भाग-२१(21) श्रीराम को उदास देखकर सीता का उनसे इसका कारण पूछना और श्रीराम का पिता की आज्ञा से वन में जाने का निश्चय बताते हुए सीता को घर में रहने के लिये समझाना

 


धर्मिष्ठ मार्ग पर स्थित हुए श्रीराम माता द्वारा स्वस्तिवाचन - कर्म सम्पन्न हो जाने पर कौशल्या को प्रणाम करके वहाँ से वन के लिये प्रस्थित हुए। उस समय मनुष्यों की भीड़ से भरे हुए राजमार्ग को प्रकाशित करते हुए राजकुमार श्रीराम अपने सद्गुणों के कारण लोगों के मन को मथने से लगे ऐसे गुणवान् श्रीराम को वनवास दिया जा रहा है, यह सोचकर वहाँ के लोगों का जी कचोटने लगा। 

तपस्विनी विदेहनन्दिनी सीता ने अभी तक वह सारा हाल नहीं सुना था। उनके हृदय में यही बात समायी हुई थी कि मेरे पति का युवराजपद पर अभिषेक हो रहा होगा। विदेहराजकुमारी सीता सामयिक कर्तव्यों तथा राजधर्मों को जानती थीं, अतः देवताओं की पूजा करके प्रसन्नचित्त से श्रीराम के आगमन की प्रतीक्षा कर रही थीं।

इतने में ही श्रीराम ने अपने भलीभाँति सजे-सजाये अन्त:पुर में, जो प्रसन्न मनुष्यों से भरा हुआ था, प्रवेश किया। उस समय लज्जा से उनका मुख कुछ नीचा हो रहा था। सीता उन्हें देखते ही आसन से उठकर खड़ी हो गयीं। उनकी अवस्था देखकर काँपने लगीं और चिन्ता से व्याकुल इन्द्रियों वाले अपने उन शोकसंतप्त पति को निहारने लगीं। धर्मात्मा श्रीराम सीता को देखकर अपने मानसिक शोक का वेग सहन न कर सके, अतः उनका वह शोक प्रकट हो गया। उनका मुख उदास हो गया था। उनके अङ्गों से पसीना निकल रहा था। वे अपने शोक को दबाये रखने में असमर्थ हो गये थे। 

उन्हें इस अवस्था में देखकर सीता दु:ख से संतप्त हो उठीं और बोलीं - प्रभो! इस समय यह आपकी कैसी दशा है? रघुनन्दन! आज बृहस्पति देवता-सम्बन्धी मङ्गलमय पुष्यनक्षत्र है, जो अभिषेक के योग्य है। उसकी पुष्यनक्षत्र के योग में विद्वान् ब्राह्मणों ने आपका अभिषेक बताया है। ऐसे समय में जब कि आपको प्रसन्न होना चाहिये था, आपका मन इतना उदास क्यों है? 

'मैं देखती हूँ, इस समय आपका मनोहर मुख जल के फेन के समान उज्ज्वल तथा सौ तीलियों वाले श्वेत छत्र से आच्छादित नहीं है, अतएव अधिक शोभा नहीं पा रहा है। कमल-जैसे सुन्दर नेत्र धारण करने वाले आपके इस मुख पर चन्द्रमा और हंस के समान श्वेत वर्ण वाले दो श्रेष्ठ चँवरों द्वारा हवा नहीं की जा रही है। नरश्रेष्ठ! प्रवचनकुशल वन्दी, सूत और मागधजन आज अत्यन्त प्रसन्न हो अपने माङ्गलिक वचनों द्वारा आपकी स्तुति करते नहीं दिखायी देते हैं। 

‘वेदों के पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मणों ने आज मूर्धाभिषिक्त हुए आपके मस्तक पर तीर्थोदकमिश्रित मधु और दधि का विधिपूर्वक अभिषेक नहीं किया। मन्त्री-सेनापति आदि सारी प्रकृतियाँ, वस्त्राभूषणों से विभूषित मुख्य-मुख्य सेठ साहूकार तथा नगर और जनपद के लोग आज आपके पीछे-पीछे चलने की इच्छा नहीं कर रहे हैं! इसका क्या कारण है ? सुनहरे साज-बाज से सजे हुए चार वेगशाली घोड़ों से जुता हुआ श्रेष्ठ पुष्परथ (पुष्पभूषित केवल भ्रमणोपयोगी रथ) आज आपके आगे-आगे क्यों नहीं चल रहा है ?' 

'वीर! आपकी यात्रा के समय समस्त शुभ लक्षणों से प्रशंसित तथा काले मेघवाले पर्वत के समान विशालकाय तेजस्वी गजराज आज आपके आगे क्यों नहीं दिखायी देता है ? प्रियदर्शन वीर! आज आपके सुवर्णजटित भद्रासन को सादर हाथ में लेकर अग्रगामी सेवक आगे जाता क्यों नहीं दिखायी देता है? जब अभिषेक की सारी तैयारी हो चुकी है, ऐसे समय में आपकी यह क्या दशा हो रही है? आपके मुख की कान्ति उड़ गयी है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। आपके चेहरे पर प्रसन्नता का कोई चिह्न नहीं दिखायी देता है। इसका क्या कारण है?'

