भाग-२४(24) श्रीराम से लक्ष्मण का साथ वन में चलने के लिए विनती करना

 


जिस समय श्रीराम और सीता में बातचीत हो रही थी, लक्ष्मण वहाँ पहले से ही आ गये थे। उन दोनों का ऐसा संवाद सुनकर उनका मुखमण्डल आँसुओं से भीग गया। भाई के विरह का शोक अब उनके लिये भी असह्य हो उठा।  

रघुकुल को आनन्दित करनेवाले लक्ष्मण ने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामचन्द्रजी के दोनों पैर जोर से पकड़ लिये और अत्यन्त यशस्विनी सीता तथा महान् व्रतधारी श्रीरघुनाथजी से कहा – आर्य! यदि आपने सहस्रों वन्य पशुओं तथा हाथियों से भरे हुए वन में जाने का निश्चय कर ही लिया है तो मैं भी आपका अनुसरण करूँगा। धनुष हाथ में लेकर आगे-आगे चलूँगा। आप मेरे साथ पक्षियों के कलरव और भ्रमर- समूहों के गुञ्जारव से गूँजते हुए रमणीय वनों में सब ओर विचरण कीजियेगा। मैं आपके बिना स्वर्ग में जाने, अमर होने तथा सम्पूर्ण लोकों का ऐश्वर्य प्राप्त करने की भी इच्छा नहीं रखता। 

वनवास के लिये निश्चित विचार करके ऐसी बात कहने वाले सुमित्रा कुमार लक्ष्मण को श्रीरामचन्द्रजी ने बहुत-से सान्त्वना पूर्ण वचनों द्वारा समझाकर जब वन में चलने से मना किया, तब वे फिर बोले - भैया! आपने तो पहले से ही मुझे अपने साथ रहने की आज्ञा दे रखी है, फिर इस समय आप मुझे क्यों रोकते हैं? निष्पाप रघुनन्दन! जिस कारण से आपके साथ चलने की इच्छा वाले मुझको आप मना करते हैं, उस कारण को मैं जानना चाहता हूँ। मेरे हृदय में इसके लिये बड़ा संशय हो रहा है। 

ऐसा कहकर धीर-वीर लक्ष्मण आगे जाने के लिये तैयार हो भगवान् श्रीराम के सामने खड़े हो गये और हाथ जोड़कर याचना करने लगे। तब महातेजस्वी श्रीराम ने उनसे कहा - लक्ष्मण! तुम मेरे स्नेही, धर्मपरायण, धीर-वीर तथा सदा सन्मार्ग में स्थित रहने वाले हो। मुझे प्राणों के समान प्रिय हो तथा मेरे वश में रहनेवाले आज्ञापालक और सखा हो। सुमित्रानन्दन! यदि आज मेरे साथ तुम भी वन को चल दोगे तो परम यशस्विनी माता कौशल्या और सुमित्रा की सेवा कौन करेगा? जैसे मेघ पृथ्वी पर जल की वर्षा करता है, उसी प्रकार जो सबकी कामनाएँ पूर्ण करते थे, वे महातेजस्वी महाराज दशरथ अब माता कैकेयी के प्रेमपाश में बँध गये हैं। 

‘केकयराज अश्वपति की पुत्री कैकेयी महाराज के इस राज्य को पाकर मेरे वियोग के दु:ख में डूबी हुई अपनी सौतों के साथ अच्छा बर्ताव नहीं करेगी। भरत भी राज्य पाकर माता कैकेयी के अधीन रहने के कारण दुःखिया माता कौशल्या और सुमित्रा का भरण-पोषण नहीं करेंगे। अत: सुमित्राकुमार! तुम यहीं रहकर अपने प्रयत्न से अथवा राजा की कृपा प्राप्त करके माता कौशल्या का पालन करो। मेरे बताये हुए इस प्रयोजन को ही सिद्ध करो। ऐसा करने से मेरे प्रति जो तुम्हारी भक्ति है, वह भी भलीभाँति प्रकट हो जायेगी तथा धर्मज्ञ गुरुजनों की पूजा करने से जो अनुपम एवं महान् धर्म होता है, वह भी तुम्हें प्राप्त हो जायेगा। रघुकुल को आनन्दित करनेवाले सुमित्राकुमार! तुम मेरे लिये ऐसा ही करो; क्योंकि हम लोगों से बिछुड़ी हुई हमारी माँ को कभी सुख नहीं होगा वह सदा हमारी ही चिन्ता में डूबी रहेगी। 

