भाग-२२(22) सीता की श्रीराम से अपने को भी साथ ले चलने के लिये प्रार्थना, श्रीराम का वनवास के कष्ट का वर्णन करते हुए सीता को वहाँ चलने से मना करना

 



श्रीराम के ऐसा कहने पर प्रियवादिनी विदेहकुमारी सीताजी, जो सब प्रकार से अपने स्वामी का प्यार पाने योग्य थीं, प्रेम से ही कुछ कुपित होकर पति से इस प्रकार बोलीं - नरश्रेष्ठ श्रीराम! आप मुझे ओछी समझकर यह क्या कह रहे हैं? आपकी ये बातें सुनकर मुझे बहुत हंसी आती है। नरेश्वर! आपने जो कुछ कहा है, वह अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञाता वीर राजकुमारों के योग्य नहीं है। वह अपयश का टीका लगाने वाला होने के कारण सुनने योग्य भी नहीं है।

'आर्यपुत्र! पिता, माता, भाई, पुत्र और पुत्रवधू – ये सब पुण्यादि कर्मों का फल भोगते हुए अपने-अपने भाग्य (शुभाशुभ कर्म) के अनुसार जीवन निर्वाह करते हैं। पुरुषप्रवर! केवल पत्नी ही अपने पति के भाग्य का अनुसरण करती है, अतः आपके साथ ही मुझे भी वन में रहने की आशा मिल गयी है। नारियों के लिये इस लोक और परलोक में एकमात्र पति ही सदा आश्रय देनेवाला है। पिता, पुत्र, माता, सखियाँ तथा अपना यह शरीर भी उसका सच्चा सहायक नहीं है।' 

‘रघुनन्दन्! यदि आप आज ही दुर्गम वन की ओर प्रस्थान कर रहे हैं तो मैं रास्ते के कुश और काँटों को कुचलती हुई आपके आगे-आगे चलूँगी। अतः वीर! आप ईर्ष्या और रोष को दूर करके पीने से बचे हुए जल की भाँति मुझे निःशङ्क होकर साथ ले चलिये। मुझमें ऐसा कोई पाप अपराध नहीं है, जिसके कारण आप मुझे यहाँ त्याग दें। ऊँचे-ऊँचे महलों में रहना, विमानों पर चढ़कर घूमना अथवा अणिमा आदि सिद्धियों के द्वारा आकाश में विचरना इन सबकी अपेक्षा स्त्री के लिये सभी अवस्थाओं में पति के चरणों की छाया में रहना विशेष महत्त्व रखता है।'  

'मुझे किसके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये, इस विषय में मेरी माता और पिता ने मुझे अनेक प्रकार से शिक्षा दी है। इस समय इसके विषय में मुझे कोई उपदेश देने की आवश्यकता नहीं है। अतः नाना प्रकार के वन्य पशुओं से व्याप्त तथा सिंहों और व्याघ्रों से सेवित उस निर्जन एवं दुर्गम वन में मैं अवश्य चलूँगी। मैं तो जैसे अपने पिता के घर में रहती थी, उसी प्रकार उस वन में भी सुखपूर्वक निवास करूँगी। वहीं तीनों लोकों के ऐश्वर्य को भी कुछ न समझती हुई मैं सदा पतिव्रत धर्म का चिन्तन करती हुई आपकी सेवा में लगी रहूंगी।' 

'वीर! नियमपूर्वक रहकर ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करूंगी और सदा आपकी सेवा में तत्पर रहकर आप ही के साथ मीठी-मीठी सुगन्ध से भरे हुए वनों में विचरुँगी। दूसरों को मान देनेवाले श्रीराम! आप तो वन में रहकर दूसरे लोगों की भी रक्षा कर सकते हैं, फिर मेरी रक्षा करना आपके लिये कौन बड़ी बात है? महाभाग! अतः मैं आपके साथ आज अवश्य वन में चलूंगी। इसमें संशय नहीं है। मैं हर तरह चलने को तैयार हूँ। मुझे किसी तरह भी रोका नहीं जा सकता।' 

