भाग-३५(35) पुत्र वध से दु:खी दिति का कश्यपजी से इन्द्रहन्ता पुत्र की प्राप्ति के उद्देश्य से तप करना तथा उन्हें अपवित्र अवस्था में पाकर इन्द्र का उनके गर्भ के सात टुकड़े कर डालना

 


अपने उन पुत्रों के मारे जाने पर दिति को बड़ा दुःख हुआ। वे अपने पति मरीचिनन्दन कश्यप के पास जाकर बोलीं - भगवन्! आपके महाबली पुत्र देवताओं ने मेरे पुत्रों को मार डाला; अत: मैं दीर्घकाल की तपस्या से उपार्जित एक ऐसा पुत्र चाहती हूँ जो इन्द्र का वध करने में समर्थ हो। मैं तपस्या करूँगी, आप इसके लिये मुझे आज्ञा दें और मेरे गर्भ में ऐसा पुत्र प्रदान करें, जो सब कुछ करने में समर्थ तथा इन्द्र का वध करनेवाला हो। 

उसकी यह बात सुनकर महातेजस्वी मरीचिनन्दन कश्यप ने उस परम दुःखिनी दिति को इस प्रकार उत्तर दिया - तपोधने! ऐसा ही हो। तुम शौचाचार का पालन करो। तुम्हारा भला हो। तुम ऐसे पुत्र को जन्म दोगी, जो युद्ध में इन्द्र को मार सके। यदि पूरे एक सहस्र वर्ष तक पवित्रता पूर्वक रह सकोगी तो तुम मुझसे त्रिलोकीनाथ इन्द्र का वध करने में समर्थ पुत्र प्राप्त कर लोगी। 

ऐसा कहकर महातेजस्वी कश्यप ने दिति के शरीर पर हाथ फेरा। फिर उनका स्पर्श करके कहा - 'तुम्हारा कल्याण हो।' ऐसा कहकर वे तपस्या के लिये चले गये। 

'नरश्रेष्ठ! उनके चले जाने पर दिति अत्यन्त हर्ष और उत्साह में भरकर कुशप्लव नामक तपोवन में आयीं और अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगीं। पुरुषप्रवर श्रीराम ! दिति के तपस्या करते समय सहस्रलोचन इन्द्र विनय आदि उत्तम गुणसम्पत्ति से युक्त हो उनकी सेवा टहल करने लगे। सहस्राक्ष इन्द्र अपनी मौसी दिति के लिये अग्नि, कुशा, काष्ठ, जल, फल, मूल तथा अन्यान्य अभिलषित वस्तुओं को ला- लाकर देते थे। इन्द्र मौसी की शारीरिक सेवाएँ करते, उनके पैर दबाकर उनकी थकावट मिटाते तथा ऐसी ही अन्य आवश्यक सेवाओं द्वारा वे हर समय दिति की परिचर्या करते थे।' 

रघुनन्दन! जब सहस्र वर्ष पूर्ण होने में कुल दस वर्ष बाकी रह गये, तब एक दिन दिति ने अत्यन्त हर्ष में भरकर सहस्रलोचन इन्द्र से कहा - बलवानों में श्रेष्ठ वीर! अब मेरी तपस्या के केवल दस वर्ष और शेष रह गये हैं। तुम्हारा भला हो। दस वर्ष बाद तुम अपने होनेवाले भाई को देख सकोगे। वत्स! मैंने तुम्हारे विनाश के लिये जिस पुत्र की याचना की थी, वह जब तुम्हें जीतने के लिये उत्सुक होगा, उस समय मैं उसे शान्त कर दूँगी। तुम्हारे प्रति उसे वैर भाव से रहित तथा भ्रातृ-स्नेह से युक्त बना दूँगी। फिर तुम उसके साथ रहकर उसी के द्वारा की हुई त्रिभुवन विजय का सुख निश्चिन्त होकर भोगना। सुरश्रेष्ठ! मेरे प्रार्थना करने पर तुम्हारे महात्मा पिता ने एक हजार वर्ष के बाद पुत्र होने का मुझे वर दिया है। 

