रघुनन्दन! विवाह करके जब राजा ब्रह्मदत्त चले गये, तब पुत्रहीन महाराज कुशनाभ ने श्रेष्ठ पुत्र की प्राप्ति के लिये पुत्रेष्टि यज्ञ का अनुष्ठान किया। उस यज्ञ के होते समय परम उदार ब्रह्मकुमार महाराज कुश ने भूपाल कुशनाभ से कहा - पुत्र ! तुम्हें अपने समान ही परम धर्मात्मा पुत्र प्राप्त होगा। तुम 'गाधि' नामक पुत्र प्राप्त करोगे और उसके द्वारा तुम्हें संसार में अक्षय कीर्ति उपलब्ध होगी।
श्रीराम! पृथ्वीपति कुशनाभ से ऐसा कहकर राजर्षि कुश आकाश में प्रविष्ट हो सनातन ब्रह्मलोक को चले गये। कुछ काल के पश्चात् बुद्धिमान् राजा कुशनाभ के यहाँ परम धर्मात्मा 'गाधि' नामक पुत्र का जन्म हुआ। ककुत्स्थकुलभूषण रघुनन्दन ! वे परम धर्मात्मा राजा गाधि मेरे पिता थे। मैं कुश के कुल में उत्पन्न होने के कारण 'कौशिक' कहलाता हूँ।
राघव ! मेरे एक ज्येष्ठ बहिन भी थी, जो उत्तम व्रत का पालन करनेवाली थी। उसका नाम सत्यवती था। वह ऋचीक मुनि को ब्याही गयी थी।
अपने पति का अनुसरण करनेवाली सत्यवती शरीरसहित स्वर्गलोक को चली गयी थी। वही परम उदार महानदी कौशिकी के रूप में भी प्रकट होकर इस भूतल पर प्रवाहित होती है। मेरी वह बहिन जगत के हित के लिये हिमालय का आश्रय लेकर नदी रूप में प्रवाहित हुई। वह पुण्यसलिला दिव्य नदी बड़ी रमणीय है।
रघुनन्दन! मेरा अपनी बहिन कौशिकी के प्रति बहुत स्नेह है; अत: मैं हिमालय के निकट उसी के तट पर नियमपूर्वक बड़े सुख से निवास करता हूँ। पुण्यमयी सत्यवती सत्य धर्म में प्रतिष्ठित है। वह परम सौभाग्यशालिनी पतिव्रता देवी यहाँ सरिताओं में श्रेष्ठ कौशिकी के रूप में विद्यमान है।
श्रीराम! मैं यज्ञसम्बन्धी नियम की सिद्धि के लिये ही अपनी बहिन का सांनिध्य छोड़कर सिद्धाश्रम (बक्सर) में आया था। अब तुम्हारे तेज से मुझे वह सिद्धि प्राप्त हो गयी है। महाबाहु श्रीराम! तुमने मुझसे जो पूछा था, उसके उत्तर में मैंने तुम्हें शोणभद्र तटवर्ती देश का परिचय देते हुए यह अपनी तथा अपने कुल की उत्पत्ति बतायी है।
काकुत्स्थ! मेरे कथा कहते-कहते आधी रात बीत गयी। अब थोड़ी देर नींद ले लो। तुम्हारा कल्याण हो। मैं चाहता हूँ कि अधिक जागरण के कारण हमारी यात्रा में विघ्न न पड़े। सारे वृक्ष निष्कम्प जान पड़ते हैं- इनका एक पत्ता भी नहीं हिलता है। पशु-पक्षी अपने-अपने वासस्थान में छिपकर बसेरे लेते हैं। रघुनन्दन ! रात्रि के अन्धकार से सम्पूर्ण दिशाएँ व्याप्त हो रही हैं।
धीरे-धीरे संध्या दूर चली गयी। नक्षत्रों तथा ताराओं से भरा हुआ आकाश सहस्राक्ष इन्द्र की भाँति सहस्रों ज्योतिर्मय नेत्रों से व्याप्त-सा होकर प्रकाशित हो रहा है। सम्पूर्ण लोक का अन्धकार दूर करने वाले शीतरश्मि चन्द्रमा अपनी प्रभा से जगत के प्राणियों के मन को आह्लाद प्रदान करते हुए उदित हो रहे हैं। रात में विचरने वाले समस्त प्राणी - यक्ष-राक्षसोंके समुदाय तथा भयंकर पिशाच इधर-उधर विचर रहे हैं।
ऐसा कहकर महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र चुप हो गये। उस समय सभी मुनियों ने साधुवाद देकर विश्वामित्रजी की भूरि-भूरि प्रशंसा की - कुश पुत्रों का यह वंश सदा ही महान् धर्मपरायण रहा है। कुशवंशी महात्मा श्रेष्ठ मानव ब्रह्माजी के समान तेजस्वी हुए हैं। महायशस्वी विश्वामित्रजी ! अपने वंश में सबसे बड़े महात्मा आप ही हैं तथा सरिताओं में श्रेष्ठ कौशिकी भी आपके कुल की कीर्ति को प्रकाशित करनेवाली है।
इस प्रकार आनन्दमग्न हुए उन मुनिवरों द्वारा प्रशंसित श्रीमान् कौशिक मुनि अस्त हुए सूर्य की भाँति नींद लेने लगे। वह कथा सुनकर लक्ष्मण सहित श्रीराम को भी कुछ विस्मय हो आया। वे भी मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र की सराहना करके नींद लेने लगे।
महर्षियों सहित विश्वामित्र ने रात्रि के शेषभाग में शोणभद्र के तट पर शयन किया। जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब वे श्रीरामचन्द्रजी से इस प्रकार बोले - श्रीराम ! रात बीत गयी । सबेरा हो गया । तुम्हारा कल्याण हो, उठो, उठो और चलने की तैयारी करो।
मुन की बात सुनकर पूर्वाह्णकाल का नित्यनियम पूर्ण करके श्रीराम चलने को तैयार हो गये और इस प्रकार बोले - ब्रह्मन्! शुभ जल से परिपूर्ण तथा अपने तटों से सुशोभित होनेवाला यह शोणभद्र तो अथाह जान पड़ता है। हम लोग किस मार्ग से चलकर इसे पार करेंगे?
