भाग-२६(26) सीता सहित श्रीराम का वशिष्ठ पुत्र सुयज्ञ को बुलाकर उनके तथा उनकी पत्नी के लिये बहुमूल्य आभूषण, रत्न और धन आदि का दान

 


तदनन्तर अपने भाई श्रीराम की प्रियकारक एवं हितकर आज्ञा पाकर लक्ष्मण वहाँ से चल दिये। उन्होंने शीघ्र ही गुरुपुत्र सुयज्ञ के घर में प्रवेश किया। उस समय विप्रवर सुयज्ञ अग्निशाला में बैठे हुए थे। लक्ष्मण ने उन्हें प्रणाम करके कहा – सखे ! दुष्कर कर्म करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी के घर पर आओ और उनका कार्य देखो। 

सुयज्ञ ने मध्याह्नकाल की संध्योपासना पूरी करके लक्ष्मण के साथ जाकर श्रीराम के रमणीय भवन में प्रवेश किया, जो लक्ष्मी से सम्पन्न था। होम काल में पूजित अग्नि के समान तेजस्वी वेदवेत्ता सुयज्ञ को आया जान सीता सहित श्रीराम ने हाथ जोड़कर उनकी अगवानी की। तत्पश्चात् ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम ने सोने के बने हुए श्रेष्ठ अङ्गदों, सुन्दर कुण्डलों, सुवर्णमय सूत्र में पिरोयी हुई मणियों, केयूरों, वलयों तथा अन्य बहुत-से रत्नों द्वारा उनका पूजन किया। 

इसके बाद सीता की प्रेरणा से श्रीराम ने सुयज्ञ से कहा - सौम्य ! तुम्हारी पत्नी की सखी सीता तुम्हें अपना हार, सुवर्णसूत्र और करधनी देना चाहती है। इन वस्तुओं को अपनी पत्नी के लिये ले जाओ। वन को प्रस्थान करने वाली तुम्हारी स्त्री की सखी सीता तुम्हें तुम्हारी पत्नी के लिये विचित्र अङ्गद और सुन्दर केयूर भी देना चाहती है। उत्तम बिछौनों से युक्त तथा नाना प्रकार के रत्नों से विभूषित जो पलंग है, उसे भी विदेह्नन्दिनी सीता तुम्हारे ही घर में भेज देना चाहती है। विप्रवर! शत्रुञ्जय नामक जो हाथी है, जिसे मेरे मामा ने मुझे भेंट किया था, उसे एक हजार अशर्फियों के साथ मैं तुम्हें अर्पित करता हूँ। 

श्रीराम के ऐसा कहने पर सुयज्ञ ने वे सब वस्तुएँ ग्रहण करके श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के लिये मङ्गलमय आशीर्वाद प्रदान किये। 

तदनन्तर श्रीराम ने शान्तभाव से खड़े हुए और प्रिय वचन बोलने वाले अपने प्रिय भ्राता सुमित्राकुमार लक्ष्मण से उसी तरह निम्नाङ्कित बात कही, जैसे ब्रह्मा देवराज इन्द्र से कुछ कहते हैं। 

‘सुमित्रानन्दन! अगस्त्य और विश्वामित्र दोनों उत्तम ब्राह्मणों को बुलाकर रत्नों द्वारा उनकी पूजा करो। महाबाहु रघुनन्दन! जैसे मेघ जल की वर्षा द्वारा खेती को तृप्त करता है, उसी प्रकार तुम उन्हें सहस्रों गौओं, सुवर्णमुद्राओं, रजत द्रव्यों और बहुमूल्य मणियों द्वारा संतुष्ट करो। लक्ष्मण! यजुर्वेदीय तैत्तिरीय शाखा का अध्ययन करने वाले ब्राह्मणों के जो आचार्य और सम्पूर्ण वेदों के विद्वान् हैं, साथ ही जिनमें दान प्राप्ति की योग्यता है तथा जो माता कौशल्या के प्रति भक्तिभाव रखकर प्रतिदिन उनके पास आकर उन्हें आशीर्वाद प्रदान करते हैं, उनको सवारी, दास-दासी, रेशमी वस्त्र और जितने धन से वे ब्राह्मण देवता संतुष्ट हों, उतना धन खजाने से दिलवाओ।' 

