तारका वन में वह रात बिताकर महायशस्वी विश्वामित्र हँसते हुए मीठे स्वर में श्रीरामचन्द्रजी से बोले - महायशस्वी राजकुमार ! तुम्हारा कल्याण हो । तारका वध के कारण मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हूँ; अत: बड़ी प्रसन्नता के साथ तुम्हें सब प्रकार के अस्त्र दे रहा हूँ। इनके प्रभाव से तुम अपने शत्रुओं को चाहे वे देवता, असुर, गन्धर्व अथवा नाग ही क्यों न हों, रणभूमि में बलपूर्वक अपने अधीन करके उनपर विजय पा जाओगे।
‘रघुनन्दन! तुम्हारा कल्याण हो। आज मैं तुम्हें वे सभी दिव्यास्त्र दे रहा हूँ। वीर! मैं तुमको दिव्य एवं महान् दण्डचक्र, धर्मचक्र, कालचक्र, विष्णुचक्र तथा अत्यन्त भयंकर ऐन्द्रचक्र दूँगा। नरश्रेष्ठ राघव! इन्द्र का वज्रास्त्र, शिव का श्रेष्ठ त्रिशूल तथा ब्रह्माजी का ब्रह्मशिर नामक अस्त्र भी दूँगा। महाबाहो! साथ ही तुम्हें ऐषीकास्त्र तथा परम उत्तम ब्रह्मास्त्र भी प्रदान करता हूँ।'
'ककुत्स्थकुलभूषण ! इनके सिवा दो अत्यन्त उज्ज्वल और सुन्दर गदाएँ, जिनके नाम मोदकी और शिखरी हैं, मैं तुम्हें अर्पण करता हूँ। पुरुषसिंह राजकुमार राम! धर्मपाश, कालपाश और वरुणपाश भी बड़े उत्तम अस्त्र हैं। इन्हें भी आज तुम्हें अर्पित करता हूँ। रघुनन्दन! सूखी और गीली दो प्रकार की अशनि तथा पिनाक एवं नारायणास्त्र भी तुम्हें दे रहा हूँ। अग्नि का प्रिय आग्नेय-अस्त्र, जो शिखरास्त्र के नाम से भी प्रसिद्ध है, तुम्हें अर्पण करता हूँ। अनघ ! अस्त्रों में प्रधान जो वायव्यास्त्र है, वह भी तुम्हें दे रहा हूँ।'
‘ककुत्स्थकुलभूषण राघव! हयशिरा नामक अस्त्र, क्रौञ्च-अस्त्र तथा दो शक्तियों को भी तुम्हें देता हूँ। कङ्काल, घोर मूसल, कपाल तथा किङ्किणी आदि सब अस्त्र, जो राक्षसों के वध में उपयोगी होते हैं, तुम्हें दे रहा हूँ। महाबाहु राजकुमार! नन्दन नाम से प्रसिद्ध विद्याधरों का महान् अस्त्र तथा उत्तम खड्ग भी तुम्हें अर्पित करता हूँ। रघुनन्दन! गन्धर्वों का प्रिय सम्मोहन नामक अस्त्र, प्रस्वापन, प्रशमन तथा सौम्य अस्त्र भी देता हूँ।' 'महायशस्वी पुरुषसिंह राजकुमार ! वर्षण, शोषण, संतापन, विलापन तथा कामदेव का प्रिय दुर्जय अस्त्र मादन, गन्धर्वों का प्रिय मानवास्त्र तथा पिशाचों का प्रिय मोहनास्त्र भी मुझसे ग्रहण करो। नरश्रेष्ठ राजपुत्र महाबाहु राम ! तामस, महाबली सौमन, संवर्त, दुर्जय, मौसल, सत्य और मायामय उत्तम अस्त्र भी तुम्हें अर्पण करता हूँ। सूर्यदेवता का तेज:प्रभ नामक अस्त्र, जो शत्रु के तेज का नाश करनेवाला है, तुम्हें अर्पित करता हूँ। सोम देवता का शिशिर नामक अस्त्र, त्वष्टा (विश्वकर्मा) का अत्यन्त दारुण अस्त्र, भगदेवता का भी भयंकर अस्त्र तथा मनु का शीतेषु नामक अस्त्र भी तुम्हें देता हूँ। महाबाहु राजकुमार श्रीराम ! ये सभी अस्त्र इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, महान् बल से सम्पन्न तथा परम उदार हैं। तुम शीघ्र ही इन्हें ग्रहण करो।'
ऐसा कहकर मुनिवर विश्वामित्रजी उस समय स्नान आदि से शुद्ध हो पूर्वाभिमुख होकर बैठ गये और अत्यन्त प्रसन्नता के साथ उन्होंने श्रीरामचन्द्रजी को उन सभी उत्तम अस्त्रों का उपदेश दिया। जिन अस्त्रों का पूर्णरूप से संग्रह करना देवताओं के लिये भी दुर्लभ है, उन सबको विप्रवर विश्वामित्रजी ने श्रीरामचन्द्रजी को समर्पित कर दिया।
बुद्धिमान् विश्वामित्रजी ने ज्यों ही जप आरम्भ किया त्यों ही वे सभी परम पूज्य दिव्यास्त्र स्वतः आकर श्रीरघुनाथजी के पास उपस्थित हो गये और अत्यन्त हर्ष में भरकर उस समय श्रीरामचन्द्रजी से हाथ जोड़कर कहने लगे - परम उदार रघुनन्दन! आपका कल्याण हो। हम सब आपके किङ्कर हैं। आप हमसे जो-जो सेवा लेना चाहेंगे, वह सब हम करने को तैयार रहेंगे।