श्रीराम के ऐसा कहने पर विश्वामित्र बोले - जिस मार्ग से महर्षि गण शोणभद्र को पार करते हैं, उसका मैंने पहले से ही निश्चय कर रखा है, वह मार्ग यह है।
बुद्धिमान् विश्वामित्र के ऐसा कहने पर वे महर्षि नाना प्रकार के वनों की शोभा देखते हुए वहाँ से प्रस्थित हुए। बहुत दूर का मार्ग तय कर लेने पर दोपहर होते-होते उन सब लोगों ने मुनिजन सेवित, सरिताओं में श्रेष्ठ गंगाजी के तट पर पहुँचकर उनका दर्शन किया। हंसों तथा सारसों से सेवित पुण्यसलिला भागीरथी का दर्शन करके श्रीरामचन्द्रजी के साथ समस्त मुनि बहुत प्रसन्न हुए।
उस समय सबने गंगाजी के तटपर डेरा डाला। फिर विधिवत् स्नान करके देवताओं और पितरों का तर्पण किया। उसके बाद अग्निहोत्र करके अमृत के समान मीठे हविष्य का भोजन किया। तदनन्तर वे सभी कल्याणकारी महर्षि प्रसन्नचित्त हो महात्मा विश्वामित्र को चारों ओर से घेरकर गंगाजी के तट पर बैठ गये।
जब वे सब मुनि स्थिरभाव से विराजमान हो गये और श्रीराम तथा लक्ष्मण भी यथायोग्य स्थान पर बैठ गये, तब श्रीराम ने प्रसन्नचित्त होकर विश्वामित्रजी से पूछा - भगवन्! मैं यह सुनना चाहता हूँ कि तीन मार्गों से प्रवाहित होनेवाली नदी ये गंगाजी किस प्रकार तीनों लोकों में घूमकर नदों और नदियों के स्वामी समुद्र में जा मिली हैं?
श्रीराम के इस प्रश्न द्वारा प्रेरित हो महामुनि विश्वामित्र ने गंगाजी की उत्पत्ति और वृद्धि की कथा कहना आरम्भ किया - श्रीराम! हिमवान् (हिमालय) नामक एक पर्वत है, जो समस्त पर्वतों का राजा तथा सब प्रकार के धातुओं का बहुत बड़ा खजाना है। हिमवान की दो कन्याएँ हैं, जिनके सुन्दर रूप की इस भूतल पर कहीं तुलना नहीं है। मेरु पर्वत की मनोहारिणी पुत्री मैना हिमवान की प्यारी पत्नी है। सुन्दर कटिप्रदेशवाली मैना ही उन दोनों कन्याओं की जननी हैं।
‘रघुनन्दन! मैना के गर्भ से जो पहली कन्या उत्पन्न हुई, वही ये गंगाजी हैं। ये हिमवान की ज्येष्ठ पुत्री हैं। हिमवान की ही दूसरी कन्या, जो मैना के गर्भ से उत्पन्न हुईं, उमा (पार्वती) नाम से प्रसिद्ध हैं। कुछ काल के पश्चात् सब देवताओं ने देवकार्य की सिद्धि के लिये ज्येष्ठ कन्या गंगाजी को, जो आगे चलकर स्वर्ग से त्रिपथगा नदी के रूप में अवतीर्ण हुईं, गिरिराज हिमालय से माँगा।'
'हिमवान ने त्रिभुवन का हित करने की इच्छा से स्वच्छन्द पथ पर विचरने वाली अपनी लोकपावनी पुत्री गंगा को धर्म पूर्वक उन्हें दे दिया। तीनों लोकों के हित की इच्छा वाले देवता त्रिभुवन की भलाई के लिये ही गंगाजी को लेकर मन-ही-मन कृतार्थता का अनुभव करते हुए चले गये।'
‘रघुनन्दन! गिरिराज की जो दूसरी कन्या उमा थीं, वे उत्तम एवं कठोर व्रत का पालन करती हुई घोर तपस्या में लग गयीं। उन्होंने तपोमय धन का संचय किया। गिरिराज ने उग्र तपस्या में संलग्न हुई अपनी वह विश्ववन्दिता पुत्री उमा अनुपम प्रभावशाली भगवान् रुद्र (शिवजी) को ब्याह दी।'
'रघुनन्दन! इस प्रकार सरिताओं में श्रेष्ठ गंगा तथा भगवती उमा, ये दोनों गिरिराज हिमालय की कन्याएँ हैं। सारा संसार इनके चरणों में मस्तक झुकाता है। गतिशीलों में श्रेष्ठ तात श्रीराम ! गंगाजी की उत्पत्ति के विषय में ये सारी बातें मैंने तुम्हें बता दीं। ये त्रिपथगामिनी कैसे हुईं? यह भी सुन लो। पहले तो ये आकाशमार्ग में गयी थीं। तत्पश्चात् ये गिरिराजकुमारी गंगा रमणीया देवनदी के रूप में देवलोक में आरूढ़ हुई थीं। फिर जल रूप में प्रवाहित हो लोगों के पाप दूर करती हुई रसातल में पहुँची थीं।
इति श्रीमद् राम कथा बालकाण्ड अध्याय-५ का भाग-३१(31) समाप्त !

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