'चित्ररथ नामक सूत श्रेष्ठ सचिव भी हैं। वे सुदीर्घकाल से यहीं राजकुल की सेवा में रहते हैं। इनको भी तुम बहुमूल्य रत्न, वस्त्र और धन देकर संतुष्ट करो। साथ ही, इन्हें उत्तम श्रेणी के अज आदि सभी पशु और एक सहस्र गौएँ अर्पित करके पूर्ण संतोष प्रदान करो। मुझसे सम्बन्ध रखने वाले जो कठ शाखा और कलाप-शाखा के अध्येता बहुत से दण्डधारी ब्रह्मचारी हैं, वे सदा स्वाध्याय में ही संलग्न रहने के कारण दूसरा कोई कार्य नहीं कर पाते। भिक्षा माँगने में आलसी हैं, परंतु स्वादिष्ट अन्न खाने की इच्छा रखते हैं। महान पुरुष भी उनका सम्मान करते हैं। उनके लिये रत्नों के बोझ से लदे हुए अस्सी ऊँट, अगहनी चावल का भार ढोनेवाले एक सहस्र बैल तथा भद्रक नामक धान्यविशेष (चने, मूँग आदि) का भार लिये हुए दो सौ बैल और दिलवाओ।'

‘सुमित्राकुमार! उपर्युक्त वस्तुओं के सिवा उनके लिये दही, घी आदि व्यञ्जन के निमित्त एक सहस्र गौएँ भी हकवा दो। माता कौशल्या के पास मेखलाधारी ब्रह्मचारियों का बहुत बड़ा समुदाय आया है। उनमें से प्रत्येक को एक-एक हजार स्वर्णमुद्राएँ दिलवा दो। लक्ष्मण! उन समस्त ब्रह्मचारी ब्राह्मणों को मेरे द्वारा दिलायी हुई दक्षिणा देखकर जिस प्रकार मेरी माता कौशल्या आनन्दित हो उठे, उसी प्रकार तुम उन सबकी सब प्रकार से पूजा करो।' 

इस प्रकार आज्ञा प्राप्त होने पर पुरुषसिंह लक्ष्मण ने स्वयं ही कुबेर की भाँति श्रीराम के कथनानुसार उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को उस धनका दान किया। इसके बाद वहाँ खड़े हुए अपने आश्रित सेवकों को जिनका गला आँसुओं से रुँधा हुआ था, बुलाकर श्रीराम ने उनमें से एक-एक को चौदह वर्षों तक जीविका चलाने योग्य बहुत-सा द्रव्य प्रदान किया और उन सबसे कहा - जब तक मैं वन से लौटकर न आऊँ, तब तक तुम लोग लक्ष्मण के और मेरे इस घर को कभी सूना न करना- छोड़कर अन्यत्र न जाना। 

वे सब सेवक श्रीराम के वनगमन से बहुत दु:खी थे। उनसे उपर्युक्त बात कहकर श्रीराम अपने धनाध्यक्ष (खजांची) से बोले - खजाने में मेरा जितना धन है, वह सब ले आओ। 

यह सुनकर सभी सेवक उनका धन ढो ढोकर ले आने लगे। वहाँ उस धन की बहुत बड़ी राशि एकत्र हुई दिखायी देने लगी, जो देखने ही योग्य थी। तब लक्ष्मण सहित पुरुषसिंह श्रीराम ने बालक और बूढ़े ब्राह्मणों तथा दीन दुःखियों को वह सारा धन बँटवा दिया। उन दिनों वहाँ अयोध्या के आस-पास वन में त्रिजट नाम वाले एक गर्ग गोत्रीय ब्राह्मण रहते थे। उनके पास जीविका का कोई साधन नहीं था, इसलिये उपवास आदि के कारण उनके शरीर का रंग पीला पड़ गया था। वे सदा फाल, कुदाल और हल लिये वन में फल- मूल की तलाश में घूमा करते थे। 