उन महान् प्रभावशाली अस्त्रों के इस प्रकार कहने पर श्रीरामचन्द्रजी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें ग्रहण करने के पश्चात् हाथ से उनका स्पर्श करके बोले - आप सब मेरे मन में निवास करें।
तदनन्तर महातेजस्वी श्रीराम ने प्रसन्नचित्त होकर महामुनि विश्वामित्र को प्रणाम किया और आगे की यात्रा आरम्भ की। उन अस्त्रों को ग्रहण करके परम पवित्र श्रीराम का मुख प्रसन्नता से खिल उठा था। वे चलते-चलते ही विश्वामित्र से बोले – भगवन्! आपकी कृपा से इन अस्त्रों को ग्रहण करके मैं देवताओं के लिये भी दुर्जय हो गया हूँ। मुनिश्रेष्ठ ! अब मैं अस्त्रों की संहारविधि जानना चाहता हूँ।
ककुत्स्थकुल तिलक श्रीराम के ऐसा कहने पर महातपस्वी, धैर्यवान्, उत्तम व्रतधारी और पवित्र विश्वामित्र मुनि ने उन्हें अस्त्रों की संहारविधि का उपदेश दिया। तदनन्तर वे बोले - रघुकुलनन्दन राम! तुम्हारा कल्याण हो ! तुम अस्त्रविद्या के सुयोग्य पात्र हो; अतः निम्नाकित अस्त्रों को भी ग्रहण करो - सत्यवान्, सत्यकीर्ति, धृष्ट, रभस, प्रतिहारतर, प्राङ्मुख, अवाङ्मुख, लक्ष्य, अलक्ष्य, दृढ़नाभ, सुनाभ, दशाक्ष, शतवत्रक, दशशीर्ष, शतोदर, पद्मनाभ, महानाभ, दुन्दुनाभ, स्वनाभ, ज्योतिष, शकुन, नैरास्य, विमल, दैत्यनाशक यौगंधर और विनिद्र, शुचिबाहु, महाबाहु, निष्कलि, विरुच, सार्चिमाली, धृतिमाली, वृत्तिमान्, रुचिर, पित्र्य, सौमनस, विधूत, मकर, परवीर, रति, धन, धान्य, कामरूप, कामरुचि, मोह, आवरण, जृम्भक, सर्पनाथ, पन्थान और वरुण - ये सभी प्रजापति कृशाश्व के पुत्र हैं। ये इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले तथा परम तेजस्वी हैं। तुम इन्हें ग्रहण करो।
तब ‘बहुत अच्छा' कहकर श्रीरामचन्द्रजी ने प्रसन्न मन से उन अस्त्रों को ग्रहण किया। उन मूर्तिमान् अस्त्रों के शरीर दिव्य तेज से उद्भासित हो रहे थे। वे अस्त्र जगत को सुख देनेवाले थे। उनमें से कितने ही अंगारों के समान तेजस्वी थे। कितने ही धूम के समान काले प्रतीत होते थे तथा कुछ अस्त्र सूर्य और चन्द्रमा के समान प्रकाशमान थे। वे सब-के-सब हाथ जोड़कर श्रीराम के समक्ष खड़े हुए।
उन्होंने अञ्जलि बाँधे मधुर वाणी में श्रीराम से इस प्रकार कहा - पुरुषसिंह! हमलोग आपके दास हैं। आज्ञा कीजिये, हम आपकी क्या सेवा करें ?
तब रघुकुलनन्दन राम ने उनसे कहा - इस समय तो आपलोग अपने अभीष्ट स्थान को जाये; परंतु आवश्यकता के समय मेरे मन में स्थित होकर सदा मेरी सहायता करते रहें।
तत्पश्चात् वे श्रीराम की परिक्रमा करके उनसे विदा ले उनकी आज्ञा के अनुसार कार्य करने की प्रतिज्ञा करके जैसे आये थे, वैसे चले गये। इस प्रकार उन अस्त्रों का ज्ञान प्राप्त करके श्रीरघुनाथजी ने चलते-चलते ही महामुनि विश्वामित्र से मधुर वाणी में पूछा - भगवन्! सामनेवाले पर्वत के पास ही जो यह मेघों की घटा के समान सघन वृक्षों से भरा स्थान दिखायी देता है, क्या है? उसके विषय में जानने के लिये मेरे मन में बड़ी उत्कण्ठा हो रही है। यह दर्शनीय स्थान मृगों के झुंड से भरा हुआ होने के कारण अत्यन्त मनोहर प्रतीत होता है। नाना प्रकार के पक्षी अपनी मधुर शब्दावली से इस स्थान की शोभा बढ़ाते हैं। मुनिश्रेष्ठ! इस प्रदेश की इस सुखमयी स्थिति से यह जान पड़ता है कि अब हमलोग उस रोमाञ्चकारी दुर्गम तारका वन से बाहर निकल आये हैं।
'भगवन्! मुझे सब कुछ बताइये। यह किसका आश्रम है? भगवन्! महामुने! जहाँ आपकी यज्ञक्रिया हो रही है, जहाँ वे पापी, दुराचारी, ब्रह्महत्यारे, दुरात्मा राक्षस आपके यज्ञ में विघ्न डालने के लिये आया करते हैं और जहाँ मुझे यज्ञ की रक्षा तथा राक्षसों के वध का कार्य करना है, उस आपके आश्रम का कौन-सा देश है? ब्रह्मन् ! मुनिश्रेष्ठ प्रभो! यह सब मैं सुनना चाहता हूँ।'

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