भाग-१२(12) कैकेयी का राजा को सत्य पर दृढ़ रहने के लिये प्रेरणा देकर अपने वरों की पूर्ति के लिये दुराग्रह दिखाना

 


इक्ष्वाकुनन्दन राजा दशरथ पुत्रशोक से पीड़ित हो पृथ्वी पर अचेत पड़े थे और वेदना से छटपटा रहे थे, उन्हें इस अवस्था में देखकर पापिनी कैकेयी इस प्रकार बोली - महाराज ! आपने मुझे दो वर देने की प्रतिज्ञा की थी और जब मैंने उन्हें माँगा, तब आप इस प्रकार सन्न होकर पृथ्वी पर गिर पड़े, मानो कोई पाप करके पछता रहे हों, यह क्या बात है? आपको सत्पुरुषों की मर्यादा में स्थिर रहना चाहिये। धर्मज्ञ पुरुष सत्य को ही सबसे श्रेष्ठ धर्म बतलाते हैं, उस सत्य का सहारा लेकर मैंने आपको धर्म का पालन करने के लिये ही प्रेरित किया है।

‘पृथ्वीपति राजा शिवि ने बाज पक्षी को अपना शरीर देने की प्रतिज्ञा करके उसे दे ही दिया और देकर उत्तम गति प्राप्त कर ली। इसी प्रकार तेजस्वी राजा अलर्क ने वेदों के पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मण को उसके याचना करने पर मन में खेद न लेट हुए 'अपनी दोनों आँखें निकालकर दे दी थीं। सत्य को प्राप्त हुआ समुद्र सत्य का ही अनुसरण करने के कारण पर्व आदि के समय भी अपनी छोटी-सी सीमा तट भूमिका भी उल्लङ्घन नहीं करता। सत्य ही प्रणस्वरुप शब्द ब्रह्म है, सत्य में ही धर्म प्रतिष्ठित है, सत्य ही अविनाशी वेद है और सत्य से ही परब्रह्म की प्राप्ति होती है। इसलिये यदि आपकी बुद्धि धर्म में स्थित है तो सत्य का अनुसरण कीजिये। साधुशिरोमणे ! मेरा माँगा हुआ वह वर सफल होना चाहिये; क्योंकि आप स्वयं ही उस वर के दाता हैं।' 

'धर्म ही अभीष्ट फल की सिद्धि के लिये तथा मेरी प्रेरणा से भी आप अपने पुत्र श्रीराम को घर से निकाल दीजिये। मैं अपने इस कथन को तीन बार दुहराती हूँ। आर्य ! यदि मुझसे की हुई इस प्रतिज्ञा का आप पालन नहीं करेंगे तो मैं आपसे परित्यक्त (उपेक्षित) होकर आपके सामने ही अपने प्राणों का परित्याग कर दूंगी।' 

इस प्रकार कैकेयी ने जब निःशङ्क होकर राजा को प्रेरित किया, तब वे उस सत्यरूपी बन्धन को वैसे ही नहीं खोल सके—उस बन्धन से अपने को उसी तरह नहीं मुक्त कर सके, जैसे राजा बलि इन्द्रप्रेरित वामन के पाश से अपने को मुक्त करने में असमर्थ हो गये थे। दो पहियों के बीच में फँसकर वहाँ से निकलने की चेष्टा करने वाले गाड़ी के बैल की भाँति उनका हृदय उद्धान्त हो उठा था और उनके मुख की कान्ति भी फीकी पड़ गयी थी। 

अपने विकल नेत्रों से कुछ भी देखने में असमर्थ से होकर भूपाल दशरथ ने बड़ी कठिनाई से धैर्य धारण करके अपने हृदय को सँभाला और कैकेयी से इस प्रकार कहा - पापिनि! मैंने अग्नि के समीप 'साङ्गुष्ठं ते गृभ्णामि सौभगत्वाय हस्तम् ० ' इत्यादि वैदिक मन्त्र का पाठ करके तेरे जिस हाथ को पकड़ा था, उसे आज छोड़ रहा हूँ। साथ ही तेरे और अपने द्वारा उत्पन्न हुए तेरे पुत्र का भी त्याग करता हूँ। देवी! रात बीत गयी। सूर्योदय होते ही सब लोग निश्चय ही श्रीराम का राज्याभिषेक करने के लिये मुझे शीघ्रता करने को कहेंगे। उस समय जो सामान श्रीराम के अभिषेक के लिये जुटाया गया है, उसके द्वारा मेरे मरने के बाद श्रीराम के हाथ से मुझे जलाञ्जलि दिलवा देना; परंतु अपने पुत्र सहित तू मेरे लिये जलाञ्जलि न देना। 

