आज्ञा पाकर लक्ष्मणजी गये। वे हर्षित हृदय से माता सुमित्राजी के पास आए, मानो अंधा फिर से नेत्र पा गया हो। उन्होंने जाकर माता के चरणों में मस्तक नवाया, किन्तु उनका मन रघुकुल को आनंद देने वाले श्री रामजी और जानकीजी के साथ था। माता ने उदास मन देखकर उनसे कारण पूछा। लक्ष्मणजी ने सब कथा विस्तार से कह सुनाई। सुमित्राजी कठोर वचनों को सुनकर ऐसी सहम गईं जैसे हिरनी चारों ओर वन में आग लगी देखकर सहम जाती है। लक्ष्मण ने देखा कि आज (अब) अनर्थ हुआ। ये स्नेह वश काम बिगाड़ देंगी! इसलिए वे विदा माँगते हुए डर के मारे सकुचाते हैं और मन ही मन सोचते हैं कि हे विधाता! माता साथ जाने को कहेंगी या नहीं।
परन्तु कुसमय जानकर धैर्य धारण किया और स्वभाव से ही हित चाहने वाली सुमित्राजी कोमल वाणी से बोलीं - हे पुत्र! जानकीजी तुम्हारी माता हैं और सब प्रकार से स्नेह करने वाले श्री रामचन्द्रजी तुम्हारे पिता हैं! जहाँ श्री रामजी का निवास हो वहीं अयोध्या है। जहाँ सूर्य का प्रकाश हो वहीं दिन है। यदि निश्चय ही सीता-राम वन को जाते हैं, तो अयोध्या में तुम्हारा कुछ भी काम नहीं है। गुरु, पिता, माता, भाई, देवता और स्वामी, इन सबकी सेवा प्राण के समान करनी चाहिए। फिर श्री रामचन्द्रजी तो प्राणों के भी प्रिय हैं, हृदय के भी जीवन हैं और सभी के स्वार्थरहित सखा हैं।
'जगत में जहाँ तक पूजनीय और परम प्रिय लोग हैं, वे सब रामजी के नाते से ही पूजनीय और परम प्रिय मानने योग्य हैं। हृदय में ऐसा जानकर, हे तात! उनके साथ वन जाओ और जगत में जीने का लाभ उठाओ! मैं बलिहारी जाती हूँ, हे पुत्र! मेरे समेत तुम बड़े ही सौभाग्य के पात्र हुए, जो तुम्हारे चित्त ने छल छोड़कर श्री राम के चरणों में स्थान प्राप्त किया है। संसार में वही युवती स्त्री पुत्रवती है, जिसका पुत्र श्री रघुनाथजी का भक्त हो। नहीं तो जो राम से विमुख पुत्र से अपना हित जानती है, वह तो बाँझ ही अच्छी। पशु की भाँति उसका ब्याना (पुत्र प्रसव करना) व्यर्थ ही है।'
'तुम्हारे ही भाग्य से श्री रामजी वन को जा रहे हैं। हे तात! दूसरा कोई कारण नहीं है। सम्पूर्ण पुण्यों का सबसे बड़ा फल यही है कि श्री सीतारामजी के चरणों में स्वाभाविक प्रेम हो। राग, रोष, ईर्षा, मद और मोह- इनके वश स्वप्न में भी मत होना। सब प्रकार के विकारों का त्याग कर मन, वचन और कर्म से श्री सीतारामजी की सेवा करना। तुमको वन में सब प्रकार से आराम है, जिसके साथ श्री रामजी और सीताजी रूप पिता-माता हैं। हे पुत्र! तुम वही करना जिससे श्री रामचन्द्रजी वन में क्लेश न पावें, मेरा यही उपदेश है। हे तात! मेरा यही उपदेश है अर्थात तुम वही करना, जिससे वन में तुम्हारे कारण श्री रामजी और सीताजी सुख पावें और पिता, माता, प्रिय परिवार तथा नगर के सुखों की याद भूल जाएँ।'
सुमित्राजी ने इस प्रकार श्री लक्ष्मणजी को शिक्षा देकर वन जाने की आज्ञा दी और फिर यह आशीर्वाद दिया कि श्री सीताजी और श्री रघुवीरजी के चरणों में तुम्हारा निर्मल, निष्काम और अनन्य एवं प्रगाढ़ प्रेम नित-नित नया हो!
