भाग-१५(15) राजा दशरथ का राम-लक्ष्मण को मुनि के साथ भेजना, मार्ग में उन्हें विश्वामित्र से बला और अतिबला नामक विद्या की प्राप्ति

 


वशिष्ठ के ऐसा कहने पर राजा दशरथ का मुख प्रसन्नता से खिल उठा। उन्होंने स्वयं ही लक्ष्मण सहित श्रीराम को अपने पास बुलाया। फिर माता कौशल्या, पिता दशरथ और पुरोहित वशिष्ठ ने स्वस्तिवाचन करने के पश्चात् उनका यात्रा सम्बन्धी मंगल कार्य सम्पन्न किया - श्रीराम को मंगलसूचक मन्त्रों से अभिमन्त्रित किया गया। तदनन्तर राजा दशरथ ने पुत्र का मस्तक सूँघकर अत्यन्त प्रसन्नचित्त से उसको विश्वामित्र को सौंप दिया। 

उस समय धूलरहित सुखदायिनी वायु चलने लगी। कमलनयन श्रीराम को विश्वामित्रजी के साथ जाते देख देवताओं ने आकाश से वहाँ फूलों की बड़ी भारी वर्षा की। देवदुन्दुभियाँ बजने लगीं। महात्मा श्रीराम की यात्रा के समय शङ्खों और नगाड़ों की ध्वनि होने लगी। आगे-आगे विश्वामित्र, उनके पीछे काकपक्षधारी महायशस्वी श्रीराम तथा उनके पीछे सुमित्रा कुमार लक्ष्मण जा रहे थे। 

उन दोनों भाइयों ने पीठ पर तरकस बाँध रखे थे। उनके हाथों में धनुष शोभा पा रहे थे तथा वे दोनों दसों दिशाओं को सुशोभित करते हुए महात्मा विश्वामित्र के पीछे तीन-तीन फन वाले दो सर्पों के समान चल रहे थे। एक ओर कंधे पर धनुष, दूसरी ओर पीठ पर तूणीर और बीच में मस्तक इन्हीं तीनों की तीन फन से उपमा दी गयी है। उनका स्वभाव उच्च एवं उदार था। अपनी अनुपम कान्ति से प्रकाशित होने वाले वे दोनों अनिन्द्य सुन्दर राजकुमार सब ओर शोभा का प्रसार करते हुए विश्वामित्रजी के पीछे उसी तरह जा रहे थे, जैसे ब्रह्माजी के पीछे दोनों अश्विनीकुमार चलते हैं। 

वे दोनों भाई कुमार श्रीराम और लक्ष्मण वस्त्र और आभूषणों से अच्छी तरह अलंकृत थे। उनके हाथों में धनुष थे। उन्होंने अपने हाथों की अंगुलियों में गोहटी के चमड़े के बने हुए दस्ताने पहन रखे थे। उनके कटिप्रदेश में तलवारें लटक रही थीं। उनके श्रीअंग बड़े मनोहर थे। वे महातेजस्वी श्रेष्ठ वीर अद्भुत कान्ति से उद्भासित हो सब ओर अपनी शोभा फैलाते हुए कुशिक पुत्र विश्वामित्र का अनुसरण कर रहे थे। उस समय वे दोनों वीर अचिन्त्य शक्तिशाली स्थाणुदेव (महादेव) के पीछे चलने वाले दो अग्निकुमार स्कन्द और विशाख की भाँति शोभा पाते थे।

अयोध्या से डेढ़ योजन दूर जाकर सरयू के दक्षिण तट पर विश्वामित्र ने मधुर वाणी में राम को सम्बोधित किया और कहा - वत्स राम! अब सरयू के जल से आचमन करो। इस आवश्यक कार्य में विलम्ब न हो। बला और अतिबला नाम से प्रसिद्ध इस मन्त्र समुदाय को ग्रहण करो। इसके प्रभाव से तुम्हें कभी श्रम (थकावट) का अनुभव नहीं होगा। ज्वर (रोग या चिन्ताजनित कष्ट) नहीं होगा। तुम्हारे रूप में किसी प्रकार का विकार या उलट- फेर नहीं होने पायेगा। 

