श्रीराम के समझाने पर मिथिलेशकुमारी जानकी वनवास की आज्ञा प्राप्त करने के लिये अपने पति से फिर इस प्रकार बोलीं। सीता अत्यन्त डरी हुई थीं। वे प्रेम और स्वाभिमान के कारण विशाल वक्षःस्थल वाले श्रीरामचन्द्रजी पर आक्षेप- सा करती हुई कहने लगीं - नाथ! क्या मेरे पिता मिथिलानरेश विदेहराज जनक ने आपको जामाता के रूप में पाकर कभी यह भी समझा था कि आप केवल शरीर से ही पुरुष हैं; कार्यकलाप से तो स्त्री ही हैं। नाथ! आपके मुझे छोड़कर चले जाने पर संसार के लोग अज्ञानवश यदि यह कहने लगे कि सूर्य के समान तपने वाले श्रीरामचन्द्र में तेज और पराक्रम का अभाव है तो उनकी यह असत्य धारणा मेरे लिये कितने दुःख की बात होगी।
'आप क्या सोचकर विषाद में पड़े हुए हैं अथवा किससे आपको भय हो रहा है, जिसके कारण आप अपनी पत्नी मुझ सीता का, जो एकमात्र आपके ही आश्रित है, परित्याग करना चाहते हैं। जैसे सावित्री द्युमत्सेनकुमार वीरवर सत्यवान की ही अनुगामिनी थी, उसी प्रकार आप मुझे भी अपनी ही आज्ञा के अधीन समझिये। निष्पाप रघुनन्दन! जैसी दूसरी कोई कुलकलड्किनी स्त्री परपुरुष पर दृष्टि रखती है, वैसी में नहीं हूँ। मैं तो आपके सिवा किसी दूसरे पुरुष को मन से भी नहीं देख सकती। इसलिये आपके साथ ही चलूँगी (आपके बिना अकेली यहाँ नहीं रहूँगी)।'
‘श्रीराम! जिसका कुमारावस्था में ही आपके साथ विवाह हुआ है और जो चिरकाल तक आपके साथ रह चुकी है, उसी मुझ अपनी सती-साध्वी पत्नी को आप औरत की कमाई खाने वाले नट की भाँति दूसरों के हाथ में सौंपना चाहते हैं?'
'निष्पाप रघुनन्दन! आप मुझे जिसके अनुकूल चलने की शिक्षा दे रहे हैं और जिसके लिये आपका राज्याभिषेक रोक दिया गया है, उस भरत के सदा ही वशवर्ती और आज्ञापालक बनकर आप ही रहिये, मैं नहीं रहूंगी। इसलिये आपका मुझे अपने साथ लिये बिना वन की ओर प्रस्थान करना उचित नहीं है। यदि तपस्या करनी हो, वन में रहना हो अथवा स्वर्ग में जाना हो तो सभी जगह मैं आपके साथ रहना चाहती हूँ। जैसे बगीचे में घूमने और पलंग पर सोने में कोई कष्ट नहीं होता, उसी प्रकार आपके पीछे-पीछे वन के मार्ग पर चलने में भी मुझे कोई परिश्रम नहीं जान पड़ेगा। रास्ते में जो कुश-कास, सरकंडे, सींक और कटिदार वृक्ष मिलेंगे, उनका स्पर्श मुझे आपके साथ रहने से रूई और मृगचर्म के समान सुखद प्रतीत होगा।'
'प्राणवल्लभ! प्रचण्ड आँधी से उड़कर मेरे शरीर पर जो धूल पड़ेगी, उसे मैं उत्तम चन्दन के समान समझूंगी। जब वन के भीतर रहूंगी, तब आपके साथ घासों पर भी सो लूंगी। रंग-बिरंगे कालीनों और मुलायम बिछौनों से युक्त पलंगों पर क्या उससे अधिक सुख हो सकता है ? आप अपने हाथ से लाकर थोड़ा या बहुत फल, मूल या पत्ता, जो कुछ दे देंगे, वही मेरे लिये अमृत-रस के समान होगा। ऋतु के अनुकूल जो भी फल-फूल प्राप्त होगे, उन्हें खाकर रहूंगी और माता-पिता अथवा महल को कभी याद नहीं करूँगी।'
'यहाँ रहते समय मेरा कोई भी प्रतिकूल व्यवहार आप नहीं देख सकेंगे। मेरे लिये आपको कोई कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा। मेरा निर्वाह आपके लिये दुष्कर नहीं होगा। आपके साथ जहाँ भी रहना पड़े, यही मेरे लिये स्वर्ग है और आपके बिना जो कोई भी स्थान हो, वह मेरे लिये नरक के समान है। स्वामी! मेरे इस निश्चय को जानकर आप मेरे साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक वन को चलें। मुझे वनवास के कष्ट से कोई घबराहट नहीं है। यदि इस दशा में भी आप अपने साथ मुझे वन में नहीं ले चलेंगे तो मैं आज ही विष पी लूंगी, परंतु किसी परपुरुष के अधीन होकर नहीं रहूँगी।'
'नाथ! यदि आप मुझे त्यागकर वन को चले जायेंगे तो पीछे भी इस भारी दुःख के कारण मेरा जीवित रहना सम्भव नहीं है ऐसी दशा में इसी समय आपके जाते ही अपना प्राण त्याग देना अच्छा समझती हूँ। आपके विरह का यह शोक मैं दो घड़ी भी नहीं सह सकूँगी। फिर मुझ दुःखिया से यह चौदह वर्षों तक कैसे सहा जायेगा ?'