माता के चरणों में सिर नवाकर, हृदय में डरते हुए (कि अब भी कोई विघ्न न आ जाए) लक्ष्मणजी तुरंत इस तरह चल दिए जैसे सौभाग्यवश कोई हिरन कठिन फंदे को तुड़ाकर भाग निकला हो। माता के कक्ष से निकलकर वे सीधा अपनी पत्नी उर्मिला के पास गए। वहां जाकर उन्होंने उर्मिला से श्रीराम और जानकीजी के साथ वनवास जाने की बात कही।
लक्ष्मण ने उर्मिला से कहा - प्रिय उर्मिले! क्षमा करो, यह समय रघुकुल के लिए विकट है। भ्राता राम का वन जाना मैं किसी प्रकार भी सहन नहीं कर सकता। मेरा जन्म ही सेवा धर्म के लिए हुआ है और साथ ही मुझ पर रक्षा का भार भी है। धर्म के अनुसार मुझे अपना सुख संसार तज देना चाहिए क्योंकि यदि स्वामी ही समस्त ऐश्वर्यों का त्याग कर दे तो फिर सेवक को भी वैसा ही करना चाहिए। तुम मेरी अर्धांगिनी हो, विवाह कि वेदी से आई हो, तुम्हारा मुझ पर पूर्ण अधिकार है इसी नाते मैं तुमसे वन जाने कि आज्ञा माँगने आया हूँ। माता सुमित्रा ने भी मुझे बिना संकोच वन जाने कि आज्ञा प्रदान कर दी है। अपने कर्तव्य पथ पर बने रहने के लिए मुझे तुम्हारी परम आज्ञा कि आवश्यकता है।
लक्ष्मणजी की बात सुन उर्मिला स्तब्ध हो जाती है और इस प्रकार कहती है - नाथ! क्या कहूँ? अभी विवाह गाँठ कल ही तो जुड़ी है और ऐसे लगता है जैसे जीवन की डोरी छूट रही है, मैं अपने हृदय को कैसे समझाऊं ? रघुवीर कि सेवा आपका अडिग प्रण है, पर मेरा जीवन भी तो आपकी ही शरण में है। हे स्वामी! आप स्वेच्छा से अपना धर्म पूरा करो, पर एक वचन आप मुझे देकर जाइये, यह मेरी इच्छा है।
उर्मिला की बातें सुन लक्ष्मणजी को कुछ संतोष हुआ - बोलो प्रिये! तुम्हारा वचन मेरे लिए आदेश है। उसे पूरा करना, मेरे जीवन का प्रथम उद्देश्य है।
उर्मिला के मन में अपनी बड़ी बहन सीता की चिंता थी जो वह लक्ष्मणजी से कहती हैं - हे स्वामी ! श्रीराम अवध-दुलारे, जगत भर में विख्यात हैं, दीदी सीता जनक-दुलारी हैं। उन्होंने कभी कोई दुःख अथवा कष्ट नहीं देखा। वे राजमहल कि सुकुमारी बड़ी ही कोमल हैं। वन के कठोर कष्टों से उन्हें किसी प्रकार का आघात नहीं हो इस हेतु आप उनके सेवक और रक्षक बनकर इस प्रकार उनका ध्यान रखना जैसे हर पल, हर राह, आप अवध की चिंता करते हैं। आप मुझे कुशल-मंगल अवध वापसी का संकल्प प्रदान कीजिये उनका कहीं अहित न हो यहीं वचन मुझे दीजिये। यही मेरी शर्त, यही मेरा प्रेम, यही मेरा अनुराग है, आप अपना कर्तव्य निभाओ, यही मेरा त्याग है।
लक्ष्मणजी ने रक्षा का संकल्प लेकर उर्मिला के प्रति आभार जताया और बोले - प्रिय! तुम धन्य हो , तुम्हारा त्याग धन्य है, तुमने मुझे अपने प्रेम का बलिदान कर यह महान अवसर दिया है। मैं वचन देता हूँ, माता सीता की सदा रक्षा करूँगा, श्रीराम-जानकी को वापस लाऊँगा। तुम्हारा यह विश्वास ही मेरी शक्ति का आधार है, चौदह वर्षों का हमारा यह तप व्यर्थ नहीं जाएगा। जाने से पहले मैं भी तुमसे एक वचन मांगता हूँ कि जब तक मैं वनवास का काल पूर्ण नहीं कर लेता तब तक मेरे वियोग में तुम अपने ये अश्रु कभी नहीं बहाओगी।
इस प्रकार लक्ष्मणजी सुहृज्जनों की अनुमति लेकर वनवास के लिये निश्चित रूप से तैयार हो इक्ष्वाकु कुल के गुरु वसिष्ठजी के यहाँ गये । वहाँ से उन्होंने उन उत्तम आयुधों को ले लिया। क्षत्रियशिरोमणि सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने सत्कार पूर्वक रखे हुए उन माल्यविभूषित समस्त दिव्य आयुधों को लाकर उन्हें श्रीराम को दिखाया।
तब मनस्वी श्रीरामने वहाँ आये हुए लक्ष्मण से प्रसन्न होकर कहा – सौम्य ! लक्ष्मण! तुम ठीक समय पर आ गये। इसी समय तुम्हारा आना मुझे अभीष्ट था। शत्रुओं को संताप देनेवाले वीर ! मेरा जो यह धन है, इसे मैं तुम्हारे साथ रहकर तपस्वी ब्राह्मणों को बाँटना चाहता हूँ। गुरुजनों के प्रति सुदृढ़ भक्तिभाव से युक्त जो श्रेष्ठ ब्राह्मण यहाँ मेरे पास रहते हैं, उनको तथा समस्त आश्रितजनों को भी मुझे अपना यह धन बाँटना है। वसिष्ठजी के पुत्र जो ब्राह्मणों में श्रेष्ठ आर्य सुयज्ञ हैं, उन्हें तुम शीघ्र यहाँ बुला लाओ। मैं इन सबका तथा और जो ब्राह्मण शेष रह गये हों, उनका भी सत्कार करके वन को जाऊँगा।

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