'यहाँ चलकर मैं आपको कोई कष्ट नहीं दूँगी, सदा आपके साथ रहूंगी और प्रतिदिन फल मूल खाकर ही निर्वाह करूंगी। मेरे इस कथन में किसी प्रकार के संदेह के लिये स्थान नहीं है। मैं आपके आगे-आगे चलूँगी और आपके भोजन कर लेने पर जो कुछ बचेगा, उसे ही खाकर रहुँगी। प्रभो! मेरी बड़ी इच्छा है कि मैं आप बुद्धिमान् प्राणनाथ के साथ निर्भय हो वन में सर्वत्र घूमकर पर्वतों, छोटे-छोटे तालाबों और सरोवरों को देखूं।' 

'आप मेरे वीर स्वामी हैं। मैं आपके साथ रहकर सुखपूर्वक उन सुन्दर सरोवरों की शोभा देखना चाहती हूँ, जो श्रेष्ठ कमलपुष्पों से सुशोभित हैं तथा जिनमें हंस और कारण्डव आदि पक्षी भरे रहते हैं। विशाल नेत्रोंवाले आर्यपुत्र! आपके चरणों में अनुरक्त रहकर मैं प्रतिदिन उन सरोवरों में स्नान करूंगी और आपके साथ वहाँ सब ओर विचरुँगी, इससे मुझे परम आनन्द का अनुभव होगा। इस तरह सैकड़ों या हजारों वर्षों तक भी यदि आपके साथ रहने का सौभाग्य मिले तो मुझे कभी कष्ट का अनुभव नहीं होगा। यदि आप साथ न हों तो मुझे स्वर्गलोक की प्राप्ति भी अभीष्ट नहीं है।' 

‘पुरुषसिंह रघुनन्दन! आपके बिना यदि मुझे स्वर्गलोक का निवास भी मिल रहा हो तो वह मेरे लिये रुचिकर नहीं हो सकता मैं उसे लेना नहीं चाहूँगी। प्राणनाथ! अतः उस अत्यन्त दुर्गम वन में, जहाँ सहस्रों मृग, वानर और हाथी निवास करते हैं, मैं अवश्य चलूँगी और आपके ही चरणों की सेवा में रहकर आपके अनुकूल चलती हुई उस वन में उसी तरह सुख से रहूंगी, जैसे पिता के घर में रहा करती थी। मेरे हृदय का सम्पूर्ण प्रेम एकमात्र आपको ही अर्पित है, आपके सिवा और कहीं मेरा मन नहीं जाता, यदि आपसे वियोग हुआ तो निश्चय ही मेरी मृत्यु हो जायगी। इसलिये आप मेरी याचना सफल करें, मुझे साथ ले चलें, यही अच्छा होगा; मेरे रहने से आप पर कोई भार नहीं पड़ेगा।' 

धर्म में अनुरक्त रहने वाली सीता के इस प्रकार प्रार्थना करने पर भी नरश्रेष्ठ श्रीराम को उन्हें साथ ले जाने की इच्छा नहीं हुई। वे उन्हें वनवास के विचार से निवृत्त करने के लिये वहाँ के कष्टों का अनेक प्रकार से विस्तारपूर्वक वर्णन करने लगे। 

धर्म को जानने वाली सीता के इस प्रकार कहने पर भी धर्मवत्सल श्रीराम ने वन में होनेवाले दुःखों को सोचकर उन्हें साथ ले जाने का विचार नहीं किया। सीता के नेत्रों में आँसू भरे हुए थे। धर्मात्मा श्रीराम उन्हें वनवास के विचार से निवृत्त करने के लिये सान्त्वना देते हुए इस प्रकार बोले - सीते! तुम अत्यन्त उत्तम कुल में उत्पन्न हुई हो और सदा धर्म के आचरण में ही लगी रहती हो अतः यहीं रहकर धर्म का पालन करो, जिससे मेरे मन को संतोष हो। सीते! मैं तुमसे जैसा कहूँ, वैसा ही करना तुम्हारा कर्तव्य है। तुम अबला हो, वन में निवास करने वाले मनुष्य को बहुत-से दोष प्राप्त होते हैं; उन्हें बता रहा हूँ, मुझसे सुनो। 