'ऐसा कहकर दिति नींद से अचेत हो गयीं। उस समय सूर्यदेव आकाश के मध्य भाग में आ गये थे। दोपहर का समय हो गया था। देवी दिति आसन पर बैठी बैठी झपकी लेने लगीं। सिर झुक गया और केश पैरों से जा लगे। इस प्रकार निद्रावस्था में उन्होंने पैरों को सिर से लगा लिया। उन्होंने अपने केशों को पैरों पर डाल रखा था। सिर को टिकाने के लिये दोनों पैरों को ही आधार बना लिया था। यह देख दिति को अपवित्र हुई जान इन्द्र हँसे और बड़े प्रसन्न हुए।' 

'श्रीराम! फिर तो सतत सावधान रहनेवाले इन्द्र माता दिति के उदर में प्रविष्ट हो गये और उसमें स्थित हुए गर्भ के उन्होंने सात टुकड़े कर डाले। श्रीराम ! उनके द्वारा सौ पर्वोवाले वज्र से विदीर्ण किये जाते समय वह गर्भस्थ बालक जोर-जोर से रोने लगा। इससे दिति की निद्रा टूट गयी। वे जागकर उठ बैठीं।' 

तब इन्द्र ने उस रोते हुए गर्भ से कहा- 'भाई ! मत रो, मत रो' परंतु महातेजस्वी इन्द्र ने रोते रहने पर भी उस गर्भ के टुकड़े कर ही डाले। 

उस समय दिति ने कहा – 'इन्द्र! बच्चे को न मारो, न मारो।' माता के वचन का गौरव मानकर इन्द्र सहसा उदर से निकल आये। 

फिर वज्र सहित इन्द्र ने हाथ जोड़कर दिति से कहा – देवि! तुम्हारे सिर के बाल पैरों से लगे थे। इस प्रकार तुम अपवित्र अवस्था में सोयी थीं। यही छिद्र पाकर मैंने इस 'इन्द्रहन्ता' बालक के सात टुकड़े कर डाले हैं। इसलिये माँ ! तुम मेरे इस अपराध को क्षमा करो। 

इन्द्र द्वारा अपने गर्भ के सात टुकड़े कर दिये जाने पर देवी दिति को बड़ा दुःख हुआ। वे दुर्द्धर्ष वीर सहस्राक्ष इन्द्र से अनुनयपूर्वक बोलीं - देवेश! बलसूदन! मेरे ही अपराध से इस गर्भ के सात टुकड़े हुए हैं। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। इस गर्भ को नष्ट करने के निमित्त तुमने जो क्रूरतापूर्ण कर्म किया है, वह तुम्हारे और मेरे लिये भी जिस तरह प्रिय हो जाये – जैसे भी उसका परिणाम तुम्हारे और मेरे लिये सुखद हो जाये, वैसा उपाय मैं करना चाहती हूँ। मेरे गर्भ के वे सातों खण्ड सात व्यक्ति होकर सातों मरुद्गणों के स्थानों का पालन करनेवाले हो जायें। 

'पुत्र! ये मेरे दिव्य रूपधारी पुत्र 'मारुत' नाम से प्रसिद्ध होकर आकाश में जो सुविख्यात सात वातस्कन्ध- हैं, उनमें विचरें। (ऊपर जो सात मरुत् बताये गये हैं, वे सात-सातके गण हैं। इस प्रकार उनचास मरुत् समझने चाहिये।) इनमें से जो प्रथम गण है, वह ब्रह्मलोक में विचरे, दूसरा इन्द्रलोक में विचरण करे तथा तीसरा महायशस्वी मरुद्गण दिव्य वायु के नाम से विख्यात हो अन्तरिक्ष में बहा करे।' 