‘सोते समय अथवा असावधानी की अवस्था में भी राक्षस तुम्हारे ऊपर आक्रमण नहीं कर सकेंगे। इस भूतल पर बाहुबल में तुम्हारी समानता करने वाला कोई न होगा। तात! रघुकुलनन्दन राम! बला और अतिबला का अभ्यास करने से तीनों लोकों में तुम्हारे समान कोई नहीं रह जायेगा। अनघ! सौभाग्य, चातुर्य, ज्ञान और बुद्धिसम्बन्धी निश्चय में तथा किसी के प्रश्न का उत्तर देने में भी कोई तुम्हारी तुलना नहीं कर सकेगा।' 

‘इन दोनों विद्याओं के प्राप्त हो जाने पर कोई तुम्हारी समानता नहीं कर सकेगा; क्योंकि ये बला और अतिबला नामक विद्याएँ सब प्रकार के ज्ञान की जननी हैं। नरश्रेष्ठ श्रीराम्! तात रघुनन्दन ! बला और अतिबला का अभ्यास कर लेने पर तुम्हें भूख-प्यास का भी कष्ट नहीं होगा; अत: रघुकुल को आनन्दित करनेवाले राम! तुम सम्पूर्ण जगत की रक्षा के लिये इन दोनों विद्याओं को ग्रहण करो। इन दोनों विद्याओं का अध्ययन कर लेने पर इस भूतल पर तुम्हारे यश का विस्तार होगा। ये दोनों विद्याएँ ब्रह्माजी की तेजस्विनी पुत्रियाँ हैं।' 

‘ककुत्स्थनन्दन! मैंने इन दोनों को तुम्हें देने का विचार किया है। राजकुमार ! तुम्हीं इनके योग्य पात्र हो । यद्यपि तुममें इस विद्या को प्राप्त करने योग्य बहुत से गुण हैं अथवा सभी उत्तम गुण विद्यमान हैं, इसमें संशय नहीं है तथापि मैंने तपोबल से इनका अर्जन किया है। अत: मेरी तपस्या से परिपूर्ण होकर ये तुम्हारे लिये बहुरूपिणी होंगी - अनेक प्रकार के फल प्रदान करेंगी।' 

तब श्रीराम आचमन करके पवित्र हो गये। उनका मुख प्रसन्नता से खिल उठा। उन्होंने उन शुद्ध अन्तःकरण वाले महर्षि से वे दोनों विद्याएँ ग्रहण कीं। विद्या से सम्पन्न होकर भयङ्कर पराक्रमी श्रीराम सहस्रों किरणों से युक्त शीतकालीन भगवान् सूर्य के समान शोभा पाने लगे। तत्पश्चात् श्रीराम ने विश्वामित्रजी की सारी गुरुजनोचित सेवाएँ करके हर्ष का अनुभव किया। फिर वे तीनों वहाँ सरयू के तट पर रात में सुखपूर्वक रहे। राजा दशरथ के वे दोनों श्रेष्ठ राजकुमार उस समय वहाँ तृण की शय्या पर, जो उनके योग्य नहीं थी, सोये थे। महर्षि विश्वामित्र अपनी वाणी द्वारा उन दोनों के प्रति लाड़-प्यार प्रकट कर रहे थे। इससे उन्हें वह रात बड़ी सुखमयी- सी प्रतीत हुई। 

जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब महामुनि विश्वामित्र ने तिनकों और पत्तों के बिछौने पर सोये हुए उन दोनों ककुत्स्थवंशी राजकुमारों से कहा – नरश्रेष्ठ राम! तुम्हारे-जैसे पुत्र को पाकर महारानी कौशल्या सुपुत्र जननी कही जाती हैं। यह देखो, प्रात: काल की संध्या का समय हो रहा है; उठो और प्रतिदिन किये जानेवाले देवसम्बन्धी कार्यों को पूर्ण करो। 

महर्षि का यह परम उदार वचन सुनकर उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरों ने स्नान करके देवताओं का तर्पण किया और फिर वे परम उत्तम जपनीय मन्त्र गायत्री का जप करने लगे। नित्यकर्म समाप्त करके महापराक्रमी श्रीराम और लक्ष्मण अत्यन्त प्रसन्न हो तपोधन विश्वामित्र को प्रणाम करके वहाँ से आगे जाने को उद्यत हो गये। जाते-जाते उन महाबली राजकुमारों ने गंगा और सरयू के शुभ संगम पर पहुँचकर वहाँ दिव्य त्रिपथगा नदी गंगाजी का दर्शन किया। 