'सीते! वनवास के लिये चलने का यह विचार छोड़ दो, वन को अनेक प्रकार के दोषों से व्याप्त और दुर्गम बताया जाता है। तुम्हारे हित की भावना से ही मैं ये सब बातें कह रहा हूँ। जहाँ तक मेरी जानकारी है, वन में सदा सुख नहीं मिलता। वहाँ तो सदा दुःख ही मिला करता है। पर्वतों से गिरने वाले झरनों के शब्द को सुनकर उन पर्वतों की कन्दराओं में रहनेवाले सिंह दहाड़ने लगते हैं। उनकी वह गर्जना सुनने में बड़ी दुःखदायिनी प्रतीत होती है, इसलिये वन दुःखमय ही है।' 

'सीते! सूने वन में निर्भय होकर क्रीड़ा करनेवाले मतवाले जंगली पशु मनुष्य को देखते ही उस पर चारों ओर से टूट पड़ते हैं; अतः वन दुःख से भरा हुआ है। वन में जो नदियाँ होती हैं, उनके भीतर ग्राह निवास करते हैं, उनमें कीचड़ अधिक होने के कारण उन्हें पार करना अत्यन्त कठिन होता है। इसके सिवा उनमें मतवाले हाथी सदा घूमते रहते हैं। इस सब कारणों से वन बहुत ही दुःखदायक होता है। वन के मार्ग लताओं और काँटों से भरे रहते हैं। वहाँ जंगली मुर्गे बोला करते हैं, उन मार्गों पर चलने में बड़ा कष्ट होता है तथा वहाँ आस-पास जल नहीं मिलता, इससे वन में दुःख ही दुःख है। दिनभर के परिभ्रम से थके-माँदे मनुष्य को रात में जमीन के ऊपर अपने-आप गिरे हुए सूखे पत्तों के बिछौने पर सोना पड़ता है, अतः वन दुःख से भरा हुआ है।' 

‘सीते! वहाँ मन को वश में रखकर वृक्षों से स्वतः गिरे हुए फलों के आहार पर ही दिन-रात संतोष करना पड़ता है, अतः वन दुःख देनेवाला ही है। मिथिलेशकुमारी! अपनी शक्ति के अनुसार उपवास करना, सिर पर जटा का भार ढोना और वल्कल वस्त्र धारण करना यही वहाँ की जीवनशैली है। देवताओं का पितरों का तथा आये हुए अतिथियों का प्रतिदिन शास्त्रोक्तविधि के अनुसार पूजन करना यह वनवासी का प्रधान कर्तव्य है। वनवासी को प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों समय खान करना होता है। इसलिये वन बहुत ही कष्ट देनेवाला है।'  

'सीते! यहाँ स्वयं चुनकर लाये हुए फूलों द्वारा वेदोक्त विधि से वेदी पर देवताओं की पूजा करनी पड़ती है। इसलिये वन को कष्टप्रद कहा गया है। मिथिलेशकुमारी जानकी! वनवासियों को जब जैसा आहार मिल जाये उसी पर संतोष करना पड़ता है; अतः वन दुःखरूप ही है। वन में प्रचण्ड आँधी, घोर अन्धकार, प्रतिदिन भूख का कष्ट तथा और भी बड़े-बड़े भय प्राप्त होते हैं, अतः वन अत्यन्त कष्टप्रद है।' 

‘भामिनि! वहाँ बहुत-से पहाड़ी सर्प, जो अनेक प्रकार के रूप वाले होते हैं, दर्पवश बीच रास्ते में विचरते रहते हैं; अतः वन अत्यन्त कष्टदायक है। जो नदियों में निवास करते और नदियों के समान ही कुटिल गति से चलते हैं, ऐसे बहुसंख्यक सर्प वन में रास्ते को घेरकर पड़े रहते हैं; इसलिये वन बहुत ही कष्टदायक है। अबले! पतंगे, बिच्छू, कीड़े, डाँस और मच्छर वहाँ सदा कष्ट पहुँचाते रहते हैं, अतः सारा वन दुःखरूप ही है।' 