श्रीराम के ऐसा कहने पर बातचीत के मर्म को समझने वाले लक्ष्मण ने उस समय बात का तात्पर्य समझने वाले श्रीराम को मधुर वाणी में उत्तर दिया - वीर! आपके ही तेज (प्रभाव) से भरत माता कौशल्या और सुमित्रा दोनों का पवित्र भाव से पूजन करेंगे, इसमें संशय नहीं है। वीरवर! इस उत्तम राज्य को पाकर यदि भरत बुरे रास्ते पर चलेंगे और दूषित हृदय एवं विशेषतः घमण्ड के कारण माताओं की रक्षा नहीं करेंगे तो मैं उन दुर्बुद्धि और क्रूर भरत का तथा उनके पक्ष का समर्थन करने वाले उन सब लोगों का वध कर डालूँगा; इसमें संशय नहीं है। यदि सारी त्रिलोकी उनका पक्ष करने लगे तो उसे भी अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा, परंतु बड़ी माता कौशल्या तो स्वयं ही मेरे जैसे सहस्रों मनुष्यों का भी भरण कर सकती हैं; क्योंकि उन्हें अपने आश्रितों का पालन करने के लिये एक सहस्र गाँव मिले हुए हैं।

‘इसलिये वे मनस्विनी कौशल्या स्वयं ही अपना, मेरी माता का तथा मेरे जैसे और भी बहुत-से मनुष्यों का भरण-पोषण करने में समर्थ हैं। अत: आप मुझको अपना अनुगामी बना लीजिये। इसमें कोई धर्म की हानि नहीं होगी। मैं कृतार्थ हो जाऊँगा तथा आपका भी प्रयोजन मेरे द्वारा सिद्ध हुआ करेगा। प्रत्यञ्चासहित धनुष लेकर खंती और पिटारी लिये आपको रास्ता दिखाता हुआ मैं आपके आगे-आगे चलूँगा। प्रतिदिन आपके लिये फल - मूल लाऊँगा तथा तपस्वी जनों के लिये वन में मिलने वाली तथा अन्यान्य हवन- सामग्री जुटाता रहूँगा। आप विदेहकुमारी के साथ पर्वतशिखरों पर भ्रमण करेंगे। वहाँ आप जागते हों या सोते, मैं हर समय आपके सभी आवश्यक कार्य पूर्ण करूँगा।' 

लक्ष्मण की इस बात से श्रीरामचन्द्रजी को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने उनसे कहा – सुमित्रानन्दन ! जाओ, माता आदि सभी सुहृदों से मिलकर अपनी वनयात्रा के विषयमें पूछ लो - उनकी आज्ञा एवं अनुमति ले लो। लक्ष्मण! राजा जनक के महान् यज्ञ में स्वयं महात्मा वरुण ने उन्हें जो देखने में भयंकर दो दिव्य धनुष दिये थे, साथ ही, जो दो दिव्य अभेद्य कवच, अक्षय बाणों से भरे हुए दो तरकस तथा सूर्य की भाँति निर्मल दीप्ति से दमकते हुए जो दो सुवर्ण भूषित खड्ग प्रदान किये थे (वे सभी दिव्यास्त्र मिथिलानरेश ने मुझे दहेज में दे दिये थे), उन सबको आचार्यदेव के घर में सत्कार पूर्वक रखा गया है। तुम उन सारे आयुधों को लेकर शीघ्र लौट आओ। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-२४(24) समाप्त !

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