भाग-३६(36) श्रीराम का मिथिलापुरी में पहुँचना और वहाँ सूने आश्रम के विषय में पूछने पर विश्वामित्रजी का उनसे अहिल्या को शाप प्राप्त होने की कथा सुनाना

 


वहाँ परस्पर समागम के समय एक-दूसरे का कुशल-मंगल पूछकर बातचीत के अन्त में राजा सुमति ने महामुनि विश्वामित्र से कहा - ब्रह्मन्! आपका कल्याण हो। ये दोनों कुमार देवताओं के तुल्य पराक्रमी जान पड़ते हैं। इनकी चाल-ढाल हाथी और सिंह की गति के समान है। ये दोनों वीर सिंह और साँड़ के समान प्रतीत होते हैं। इनके बड़े-बड़े नेत्र विकसित कमलदल के समान शोभा पाते हैं। ये दोनों तलवार, तरकस और धनुष धारण किये हुए हैं। अपने सुन्दर रूपके द्वारा दोनों अश्विनीकुमारों को लज्जित करते हैं तथा युवावस्था के निकट आ पहुँचे हैं। 

‘इन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता है, मानो दो देवकुमार दैवेच्छावश देवलोक से पृथ्वी पर आ गये हों। मुने! ये दोनों किसके पुत्र हैं और कैसे, किसलिये यहाँ पैदल ही आये हैं? जैसे चन्द्रमा और सूर्य आकाश की शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार ये दोनों कुमार इस देश को सुशोभित कर रहे हैं। शरीर की ऊँचाई, मनोभाव सूचक संकेत तथा चेष्टा (बोलचाल) में ये दोनों एक-दूसरे के समान हैं। श्रेष्ठ आयुध धारण करनेवाले ये दोनों नरश्रेष्ठ वीर इस दुर्गम मार्ग में किसलिये आये हैं? यह मैं यथार्थरूप से सुनना चाहता हूँ।' 

सुमति का यह वचन सुनकर विश्वामित्रजी ने उन्हें सब वृत्तान्त यथार्थरूप से निवेदन किया। सिद्धाश्रम में निवास और राक्षसों के वध का प्रसंग भी यथावत् रूप से कह सुनाया। विश्वामित्रजी की बात सुनकर राजा सुमति को बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने परम आदरणीय अतिथि के रूप में आये हुए उन दोनों महाबली दशरथ - पुत्रों का विधिपूर्वक आतिथ्य- सत्कार किया। 

सुमति से उत्तम आदर-सत्कार पाकर वे दोनों रघुवंशी कुमार वहाँ एक रात रहे और सबेरे उठकर मिथिला की ओर चल दिये। मिथिला में पहुँचकर जनकपुरी की सुन्दर शोभा देख सभी महर्षि साधु साधु कहकर उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। 

मिथिला के उपवन में एक पुराना आश्रम था, जो अत्यन्त रमणीय होकर भी सूनसान दिखायी देता था। उसे देखकर श्रीरामचन्द्रजी ने मुनिवर विश्वामित्रजीसे पूछा – भगवन्! यह कैसा स्थान है, जो देखने में तो आश्रम - जैसा है; किंतु एक भी मुनि यहाँ दृष्टिगोचर नहीं होते हैं। मैं यह सुनना चाहता हूँ कि पहले यह आश्रम किसका था? 

श्रीरामचन्द्रजी का यह प्रश्न सुनकर प्रवचन कुशल महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र ने इस प्रकार उत्तर दिया - रघुनन्दन! पूर्वकाल में यह जिस महात्मा का आश्रम था और जिन्होंने क्रोधपूर्वक इसे शाप दे दिया था, उनका तथा उनके इस आश्रम का सब वृत्तान्त तुमसे कहता हूँ। तुम यथार्थरूप से इसको सुनो। 

'नरश्रेष्ठ! पूर्वकाल में यह स्थान महात्मा गौतम का आश्रम था। उस समय यह आश्रम बड़ा ही दिव्य जान पड़ता था। देवता भी इसकी पूजा एवं प्रशंसा किया करते थे। महायशस्वी राजपुत्र! पूर्वकाल में महर्षि गौतम अपनी पत्नी अहिल्या के साथ रहकर यहाँ तपस्या करते थे। उन्होंने बहुत वर्षों तक यहाँ तप किया था।' 