इस प्रकार बहुत देर तक करुणा जनक विलाप करके शोक संतप्त हुई सीता शिथिल हो अपने पति को जोर से पकड़कर उनका गाड़ आलिङ्गन करके फूट-फूटकर रोने लगीं। जैसे कोई हनी विष में बुझे हुए बहुसंख्यक बाणों द्वारा पावन कर दी गयी हो, उसी प्रकार सीता श्रीरामचन्द्रजी के पूर्वोक्त अनेकानेक वचनों द्वारा मर्माहत हो उठी थी अतः जैसे अरणी आग प्रकट करती है, उसी प्रकार वे बहुत देर से रोके हुए आँसुओं को बरसाने लगीं। उनके दोनों नेत्रों से स्फटिक के समान निर्मल संताप जनित अश्रु बह रहा था, मानो दो कमलों से जल की धारा गिर रही हो।
बड़े-बड़े नेत्रों से सुशोभित और पूर्णिमा के निर्मल चन्द्रमा के समान कान्तिमान् उनका यह मनोहर मुख संताप जनित ताप के कारण पानी से बाहर निकाले हुए कमल के समान सूख-सा गया था। सीताजी दुःख के मारे अचेत्-सी हो रही थीं।
श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें दोनों हाथों से शालकर हृदय से लगा लिया और उस समय उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा - देवी! तुम्हें दुःख देकर मुझे स्वर्ग का सुख मिलता हो तो मैं उसे भी लेना नहीं चाहूँगा स्वयम्भू ब्रह्माजी की भांति मुझे किसी से किञ्चित् भी भय नहीं है। शुभानने! यद्यपि वन में तुम्हारी रक्षा करने के लिये मैं सर्वदा समर्थ हूँ तो भी तुम्हारे हार्दिक अभिप्राय को पूर्णरूप से जाने बिना तुमको वनवासिनी बनाना मैं उचित नहीं समझता था।
'मिथिलेशकुमारी! जब तुम मेरे साथ वन में रहने के लिये ही उत्पन्न हुई हो तो मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता, ठीक उसी तरह जैसे आत्मज्ञानी पुरुष अपनी स्वाभाविक प्रणता का त्याग नहीं करते। हाथी की सूँड के समान जप वाली जनक किशोरी पूर्वकाल के सत्पुरुषों ने अपनी पत्नी के साथ रहकर जिस धर्म का आचरण किया था, उसी का मैं भी तुम्हारे साथ रहकर अनुसरण करूँगा तथा जैसे सुवर्चला (संज्ञा) अपने पति सूर्य का अनुगमन करती है, उसी प्रकार तुम भी मेरा अनुसरण करो।'
'जनकनन्दिनि! यह तो किसी प्रकार सम्भव ही नहीं है कि मैं वन को न जाऊँ क्योंकि पिताजी का यह सत्ययुक्त वचन ही मुझे वन की ओर ले जा रहा है। सीते ! पिता और माता की आज्ञा के अधीन रहना पुत्र का धर्म है, इसलिये मैं उनकी आज्ञा का उल्लङ्घन करके जीवित नहीं रह सकता। जो अपनी सेवा के अधीन है, उन प्रत्यक्ष देवता माता पिता एवं गुरु का उल्लघन करके जो सेवा के अधीन नहीं है, उस अप्रत्यक्ष देवता देवी की विभिन्न प्रकार से किस तरह आराधना की जा सकती हैं।'