‘पापाचारिणि! यदि तू श्रीराम के अभिषेक में विघ्न डालेगी (तो तुझे मेरे लिये जलाञ्जलि देनेका कोई अधिकार न होगा)। मैं पहले श्रीराम के राज्याभिषेक के समाचार से जो जन समुदाय का हर्षोल्लास से परिपूर्ण उन्नत मुख देख चुका हूँ, वैसा देखने के पश्चात् आज पुन: उसी जनता के हर्ष और आनन्द से शून्य, नीचे लटके हुए मुख को मैं नहीं देख सकूँगा।' 

महात्मा राजा दशरथ के कैकेयी से इस तरह की बातें करते-करते ही चन्द्रमा और नक्षत्रमालाओं से अलंकृत वह पुण्यमयी रजनी बीत गयी और प्रभात काल आ गया। 

तदनन्तर बातचीत के मर्म को समझने वाली पापाचारिणी कैकेयी रोष से मूर्च्छित सी होकर राजा से पुन: कठोर वाणी में बोली - राजन्! आप विष और शूल आदि रोगों के समान कष्ट देने वाले ऐसे वचन क्यों बोल रहे हैं इन बातों से कुछ होने-जाने वाला नहीं है। आप बिना किसी क्लेश के अपने पुत्र श्रीराम को यहाँ बुलवाइये। मेरे पुत्र को राज्य पर प्रतिष्ठित कीजिये और श्रीराम को वन में भेजकर मुझे निष्कण्टक बनाइये; तभी आप कृतकृत्य हो सकेंगे। 

तीखे कोड़े की मार से पीड़ित हुए उत्तम अश्व की भाँति कैकेयी द्वारा बारंबार प्रेरित होने पर व्यथित हुए राजा दशरथ ने इस प्रकार कहा - मैं धर्म के बन्धन में बँधा हुआ हूँ। मेरी चेतना लुप्त होती जा रही है। इसलिये इस समय मैं अपने धर्मपरायण परम प्रिय ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम को देखना चाहता हूँ। 

उधर जब रात बीती, प्रभात हुआ, सूर्यदेव का उदय हो गया और पुण्यनक्षत्र के योग में अभिषेक का शुभ मुहूर्त आ पहुँचा, उस समय शिष्यों से घिरे हुए शुभ गुण सम्पन्न महर्षि वशिष्ठ अभिषेक की आवश्यक सामग्रियों का संग्रह करके शीघ्रतापूर्वक उस श्रेष्ठ पुरी में आये। उस पुण्यवेला में अयोध्या की सड़कें झाड़-बुहारकर साफ की गयी थीं और उन पर जल का छिड़काव हुआ था। सारी पुरी उत्तम पताकाओं से सुशोभित थी। वहाँ के सभी मनुष्य हर्ष और उत्साह से भरे हुए थे। बाजार और दूकानें इस तरह सजी हुई थीं कि उनकी समृद्धि देखते ही बनती थी। 

सब ओर महान् उत्सव हो रहा था। सारी नगरी श्रीरामचन्द्रजी के अभिषेक के लिये उत्सुक थी। चारों ओर चन्दन, अगर और धूप की सुगन्ध व्याप्त हो रही थी। 

इन्द्र नगरी अमरावती के समान शोभा पाने वाली उस पुरी को पार करके श्रीमान् वशिष्ठजी ने राजा दशरथ के अन्तःपुर का दर्शन किया। जहाँ सहस्रों ध्वजाएँ फहरा रही थीं। नगर और जनपद के लोग वहाँ भरे हुए थे। बहुत-से ब्राह्मण उस स्थान की शोभा बढ़ाते थे। छड़ीदार राजसेवक तथा सजे-सजाये सुन्दर घोड़े वहाँ अधिक संख्या में उपस्थित थे। 

श्रेष्ठ महर्षियों से घिरे हुए वशिष्ठजी परम प्रसन्न हो उस अन्त: पुर में पहुँचकर उस जन समुदाय को लाँघकर आगे बढ़ गये। वहाँ उन्होंने महाराज के सुन्दर सचिव तथा सारथि सुमन्त्र को अन्त: पुर के द्वार पर उपस्थित देखा, जो उसी समय भीतर से निकले थे। तब महातेजस्वी वशिष्ठ ने परम चतुर सूतपुत्र सुमन्त्र से कहा - सुमन्त्र ! तुम महाराज को शीघ्र ही मेरे आगमन की सूचना दो। 