एक दिन जब महर्षि गौतम आश्रम पर नहीं थे, उपयुक्त अवसर समझकर शचीपति इन्द्र गौतम मुनि का वेष धारण किये वहाँ आये और अहिल्या से इस प्रकार बोले – सदा सावधान रहने वाली सुन्दरी ! रति की इच्छा रखने वाले प्रार्थी पुरुष ऋतुकाल की प्रतीक्षा नहीं करते हैं। सुन्दर कटिप्रदेश वाली सुन्दरी ! मैं तुम्हारे साथ समागम करना चाहता हूँ। 

‘रघुनन्दन! महर्षि गौतम का वेष धारण करके आये हुए इन्द्र को पहचानकर भी माया से भ्रमित हो उस दुर्बुद्धि नारी ने 'अहो ! देवराज इन्द्र मुझे चाहते हैं' इस कौतूहलवश उनके साथ समागम का निश्चय करके वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

रति के पश्चात् उसने देवराज इन्द्र से संतुष्टचित्त होकर कहा - सुरश्रेष्ठ! मैं आपके समागम से कृतार्थ हो गयी। प्रभो! अब आप शीघ्र यहाँ से चले जाइये। देवेश्वर ! महर्षि गौतम के कोप से आप अपनी और मेरी भी सब प्रकार से रक्षा कीजिये। 

तब इन्द्र ने अहिल्या से हँसते हुए कहा - 'सुन्दरी ! मैं भी संतुष्ट हो गया। अब जैसे आया था, उसी तरह चला जाऊँगा। 

'श्रीराम! इस प्रकार अहिल्या से समागम करके इन्द्र जब उस कुटी से बाहर निकले, तब गौतम के आ जाने की आशङ्का से बड़ी उतावली के साथ वेगपूर्वक भागने का प्रयत्न करने लगे। इतने ही में उन्होंने देखा, देवताओं और दानवों के लिये भी दुर्धर्ष, तपोबलसम्पन्न महामुनि गौतम हाथ में समिधा लिये आश्रम में प्रवेश कर रहे हैं। उनका शरीर तीर्थ के जल से भीगा हुआ है और वे प्रज्वलित अग्नि के समान उद्दीप्त हो रहे हैं। 

उन पर दृष्टि पड़ते ही देवराज इन्द्र भय से थर्रा उठे। उनके मुख पर विषाद छा गया। दुराचारी इन्द्र को मुनि का वेष धारण किये देख सदाचार सम्पन्न मुनिवर गौतमजी ने रोष में भरकर कहा – दुर्मते! तूने मेरा रूप धारण करके यह न करने योग्य पापकर्म किया है, इसलिये तू विफल अण्डकोषों से रहित हो जायेगा। 

'रोष में भरे हुए महात्मा गौतम के ऐसा कहते ही सहस्राक्ष इन्द्र के दोनों अण्डकोष उसी क्षण पृथ्वी पर गिर पड़े। 

इन्द्र को इस प्रकार शाप देकर गौतम ने अपनी पन्ती को भी शाप दिया - 'दुराचारिणी! तू भी यहाँ कई हजार वर्षों तक शिला बनकर केवल हवा पीकर या उपवास करके कष्ट उठाती हुई राख में पड़ी रहेगी। समस्त प्राणियों से अदृश्य रहकर इस आश्रम में निवास करेगी। जब दुर्धर्ष दशरथ कुमार राम इस घोर वन में पदार्पण करेंगे, उस समय तू पवित्र होगी। उनका आतिथ्य-सत्कार करने से तेरे लोभ-मोह आदि दोष दूर हो जायँगे और तू प्रसन्नता पूर्वक मेरे पास पहुँचकर अपना पूर्व शरीर धारण कर लेगी। 

‘अपनी दुराचारिणी पन्ती से ऐसा कहकर महातेजस्वी, महातपस्वी गौतम इस आश्रम को छोड़कर चले गये और सिद्धों तथा चारणों से सेवित हिमालय के रमणीय शिखर पर रहकर तपस्या करने लगे।' 

इति श्रीमद् राम कथा बालकाण्ड अध्याय-५ का भाग-३६(36) समाप्त !

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