भाग-३३(33) मुनि विश्वामित्र द्वारा श्रीराम-लक्ष्मण को गंगा से कार्तिकेय की उत्पत्ति तथा गंगावतरण का प्रसंग सुनाना

 



जब महादेवजी तपस्या कर रहे थे, उस समय इन्द्र और अग्नि आदि सम्पूर्ण देवता अपने लिये सेनापति की इच्छा लेकर ब्रह्माजी के पास आय। देवताओं को आराम देनेवाले श्रीराम ! इन्द्र और अग्नि सहित समस्त देवताओं ने भगवान् ब्रह्मा को प्रणाम करके इस प्रकार कहा - प्रभो! पूर्वकाल में जिन भगवान् महेश्वर ने हमें बीजरूप से सेनापति प्रदान किया था, वे उमादेवी के साथ उत्तम तप का आश्रय लेकर तपस्या करते हैं। विधि-विधान के ज्ञाता पितामह! अब लोक हित के लिये जो कर्तव्य प्राप्त हो, उसको पूर्ण कीजिये; क्योंकि आप ही हमारे परम आश्रय हैं। 

देवताओं की यह बात सुनकर सम्पूर्ण लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने मधुर वचनों द्वारा उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा - देवताओ! गिरिराज कुमारी पार्वती ने जो शाप दिया है, उसके अनुसार तुम्हें अपनी पत्नियों के गर्भ से अब कोई संतान नहीं होगी । उमादेवी की वाणी अमोघ है; अत: वह सत्य होकर ही रहेगी; इसमें संशय नहीं है।

‘ये हैं उमा की बड़ी बहिन आकाश गंगा, जिनके गर्भ में शङ्करजी के उस तेज को स्थापित करके अग्निदेव एक ऐसे पुत्र को जन्म देंगे, जो देवताओं के शत्रुओं का दमन करने में समर्थ सेनापति होगा। ये गंगा गिरिराज की ज्येष्ठ पुत्री हैं, अत: अपनी छोटी बहिन के उस पुत्र को अपने ही पुत्र के समान मानेंगी। इनको भी यह बहुत प्रिय लगेगा। इसमें संशय नहीं है। 

रघुनन्दन! ब्रह्माजी का यह वचन सुनकर सब देवता कृतकृत्य हो गये। उन्होंने ब्रह्माजी को प्रणाम करके उनका पूजन किया। श्रीराम ! विविध धातुओं से अलंकृत उत्तम कैलाश पर्वत पर जाकर उन सम्पूर्ण देवताओं ने अग्निदेव को पुत्र उत्पन्न करने के कार्य में नियुक्त किया। 

वे बोले - देव! हताश न हों ! यह देवताओं का कार्य है, इसे सिद्ध कीजिये। भगवान् रुद्र के उस महान् तेज को अब आप गंगाजी में स्थापित कर दीजिये। 

तब देवताओं से ‘बहुत अच्छा' कहकर अग्निदेव गंगाजी के निकट आये और बोले - देवि! आप इस गर्भ को धारण करें। यह देवताओं का प्रिय कार्य है। 

अग्निदेव की यह बात सुनकर गंगादेवी ने दिव्यरूप धारण कर लिया। उनकी यह महिमा – यह रूप-वैभव देखकर अग्निदेव ने उस रुद्र-तेज को उनके सब ओर बिखेर दिया। रघुनन्दन! अग्निदेव ने जब गंगादेवी को सब ओर से उस रुद्र - तेज द्वारा अभिषिक्त कर दिया, तब गंगाजी के सारे स्रोत उससे परिपूर्ण हो गये। 

तब गंगा ने समस्त देवताओं के अग्रगामी अग्निदेव से इस प्रकार कहा – देव! आपके द्वारा स्थापित किये गये इस बढ़े हुए तेज को धारण करने में मैं असमर्थ हूँ। इसकी आँच से जल रही हूँ और मेरी चेतना व्यथित हो गयी है। 

तब सम्पूर्ण देवताओं के हविष्य को भोग लगाने वाले अग्निदेव ने गंगादेवी से कहा - देवि ! हिमालय पर्वत के पार्श्वभाग में इस गर्भ को स्थापित कर दीजिये। 

निष्पाप रघुनन्दन! अग्नि की यह बात सुनकर महातेजस्विनी गंगा ने उस अत्यन्त प्रकाशमान गर्भ को अपने स्रोतों से निकालकर यथोचित स्थान में रख दिया। गंगा के गर्भ से जो तेज निकला, वह तपाये हुए जाम्बूनद नामक सुवर्ण के समान कान्तिमान् दिखायी देने लगा (गंगा सुवर्णमय मेरुगिरि से प्रकट हुई हैं; अत: उनका बालक भी वैसे ही रूप रंग का हुआ)। पृथ्वी पर जहाँ वह तेजस्वी गर्भ स्थापित हुआ, वहाँ की भूमि तथा प्रत्येक वस्तु सुवर्णमयी हो गयी। उसके आस-पास का स्थान अनुपम प्रभा से प्रकाशित होने वाला रजत हो गया। उस तेज की तीक्ष्णता से ही दूरवर्ती भूभाग की वस्तुएँ ताँबे और लोहे के रूप में परिणत हो गयीं। उस तेजस्वी गर्भ का जो मल था, वही वहाँ राँगा और सीसा हुआ। इस प्रकार पृथ्वी पर पड़कर वह तेज नाना प्रकार के धातुओं के रूप में वृद्धि को प्राप्त हुआ। 