‘सुरश्रेष्ठ! तुम्हारा कल्याण हो। मेरे शेष चार पुत्रों के गण तुम्हारी आज्ञा से समयानुसार सम्पूर्ण दिशाओं में संचार करेंगे। तुम्हारे ही रखे हुए नाम से तुमने जो 'मा रुदः' कहकर उन्हें रोने से मना किया था, उसी मा रुद : ' – इस वाक्य से वे सब-के-सब मारुत कहलायेंगे । मारुत नाम से ही उनकी प्रसिद्धि होगी।'

दिति का वह वचन सुनकर बल दैत्य को मारनेवाले सहस्राक्ष इन्द्र ने हाथ जोड़कर यह बात कही - मां! तुम्हारा कल्याण हो। तुमने जैसा कहा है, वह सब वैसा ही होगा; इसमें संशय नहीं है। तुम्हारे ये पुत्र देवरूप होकर विचरेंगे। 

'श्रीराम! उस तपोवन में ऐसा निश्चय करके वे दोनों माता-पुत्र - दिति और इन्द्र कृतकृत्य हो स्वर्गलोक को चले गये ऐसा हमने सुन रखा है। काकुत्स्थ! यही वह देश है, जहाँ पूर्वकाल में रहकर देवराज इन्द्र ने तपःसिद्ध दिति की परिचर्या की थी। पुरुषसिंह! पूर्वकाल में महाराज इक्ष्वाकु के एक परम धर्मात्मा पुत्र थे, जो विशाल नाम से प्रसिद्ध हुए। उनका जन्म अलम्बुषा के गर्भ से हुआ था। उन्होंने इस स्थान पर विशाला नाम की पुरी बसायी थी।' 

'श्रीराम! विशाल के पुत्र का नाम था हेमचन्द्र, जो बड़े बलवान् थे। हेमचन्द्र के पुत्र सुचन्द्र नाम से विख्यात हुए। श्रीरामचन्द्र! सुचन्द्र के पुत्र धूम्राश्व और धूम्राश्व के पुत्र संजय हुए। संजय से प्रतापी पुत्र श्रीमान् सहदेव हुए। सहदेव के परम धर्मात्मा पुत्र का नाम कुशाश्व था। कुशाश्व के महातेजस्वी पुत्र प्रतापी सोमदत्त हुए और सोमदत्त के पुत्र काकुत्स्थ नाम से विख्यात हुए।' 

'काकुत्स्थ के महातेजस्वी पुत्र सुमति नाम से प्रसिद्ध हैं; जो परम कान्तिमान् एवं दुर्जय वीर हैं। वे ही इस समय इस पुरी में निवास करते हैं। महाराज इक्ष्वाकु के प्रसाद से विशाला के सभी नरेश दीर्घायु, महात्मा, पराक्रमी और परम धार्मिक होते आये हैं। नरश्रेष्ठ! आज एक रात हमलोग यहीं सुखपूर्वक शयन करेंगे; फिर कल प्रात: काल यहाँ से चलकर तुम मिथिला में राजा जनक का दर्शन करोगे।' 

नरेशों में श्रेष्ठ, महातेजस्वी, महायशस्वी राजा सुमति विश्वामित्रजी को पुरी के समीप आया हुआ सुनकर उनकी अगवानी के लिये स्वयं आये। अपने पुरोहित और बन्धु बान्धवों के साथ राजा ने विश्वामित्रजी की उत्तम पूजा करके हाथ जोड़ उनका कुशल- समाचार पूछा और उनसे इस प्रकार कहा - मुने! मैं धन्य हूँ। आपका मुझ पर बड़ा अनुग्रह है; क्योंकि आपने स्वयं मेरे राज्य में पधारकर मुझे दर्शन दिया। इस समय मुझसे बढ़कर धन्य पुरुष दूसरा कोई नहीं है।' 

इति श्रीमद् राम कथा बालकाण्ड अध्याय-५ का भाग-३५(35) समाप्त !

No comments:

Post a Comment

रामायण: एक परिचय

रामायण संस्कृत के रामायणम् का हिंदी रूपांतरण है जिसका शाब्दिक अर्थ है राम की जीवन यात्रा। रामायण और महाभारत दोनों सनातन संस्कृति के सबसे प्र...