वे स्वयं तो बूढ़े हो चले थे, परंतु उनकी पत्नी अभी तरुणी थी। उसने छोटे बच्चों को लेकर ब्राह्मणदेवता से यह बात कही - प्राणनाथ ! यद्यपि  स्त्रियों के लिये पति ही देवता है, अतः मुझे आपको आदेश देने का कोई अधिकार नहीं है, तथापि मैं आपकी भक्त हूँ; इसलिये विनयपूर्वक यह अनुरोध करती हूँ कि आप यह फाल और कुदाल फेंककर मेरा कहना कीजिये। धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजी से मिलिये। यदि आप ऐसा करें तो वहाँ अवश्य कुछ पा जायेंगे। 

पत्नी की बात सुनकर ब्राह्मण एक फटी धोती, जिससे मुश्किल से शरीर ढक पाता था, पहनकर उस मार्ग पर चल दिये, जहाँ श्रीरामचन्द्रजी का महल था। भृगु और अङ्गिरा के समान तेजस्वी त्रिजट, जनसमुदाय के बीच से होकर श्रीराम-भवन की पाँचवीं ड्योढ़ी तक चले गये, परंतु उनके लिये किसी ने रोक-टोक नहीं की। 

उस समय श्रीरामके पास पहुँचकर त्रिजट ने कहा - महाबली राजकुमार ! मैं निर्धन हूँ, मेरे बहुत से पुत्र हैं, जीविका नष्ट हो जाने से सदा वन में ही रहता हूँ, आप मुझ पर कृपादृष्टि कीजिये। 

तब श्रीराम ने विनोदपूर्वक कहा – ब्रह्मन् ! मेरे पास असंख्य गौएँ हैं, इनमें से एक सहस्र का भी मैंने अभी तक किसी को दान नहीं किया है। आप अपना डंडा जितनी दूर फेंक सकेंगे, वहाँ तक की सारी गौएँ आपको मिल जायेंगी। 

यह सुनकर उन्होंने बड़ी तेजी के साथ धोती के पल्ले को सब ओर से कमर में लपेट लिया और अपनी सारी शक्ति लगाकर डंडे को बड़े वेग से घुमाकर फेंका। ब्राह्मण के हाथ से छूटा हुआ वह डंडा सरयू के उस पार जाकर हजारों गौओं से भरे हुए गोष्ठ में एक साँड़ के पास गिरा। धर्मात्मा श्रीराम ने त्रिजट को छाती से लगा लिया और उस सरयू तट से लेकर उस पार गिरे हुए डंडे के स्थान तक जितनी गौएँ थीं, उन सबको मँगवाकर त्रिजट के आश्रम पर भेज दिया। 

उस समय श्रीराम ने गर्गवंशी त्रिजट को सान्त्वना देते हुए कहा – ब्रह्मन् ! मैंने विनोद में यह बात कही थी, इसके लिये आप बुरा न मानियेगा। आपका यह जो दुर्लङ्घ्य तेज है, इसी को जानने की इच्छा से मैंने आपको यह डंडा फेंकने के लिये प्रेरित किया था, यदि आप और कुछ चाहते हों तो माँगिये। मैं सच कहता हूँ कि इसमें आपके लिये कोई संकोच की बात नहीं है। मेरे पास जो-जो धन हैं, वह सब ब्राह्मणों के लिये ही है। आप-जैसे ब्राह्मणों को शास्त्रीय विधि के अनुसार दान देने से मेरे द्वारा उपार्जित किया हुआ धन मेरे यश की वृद्धि करनेवाला होगा। 

गौओं के उस महान् समूह को पाकर पत्नीसहित महामुनि त्रिजट को बड़ी प्रसन्नता हुई, वे महात्मा श्रीराम को यश, बल, प्रीति तथा सुख बढ़ानेवाले आशीर्वाद देने लगे। 

तदनन्तर पूर्ण पराक्रमी भगवान् श्रीराम धर्मबल से उपार्जित किये हुए उस महान् धनको लोगों के यथायोग्य सम्मान पूर्ण वचनों से प्रेरित हो बहुत देर तक अपने सुहृदों में बाँटते रहे। उस समय वहाँ कोई भी ब्राह्मण, सुहृद्, सेवक, दरिद्र अथवा भिक्षुक ऐसा नहीं था, जो श्रीराम के यथायोग्य सम्मान, दान तथा आदर-सत्कार से तृप्त न किया गया हो। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-२६(26) समाप्त !

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