पृथ्वी पर उस गर्भ के रखे जाते ही उसके तेज से व्याप्त होकर पूर्वोक्त श्वेतपर्वत और उससे सम्बन्ध रखने वाला सारा वन सुवर्णमय होकर जगमगाने लगा। पुरुषसिंह रघुनन्दन! तभी से अग्नि के समान प्रकाशित होने वाले सुवर्ण का नाम जातरूप हो गया; क्योंकि उसी समय सुवर्ण का तेजस्वी रूप प्रकट हुआ था। उस गर्भ के सम्पर्क से वहाँ का तृण, वृक्ष, लता और गुल्म – सब कुछ सोने का हो गया। 

तदनन्तर इन्द्र और मरुद्गणों सहित सम्पूर्ण देवताओं ने वहाँ उत्पन्न हुए कुमार को दूध पिलाने के लिये छहों कृत्तिकाओं को नियुक्त किया। तब उन कृत्तिकाओं ने 'यह हम सबका पुत्र हो' ऐसी उत्तम शर्त रखकर और इस बात का निश्चित विश्वास लेकर उस नवजात बालक को अपना दूध प्रदान किया। 

उस समय सब देवता बोले - यह बालक कार्तिकेय कहलायेगा और तुम लोगों का त्रिभुवन विख्यात पुत्र होगा- इसमें संशय नहीं है। देवताओं का यह अनुकूल वचन सुनकर शिव और पार्वती से स्कन्दित (स्खलित) तथा गंगा द्वारा गर्भस्राव होने पर प्रकट हुए अग्नि के समान उत्तम प्रभा से प्रकाशित होनेवाले उस बालक को कृत्तिकाओं ने नहलाया। 

कुकुत्स्थकुलभूषण श्रीराम ! अग्नितुल्य तेजस्वी महाबाहु कार्तिकेय गर्भस्त्राव काल में स्कन्दित (निकला हुआ) हुए थे; इसलिये देवताओं ने उन्हें स्कन्द कहकर पुकारा। तदनन्तर कृत्तिकाओं के स्तनों में परम उत्तम दूध प्रकट हुआ। उस समय स्कन्द ने अपने छः मुख प्रकट करके उन छओं का एक साथ ही स्तनपान किया। एक ही दिन दूध पीकर उस सुकुमार शरीर वाले शक्तिशाली कुमार ने अपने पराक्रम से दैत्यों की सारी सेनाओं पर विजय प्राप्त की। तत्पश्चात् अग्नि आदि सब देवताओं ने मिलकर उन महातेजस्वी स्कन्द का देवसेनापति के पद पर अभिषेक किया।

श्रीराम! यह मैंने तुम्हें गंगाजी के चरित्र को विस्तार पूर्वक बताया है; साथ ही कुमार कार्तिकेय के जन्म का भी प्रसंग सुनाया है, जो श्रोता को धन्य एवं पुण्यात्मा बनानेवाला है। काकुत्स्थ! इस पृथ्वी पर जो मनुष्य कार्तिकेय में भक्तिभाव रखता है, वह इस लोक में दीर्घायु तथा पुत्र-पौत्रों से सम्पन्न हो मृत्यु के पश्चात् स्कन्द के लोक में जाता है।

रघुनन्दन! अब मैं तुम्हे गंगा का अवतरण पृथ्वी पर किस प्रकार हुआ उसका प्रसंग सुनाता हूँ। पूर्वकाल में तुम्हारे पूर्वज राजा भगीरथ ने ही राजा सगर के पुत्रों को मुक्ति दिलाने के लिए घोर तपस्या की थी। 

नोट - गंगा का अवतरण किस प्रकार हुआ इसका उल्लेख पूर्व में किया जा चूका है। आप श्रीमद् राम कथा के अध्याय - २(2) वंश चरित्र के भाग - ३२(32) से ३७(37) तक पढ़ सकते हैं। अतः यहाँ इसका वर्णन नहीं दिया जा रहा है।    

इति श्रीमद् राम कथा बालकाण्ड अध्याय-५ का भाग-३३(33) समाप्त !



No comments:

Post a Comment

रामायण: एक परिचय

रामायण संस्कृत के रामायणम् का हिंदी रूपांतरण है जिसका शाब्दिक अर्थ है राम की जीवन यात्रा। रामायण और महाभारत दोनों सनातन संस्कृति के सबसे प्र...