के वश होकर मेरे मन ने जबर्दस्ती ब्रह्मसुख को त्याग दिया है। 

महात्मा जनक का यह प्रश्न सुनकर अमित आत्मबल से सम्पन्न विश्वामित्रजी ने कहा - राजन् ! ये दोनों महाराज दशरथ के पुत्र हैं। जगत में जहाँ तक जितने भी प्राणी हैं, ये सभी को प्रिय हैं। ये राम और लक्ष्मण दोनों श्रेष्ठ भाई रूप, शील और बल के धाम हैं। सारा जगत इस बात का साक्षी है कि इन्होंने युद्ध में असुरों को जीतकर मेरे यज्ञ की रक्षा की है। 

इसके बाद उन्होंने उन दोनों के सिद्धाश्रम में निवास, राक्षसों के वध, बिना किसी घबराहट के मिथिला तक आगमन, विशालापुरी के दर्शन, अहिल्या के साक्षात्कार तथा महर्षि गौतम के साथ समागम आदि का विस्तारपूर्वक वर्णन किया। फिर अन्त में यह भी बताया कि ये आपके यहाँ रखे हुए महान् धनुष के सम्बन्ध में कुछ जानने की इच्छा से यहाँ तक आये हैं। 

महात्मा राजा जनक से ये सब बातें निवेदन करके महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र चुप हो गये। 

परम बुद्धिमान् विश्वामित्रजी की वह बात सुनकर महातेजस्वी महातपस्वी शतानन्दजी के शरीर में रोमाञ्च हो आया। वे गौतम ऋषि के ज्येष्ठ पुत्र थे। तपस्या से उनकी कान्ति प्रकाशित हो रही थी। वे श्रीरामचन्द्रजी के दर्शनमात्र से ही बड़े विस्मित हुए। 

उन दोनों राजकुमारों को सुखपूर्वक बैठे देख शतानन्द ने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रजी से पूछा – मुनिप्रवर! मेरी यशस्विनी माता अहिल्या बहुत दिनों से तपस्या कर रही थीं। क्या आपने राजकुमार श्रीराम को उनका दर्शन कराया? क्या मेरी महातेजस्विनी एवं यशस्विनी माता अहिल्या ने वन में होनेवाले फल-फूल आदि से समस्त देहधारियों के लिये पूजनीय श्रीरामचन्द्रजी का पूजन (आदर-सत्कार) किया था? 

‘महातेजस्वी मुने! क्या आपने श्रीराम से वह प्राचीन वृत्तान्त कहा था, जो मेरी माता के प्रति देवराज इन्द्र द्वारा किये गये छल-कपट एवं दुराचार द्वारा घटित हुआ था? मुनिश्रेष्ठ कौशिक! आपका कल्याण हो। क्या श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन आदि के प्रभाव से मेरी माता शापमुक्त हो पिताजी से जा मिलीं? कुशिकनन्दन ! क्या मेरे पिता ने श्रीराम का पूजन किया था? क्या उन महात्मा की पूजा ग्रहण करके ये महातेजस्वी श्रीराम यहाँ पधारे हैं? विश्वामित्रजी ! क्या यहाँ आकर मेरे माता-पिता द्वारा सम्मानित हुए श्रीराम ने मेरे पूज्य पिता का शान्त चित्त से अभिवादन किया था?' 

शतानन्द का यह प्रश्न सुनकर बोलने की कला जाननेवाले महामुनि विश्वामित्र ने बातचीत करने में कुशल शतानन्द को इस प्रकार उत्तर दिया - मुनिश्रेष्ठ! मैंने कुछ उठा नहीं रखा है। मेरा जो कर्तव्य था, उसे मैंने पूरा किया। महर्षि गौतम से उनकी पत्नी अहिल्या उसी प्रकार जा मिली हैं, जैसे भृगुवंशी जमदग्नि से रेणुका मिली है। 

बुद्धिमान् विश्वामित्र की यह बात सुनकर महातेजस्वी शतानन्द ने श्रीरामचन्द्रजी से यह बात कही - नरश्रेष्ठ! आपका स्वागत है। रघुनन्दन ! मेरा अहोभाग्य जो आपने किसी से पराजित न होनेवाले महर्षि विश्वामित्र को आगे करके यहाँ तक पधारने का कष्ट उठाया। महर्षि विश्वामित्र के कर्म अचिन्त्य हैं। ये तपस्या से ब्रह्मर्षिपद को प्राप्त हुए हैं। इनकी कान्ति असीम है और ये महातेजस्वी हैं। मैं इनको जानता हूँ। ये जगत के परम आश्रय (हितैषी) हैं। 

‘श्रीराम! इस पृथ्वीपर आपसे बढ़कर धन्यातिधन्य पुरुष दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि कुशिकनन्दन विश्वामित्र आपके रक्षक हैं, जिन्होंने बड़ी भारी तपस्या की है। ये महान गायत्री मंत्र के रचियता हैं। मैं महात्मा कौशिक के बल और स्वरूप का यथार्थ वर्णन करता हूँ। आप ध्यान देकर मुझसे यह सब सुनिये।' 

नोट : इसके बाद शतानंदजी ने विस्तार से महर्षि विश्वामित्र के महान शौर्य और तप की गाथा लक्ष्मण सहित श्रीराम को सुनाना प्रारम्भ किया। चूँकि श्रीमद् राम कथा के अध्याय-२(2) वंश चरित्र के भाग-२२(22) से ३१(31) तक इसका पहले ही वर्णन किया जा चूका है अतः उसे यहाँ नहीं बताया जा रहा है। यदि आपने उसे नहीं पढ़ा है तो blog में दी गयी लिस्ट में जाकर पढ़ सकते हैं। 

इति श्रीमद् राम कथा बालकाण्ड अध्याय-५ का भाग-३८(38) समाप्त !

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