'भामिनि! वन में काँटेदार वृक्ष, कुश और कास होते हैं, जिनकी शाखाओं के अग्रभाग सब ओर फैले हुए होते हैं; इसलिये वन विशेष कष्टदायक होता है। वन में निवास करने वाले मनुष्य को बहुत से शारीरिक क्लेशों और नाना प्रकार के भयों का सामना करना पड़ता है, अत: वन सदा दुःख रूप ही होता है। यहाँ क्रोध और लोभ को त्याग देना होता है, तपस्या में मन लगाना पड़ता है और जहाँ भय का स्थान है, वहाँ भी भयभीत न होने की आवश्यकता होती है; अतः वन में सदा दुःख ही दुःख है। इसलिये तुम्हारा वन में जाना ठीक नहीं है। वहीं जाकर तुम सकुशल नहीं रह सकती। मैं बहुत सोच विचार कर देखता और समझता हूँ कि वन में रहना अनेक दोषों का उत्पादक बहुत ही कष्टदायक है।' 

जब महात्मा श्रीराम ने उस समय सीता को वन में ले जाने का विचार नहीं किया, तब सीता ने भी उनकी उस बात को नहीं माना। 

श्रीरामचन्द्रजी की यह बात सुनकर सीता को बड़ा दुःख हुआ, उनके मुख पर आँसुओं की धारा बह चली और वे अत्यन्त दुःखी होकर श्रीराम से धीरे-धीरे इस प्रकार कहने लगीं - प्राणनाथ! आपने वन में रहने के जो-जो दोष बताये हैं, वे सब आपका स्नेह पाकर मेरे लिये गुणरूप हो जायेंगे। इस बातको आप अच्छी तरह समझ लें। रघुनन्दन! मृग, सिंह, हाथी, शेर, शरभ, चमरी गाय, नीलगाय तथा जो अन्य जंगली जीव हैं, वे सब-के-सब आपका रूप देखकर भाग जायेंगे; क्योंकि ऐसा प्रभावशाली स्वरूप उन्होंने पहले कभी नहीं देखा होगा। आपसे तो सभी डरते हैं; फिर वे पशु क्यों नहीं डरेंगे? 

'श्रीराम! मुझे गुरुजनों की आज्ञा से निश्चय ही आपके साथ चलना है; क्योंकि आपका वियोग हो जाने पर मैं यहाँ अपने जीवन का परित्याग कर दूंगी। रघुनाथजी! आपके समीप रहने पर देवताओं के राजा इन्द्र भी बलपूर्वक मेरा तिरस्कार नहीं कर सकते। श्रीराम! पतिव्रता स्त्री अपने पति से वियोग होने पर जीवित नहीं रह सकेगी, ऐसी बात आपने भी मुझे भलीभांति दर्शायी है। महाप्राज्ञ! यद्यपि वन में दोष और दुःख ही भरे हैं, तथापि अपने पिता के घर पर रहते समय मैं ब्राह्मणों के मुख से पहले यह बात सुन चुकी हैं कि 'मुझे अवश्य ही वन में रहना पड़ेगा यह बात मेरे जीवन में सत्य होकर रहेगी। महाबली वीर! हस्तरेखा देखकर भविष्य की बातें जान लेने वाले ब्राह्मणों के मुख से अपने घर पर ऐसी बात सुनकर मैं सदा ही वनवास के लिये उत्साहित रहती हूँ।' 