इस प्रकार विलाप करती हुई सीता से रघुनन्दन श्रीराम ने कहा –  सीते! आज पूज्य पिताजी मुझे वन में भेज रहे हैं। महान् कुल में उत्पन्न, धर्म को जानने वाली तथा धर्मपरायणे जनकनन्दिनि ! जिस कारण यह वनवास आज मुझे प्राप्त हुआ है, वह क्रमशः बताता हूँ, सुनो। मेरे सत्यप्रतिज्ञ पिता महाराज दशरथ ने माता कैकेयी को पहले कभी दो महान् वर दिये थे। 

'इधर जब महाराज के उद्योग से मेरे राज्याभिषेक की तैयारी होने लगी, तब माता कैकेयी ने उस वरदान की प्रतिज्ञा को याद दिलाया और महाराज को धर्मतः अपने वश में कर लिया। इससे विवश होकर पिताजी ने भरत को तो युवराज के पद पर नियुक्त किया और मेरे लिये दूसरा वर स्वीकार किया, जिसके अनुसार मुझे चौदह वर्षों तक दण्डकारण्य में निवास करना होगा। इस समय मैं निर्जन वन में जाने के लिये प्रस्थान कर चुका हूँ और तुमसे मिलने के लिये यहाँ आया हूँ। तुम भरत के समीप कभी मेरी प्रशंसा न करना; क्योंकि समृद्धिशाली पुरुष दूसरे की स्तुति नहीं सहन कर पाते हैं। इसीलिये कहता हूँ कि तुम भरत के सामने मेरे गुणों की प्रशंसा न करना।' 

'विशेषत: तुम्हें भरत के समक्ष अपनी सखियों के साथ भी बारंबार मेरी चर्चा नहीं करनी चाहिये; क्योंकि उनके मन के अनुकूल बर्ताव करके ही तुम उनके निकट रह सकती हो। सीते! राजा ने उन्हें सदा के लिये युवराज पद दे दिया है, इसलिये तुम्हें विशेष प्रयत्नपूर्वक उन्हें प्रसन्न रखना चाहिये; क्योंकि अब वे ही राजा होंगे। मैं भी पिताजी की उस प्रतिज्ञा का पालन करने के लिये आज ही वन को चला जाऊँगा। मनस्विनि ! तुम धैर्य धारण करके रहना।' 

‘कल्याणि! निष्पाप सीते! मेरे मुनिजन सेवित वन को चले जाने पर तुम्हें प्राय: व्रत और उपवास में संलग्न रहना चाहिये। प्रतिदिन सबेरे उठकर देवताओं की विधिपूर्वक पूजा करके तुम्हें मेरे पिता महाराज दशरथ की वन्दना करनी चाहिये। मेरी माता कौशल्या को भी प्रणाम करना चाहिये। एक तो वे बुढ़ी हुईं, दूसरे दु:ख और संताप ने उन्हें दुर्बल कर दिया है; अत: धर्म को ही सामने रखकर तुमसे वे विशेष सम्मान पाने के योग्य हैं।' 

‘जो मेरी शेष माताएँ हैं, उनके चरणों में भी तुम्हें प्रतिदिन प्रणाम करना चाहिये; क्योंकि स्नेह, उत्कृष्ट प्रेम और पालन-पोषण की दृष्टि से सभी माताएँ मेरे लिये समान हैं। भरत और शत्रुघ्न मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय हैं, अत: तुम्हें उन दोनों को विशेषत: अपने भाई और पुत्र के समान देखना और मानना चाहिये।' 

'विदेहनन्दिनि! तुम्हें भरत की इच्छा के विरुद्ध कोई काम नहीं करना चाहिये; क्योंकि इस समय वे मेरे देश और कुल के राजा हैं। अनुकूल आचरण के द्वारा आराधना और प्रयत्नपूर्वक सेवा करने पर राजा लोग प्रसन्न होते हैं तथा विपरीत बर्ताव करने पर वे कुपित हो जाते हैं। जो अहित करनेवाले हैं, वे अपने औरस पुत्र ही क्यों न हों, राजा उन्हें त्याग देते हैं और आत्मीय न होने पर भी जो सामर्थ्यवान् होते हैं, उन्हें वे अपना बना लेते हैं। अत: कल्याणि! तुम राजा भरत के अनुकूल बर्ताव करती हुई धर्म एवं सत्यव्रत में तत्पर रहकर यहाँ निवास करो। 

'प्रिये ! अब मैं उस विशाल वन में चला जाऊँगा। भामिनि ! तुम्हें यहीं निवास करना होगा। तुम्हारे बर्ताव से किसी को कष्ट न हो, इसका ध्यान रखते हुए तुम्हें यहाँ मेरी इस आज्ञा का पालन करते रहना चाहिये।' 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-२१(21) समाप्त !

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