'सुन्दर नेत्रप्रान्तवाली सीते जिनकी आराधना करने पर धर्म, अर्थ और काम तीनों प्राप्त होते हैं तथा तीनों लोकों की आराधना सम्पन्न हो जाती है, उन माता, पिता और गुरु के समान दूसरा कोई पवित्र देवता इस भूतल पर नहीं है। इसीलिये भूतल के निवासी इन तीनों देवताओं की आराधना करते हैं। सीते! पिता की सेवा करना कल्याण की प्राप्ति का जैसा प्रबल साधन माना गया है, वैसा न सत्य है, न दान है, न मान है और न पर्याप्त दक्षिणा वाले यश ही है।'
'गुरुजनों की सेवा का अनुसरण करने से स्वर्ग, धन-धान्य, विद्या, पुत्र और सुख कुछ भी दुर्लभ नहीं है। माता-पिता की सेवा में लगे रहने वाले महात्मा पुरुष देवलोक, गन्धर्वलोक, ब्रह्मलोक, गोलोक तथा अन्य लोकों को भी प्राप्त कर लेते हैं। इसीलिये सत्य और धर्म के मार्ग पर स्थित रहने वाले पूज्य पिताजी मुझे जैसी आज्ञा दे रहे हैं. मैं वैसा ही बर्ताव करना चाहता है, क्योंकि वह सनातन धर्म है।'
'सीते! 'मैं आपके साथ वन में निवास करूँगी ऐसा कहकर तुमने मेरे साथ चलने का दृढ निश्चय कर लिया है, इसलिये तुम्हें दण्डकारण्य से चलने के सम्बन्ध में जो मेरा पहला विचार था, वह अब बदल गया है। मदशरे नेत्रोंवाली सुन्दरी! अब मैं तुम्हें वन में चलने के लिये आज्ञा देता हूँ। भीरु! तुम मेरी अनुगामिनी बनो और मेरे साथ रहकर धर्म का आचरण करो।'
'प्राणवल्लभे सीते! तुमने मेरे साथ चलने का जो यह परम सुन्दर निश्चय किया है. यह तुम्हारे और मेरे कुल के सर्वथा योग्य ही है। सुलक्षीणी! अब तुम वनवास के योग्य दान आदि कर्म प्रारम्भ करो। सीते! इस समय तुम्हारे इस प्रकार दृढ़ निश्चय कर लेने पर तुम्हारे बिना स्वर्ग भी मुझे अच्छा नहीं लगता है। ब्राह्मणों को रत्न स्वरूप उत्तम वस्तुएँ दान करो और भोजन माँगने वाले भिक्षुकों को भोजन दो शीघ्रता करो, विलम्ब नहीं होना चाहिये।'
'तुम्हारे पास जितने बहुमूल्य आभूषण, जो-जो अच्छे-अच्छे वस्त्र हो, जो कोई भी रमणीय पदार्थ हो तथा मनोरञ्जन की जो-जो सुन्दर सामग्रियाँ हो मेरे और तुम्हारे उपयोग में आने वाली जो उत्तमोत्तम शय्याएँ, सवारियों तथा अन्य वस्तुएँ हों, उनमें से ब्राह्मणों को दान करने के पश्चात् जो बचे उन सबको अपने सेवकों को बाँट दो।'
'स्वामी ने वन में मेरा जाना स्वीकार कर लिया मेरा वन गमन उनके मन के अनुकूल हो गया' यह जानकर देवी सीता बहुत प्रसन्न हुई और शीघ्रतापूर्वक सब वस्तुओं का दान करने में जुट गयीं। तदनन्तर अपना मनोरथ पूर्ण हो जाने से अत्यन्त हर्ष में भरी हुई यशस्विनी एवं मनस्विनी सीता देवी स्वामी के आदेश पर विचार करके धर्मात्मा ब्राह्मणों को धन और रत्नों का दान करने के लिये उद्यत हो गयी।

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