‘उन्हें बताओ कि श्रीराम के राज्याभिषेक के लिये सारी सामग्री एकत्र कर ली गयी है ये गङ्गाजल से भरे कलश रखे हैं, इन सोने के कलशों में समुद्रों से लाया हुआ जल भरा हुआ है। यह गूलर की लकड़ी का बना हुआ भद्रपीठ है, जो अभिषेक के लिये लाया गया है इसी पर बिठाकर श्रीराम का अभिषेक होगा।' 

'सब प्रकार के बीज, गन्ध, भाँति-भाँति के रत्न, मधु, दही, घी, लावा या खील, कुश, फूल, दूध, आठ सुन्दरी कन्याएँ, मत्त गजराज, चार घोड़ों वाला रथ, चमचमाता हुआ खड्ग, उत्तम धनुष, मनुष्यों द्वारा ढोयी जाने वाली सवारी (पालकी आदि), चन्द्रमा के समान श्वेत छत्र, सफेद चँवर, सोने की झारी, सुवर्ण की माला से अलंकृत ऊँचे डीवाला श्वेत पीतवर्ण का वृषभ, चार दाढ़ोंवाला सिंह, महाबलवान् उत्तम अश्व, सिंहासन, व्याघ्रचर्म, समिधाएँ, अग्नि, सब प्रकारके बाजे, वाराङ्गनाएँ, श्रृङ्गारयुक्त सौभाग्यवती स्त्रियाँ, आचार्य, ब्राह्मण, गौ, पवित्र पशु-पक्षी, नगर और जनपद के श्रेष्ठ पुरुष अपने सेवक - गणों सहित प्रसिद्ध प्रसिद्ध व्यापारी – ये तथा और भी बहुत-से प्रियवादी मनुष्य बहुसंख्यक राजाओं के साथ प्रसन्नतापूर्वक श्रीराम के अभिषेक के लिये यहाँ उपस्थित हैं। तुम महाराज से शीघ्रता करने के लिये कहो, जिससे अब सूर्योदय के पश्चात् पुष्यनक्षत्र के योग में श्रीराम राज्य प्राप्त कर लें। 

वशिष्ठजी के ये वचन सुनकर महाबली सूतपुत्र सुमन्त्र ने राजसिंह दशरथ की स्तुति करते हुए उनके भवन में प्रवेश किया। राजा का प्रिय करने की इच्छा रखने वाले और उनके द्वारा सम्मानित द्वारपाल उन बूढ़े सचिव को भीतर जाने से रोक न सके; क्योंकि उनके लिये पहले से ही महाराज की आज्ञा थी कि ये किसी समय भी भीतर आने से रोके न जायें। सुमन्त्र राजा के पास जाकर खड़े हो गये। उन्हें उनकी उस अवस्था का पता नहीं था; इसलिये वे अत्यन्त संतोषदायक वचनों द्वारा उनकी स्तुति करने को उद्यत हुए। 

सूत सुमन्त्र राजा के उस महल में पहले की ही भाँति हाथ जोड़कर उन महाराज की स्तुति करने लगे – महाराज ! जैसे सूर्योदय होने पर तेजस्वी समुद्र स्वयं हर्ष की तरंगों से उल्लासित हो उसमें स्नान की इच्छावाले मनुष्यों को आनन्दित करता है, उसी प्रकार आप स्वयं प्रसन्न हो प्रसन्नतापूर्ण हृदय से हम सेवकों को आनन्द प्रदान कीजिये। देवसारथि मातलि ने इसी बेला में देवराज इन्द्र की स्तुति की थी, जिससे उन्होंने समस्त दानवों पर विजय प्राप्त कर ली, उसी प्रकार मैं भी स्तुति वचनों द्वारा आपको जगा रहा हूँ। 

‘छहों अङ्गोंसहित चारों वेद तथा समस्त विद्याएँ जैसे स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा को जगाती हैं, उसी प्रकार आज मैं आपको जगा रहा हूँ। जैसे चन्द्रमा के साथ सूर्य समस्त भूतों की आधार भूता इस शुभ-स्वरूपा पृथ्वी को जगाया करते हैं, उसी प्रकार आज मैं आपको जगा रहा हूँ। महाराज! उठिये और उत्सव कालिक मङ्गलकृत्य पूर्ण करके वस्त्राभूषणों से सुशोभित शरीर से सिंहासन पर विराजमान होइये। फिर मेरु पर्वत से ऊपर उठने वाले सूर्यदेव के समान आपकी शोभा होती रहे।' 