'प्रियतम! ब्राह्मण से ज्ञात हुआ वन में रहने का आदेश एक न एक दिन मुझे पूरा करना ही पड़ेगा, यह किसी तरह पलट नहीं सकता। अतः मैं अपने स्वामी आपके साथ वन में अवश्य चलूंगी। ऐसा होने से मैं उस भाग्य के विधान को भोग लूँगी। उसके लिये यह समय आ गया है, अतः आपके साथ मुझे चलना ही है; इससे उस ब्राह्मण की बात भी सच्ची हो जायेगी। वीर! मैं जानती हूँ कि वनवास में अवश्य ही बहुत-से दुःख प्राप्त होते हैं; परंतु वे उन्हीं को दुःख जान पड़ते हैं, जिनकी इन्द्रियां और मन अपने वश में नहीं हैं। 

‘पिता के घर पर कुमारी अवस्था में एक शान्तिपरायणा भिक्षुकी के मुख से भी मैंने अपने वनवास की बात सुनी थी। उसने मेरी माता के सामने ही ऐसी बात कही थी। प्रभो! यहाँ आने पर भी मैंने पहले ही कई बार आपसे कुछ काल तक वन में रहने के लिये प्रार्थना की थी और आपको राजी भी कर लिया था। इससे आप निश्चितरूप से जान लें कि आपके साथ वन को चलना मुझे पहले से ही अभीष्ट है।' 

‘रघुनन्दन! आपका भला हो। मैं यहाँ चलने के लिये पहले से ही आपकी अनुमति प्राप्त कर चुकी हूँ। अपने शूरवीर वनवासी पति की सेवा करना मेरे लिये अधिक रुचिकर है। शुद्धात्मन्! आप मेरे स्वामी हैं, आपके पीछे प्रेमभाव से वन में जाने पर मेरे पाप दूर हो जायेंगे; क्योंकि स्वामी ही स्त्री के लिये सबसे बड़ा देवता है। आपके अनुगमन से परलोक में भी मेरा कल्याण होगा और सदा आपके साथ मेरा संयोग बना रहेगा।' 

'इस विषय में यशस्वी ब्राह्मणों के मुख से एक पवित्र श्रुति सुनी जाती है जो इस प्रकार है – महाबली वीर! इस लोक में पिता आदि के द्वारा जो कन्या जिस पुरुष को अपने धर्म के अनुसार जल से संकल्प करके दे दी जाती है, वह मरने के बाद परलोक में भी उसी की स्त्री होती है। मैं आपकी धर्मपत्नी हूँ, उत्तम व्रत का पालन करने वाली और पतिव्रता हूँ, फिर क्या कारण है कि आप मुझे यहाँ से अपने साथ ले चलना नहीं चाहते हैं।' 

'ककुत्स्थकुलभूषण! मैं आपकी भक्त हूँ, पातिव्रत्य का पालन करती हूँ, आपके बिछोह के भय से दीन हो रही हूँ तथा आपके सुख-दुःख में समानरूप से हाथ बँटानेवाली हूँ। मुझे सुख मिले या दुःख, मैं दोनों अवस्थाओं में समान रहूंगी - हर्ष या शोक के वशीभूत नहीं होऊँगी। अतः आप अवश्य ही मुझे साथ ले चलने की कृपा करें। यदि आप इस प्रकार दु:ख में पड़ी हुई मुझ सेविका को अपने साथ वन में ले जाना नहीं चाहते हैं तो मैं मृत्यु के लिये विष खा लूँगी, आग में कूद पड़ूँगी अथवा जल में डूब जाऊँगी।' 

इस तरह अनेक प्रकार से सीताजी वन में जाने के लिये याचना कर रही थीं तथापि महाबाहु श्रीराम ने उन्हें अपने साथ निर्जन वन में ले जाने की अनुमति नहीं दी। इस प्रकार उनके अस्वीकार कर देने पर मिथिलेशकुमारी सीता को बड़ी चिन्ता हुई और वे अपने नेत्रों से गरम- गरम आँसू बहाकर धरती को भिगोने सी लगीं। उस समय विदेहनन्दिनी जानकी को चिन्तित और कुपित देख मन को वश में रखने वाले श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें वनवास के विचार से निवृत्त करने के लिये भाँति-भाँति की बातें कहकर समझाया। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-२२(22) समाप्त !

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