संगम के पास ही शुद्ध अन्तःकरण वाले महर्षियों का एक पवित्र आश्रम था, जहाँ वे कई हजार वर्षों से तीव्र तपस्या करते थे। उस पवित्र आश्रम को देखकर रघुकुलरत्न श्रीराम और लक्ष्मण बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने महात्मा विश्वामित्र से यह बात कही - भगवन्! यह किसका पवित्र आश्रम है? और इसमें कौन पुरुष निवास करता है? यह हम दोनों सुनना चाहते हैं। इसके लिये हमारे मन में बड़ी उत्कण्ठा है। 

उन दोनों का यह वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र हँसते हुए बोले - राम ! यह आश्रम पहले जिसके अधिकार में रहा है, उसका परिचय देता हूँ, सुनो। विद्वान् पुरुष जिसे कामदेव कहते हैं, वह कन्दर्प पूर्वकाल में मूर्तिमान् था। शरीर धारण करके विचरता था। उन दिनों भगवान् स्थाणु (शिव) इसी आश्रम में चित्त को एकाग्र करके नियमपूर्वक तपस्या करते थे। एक दिन समाधि से उठकर देवेश्वर शिव मरुद्गुणों के साथ कहीं जा रहे थे। उसी समय दुर्बुद्धि काम ने उनपर आक्रमण किया। यह देख महात्मा शिव ने हुङ्कार करके उसे रोका। 

‘रघुनन्दन! भगवान् रुद्र ने रोषभरी दृष्टि से अवहेलनापूर्वक उसकी ओर देखा; फिर तो उस दुर्बुद्धि के सारे अंग उसके शरीर से जीर्ण-शीर्ण होकर गिर गये। वहाँ दग्ध हुए महामना कन्दर्प का शरीर नष्ट हो गया। देवेश्वर रुद्र ने अपने क्रोध से काम को अंगहीन कर दिया। राम! तभी से वह ‘अनंग' नाम से विख्यात हुआ। शोभाशाली कन्दर्प ने जहाँ अपना अंग छोड़ा था, वह प्रदेश अंगदेश के नाम से विख्यात हुआ। 

‘यह उन्हीं महादेवजी का पुण्य आश्रम है। वीर! ये मुनि लोग पूर्वकाल में उन्हीं स्थाणु (शिवजी) के धर्मपरायण शिष्य थे। इनका सारा पाप नष्ट हो गया है। शुभदर्शन राम! आज की रात में हमलोग यहीं इन पुण्यसलिला सरिताओं के बीच में निवास करें। कल सबेरे इन्हें पार करेंगे। हम सब लोग पवित्र होकर इस पुण्य आश्रम में चलें। यहाँ रहना हमारे लिये बहुत उत्तम होगा। नरश्रेष्ठ! यहाँ स्नान करके जप और हवन करने के बाद हम रात में बड़े सुख से रहेंगे। 

वे लोग वहाँ इस प्रकार आपस में बातचीत कर ही रहे थे कि उस आश्रम में निवास करने वाले मुनि तपस्या द्वारा प्राप्त हुई दूर दृष्टि से उनका आगमन जानकर मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। उनके हृदय में हर्षजनित उल्लास छा गया। उन्होंने विश्वामित्रजी को अर्घ्य, पाद्य और अतिथि सत्कार की सामग्री अर्पित करने के बाद श्रीराम और लक्ष्मण का भी आतिथ्य किया। 

यथोचित सत्कार करके उन मुनियों ने इन अतिथियों का भाँति-भाँति की कथा - वार्ताओं द्वारा मनोरञ्जन किया। फिर उन महर्षियों ने एकाग्रचित्त होकर यथावत् संध्यावन्दन एवं जप किया। तदनन्तर वहाँ रहनेवाले मुनियों ने अन्य उत्तम व्रतधारी मुनियों के साथ विश्वामित्र आदि को शयन के लिये उपयुक्त स्थान में पहुँचा दिया। सम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति करनेवाले उस पुण्य आश्रम में उन विश्वामित्र आदि ने बड़े सुख से निवास किया। धर्मात्मा मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र ने उन मनोहर राजकुमारों का सुन्दर कथाओं द्वारा मनोरञ्जन किया। 

इति श्रीमद् राम कथा बालकाण्ड अध्याय-५ का भाग-१५(15) समाप्त !

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