‘ककुत्स्थकुलनन्दन! चन्द्रमा, सूर्य, शिव, कुबेर, वरुण, अग्नि और इन्द्र आपको विजय प्रदान करें। राजसिंह! भगवती रात्रि देवी विदा हो गयीं। आपने जिसके लिये आज्ञा दी थी, आपका वह सारा कार्य पूर्ण हो गया। इस बात को आप जान लें और इसके बाद जो अभिषेक का कार्य शेष है, उसे पूर्ण करें। श्रीराम के अभिषेक की सारी तैयारी हो चुकी है। नगर और जनपद के लोग तथा मुख्य-मुख्य व्यापारी भी हाथ जोड़े हुए उपस्थित हैं । राजन् ! ये भगवान् वशिष्ठ मुनि ब्राह्मणों के साथ द्वार पर खड़े हैं; अतः श्रीराम के अभिषेक का कार्य आरम्भ करने के लिये शीघ्र आज्ञा दीजिये। जैसे चरवाहों के बिना पशु, सेनापति के बिना सेना, चन्द्रमा के बिना रात्रि और साँड़ के बिना गौओं की शोभा नहीं होती, ऐसी ही दशा उस राष्ट्र की हो जाती है, जहाँ राजा का दर्शन नहीं होता है। 

सुमन्त्र के इस प्रकार कहे हुए सान्त्वनापूर्ण और सार्थक वचन को सुनकर राजा दशरथ पुनः शोक से ग्रस्त हो गये। उस समय पुत्र के वियोग की सम्भावना से उनकी प्रसन्नता नष्ट हो चुकी थी। शोक के कारण उनके नेत्र लाल हो गये थे। उन धर्मात्मा श्रीमान् नरेश ने एक बार दृष्टि उठाकर सूत की ओर देखा और इस प्रकार कहा – तुम ऐसी बातें सुनाकर मेरे मर्म-स्थानों पर और अधिक आघात क्यों कर रहे हो। 

राजाके ये करुण वचन सुनकर और उनकी दीन दशा पर दृष्टिपात करके सुमन्त्र हाथ जोड़े हुए उस स्थान से कुछ पीछे हट गये। 

जब दु:ख और दीनता के कारण राजा स्वयं कुछ भी न कह सके, तब मन्त्रणा का ज्ञान रखने वाली कैकेयी ने सुमन्त्र को इस प्रकार उत्तर दिया - सुमन्त्र ! राजा रातभर श्रीराम के राज्याभिषेक जनित हर्ष के कारण उत्कण्ठित होकर जागते रहे हैं। अधिक जागरण से थक जाने के कारण इस समय इन्हें नींद आ गयी है। अतः सुमन्त्र! तुम्हारा भला हो। तुम तुरंत जाओ और यशस्वी राजकुमार श्रीराम को यहाँ बुला लाओ। इस विषय में तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। 

तब सुमन्त्रने कहा - भामिनि ! मैं महाराज की आज्ञा सुने बिना कैसे जा सकता हूँ? 

मन्त्री की बात सुनकर राजा ने उनसे कहा – सुमन्त्र ! मैं सुन्दर श्रीराम को देखना चाहता हूँ। तुम शीघ्र उन्हें यहाँ ले आओ। 

उस समय श्रीराम के दर्शन से ही कल्याण मानते हुए राजा मन-ही-मन आनन्द का अनुभव करने लगे। इधर सुमन्त्र राजा की आज्ञा से तुरंत प्रसन्नतापूर्वक वहाँ से चल दिये। कैकेयी ने जो तुरंत श्रीराम को बुला लाने की आज्ञा दी थी, उसे याद करके वे सोचने लगे- 'पता नहीं, यह उन्हें बुलाने के लिये इतनी जल्दी क्यों मचा रही है ?

'जान पड़ता है, श्रीरामचन्द्र के अभिषेक के लिये ही यह जल्दी कर रही है। इस कार्य में धर्मराज राजा दशरथ को अधिक आवास करना पड़ता है शायद इसीलिये ये बाहर नहीं निकलते। 

ऐसा निश्चय करके महातेजस्वी सुमन्त्र फिर बड़े हर्ष के साथ श्रीराम के दर्शन की इच्छा से चल पड़े। समुद्र के अन्तर्वर्ती जलाशय के समान उस सुन्दर अन्तःपुर से निकलकर सुमन्त्र ने द्वार के सामने मनुष्यों की भारी भीड़ एकत्र हुई देखी। राजा के अन्त:पुर से सहसा निकलकर सुमन्त्र ने द्वार पर एकत्र हुए लोगों की ओर दृष्टिपात किया। उन्होंने देखा, बहुसंख्यक पुरवासी वहाँ उपस्थित थे और अनेकानेक महाधनी पुरुष राजद्वार पर आकर खड़े थे। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-१२(12) समाप्त !

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